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Tuesday, July 14, 2020

Brave New World: सोचने-समझने की आजादी के बिना सबसे संपन्न दुनिया भी एक जेल से ज्यादा कुछ नहीं

Brave New World किताब के अलग-अलग दौर के कवर
आज दुनिया की तरक्की मापने के आधार क्या हैं? आर्थिक तरक्की, मानसिक शांति, स्थायी व्यवस्था, उन्नत टेक्नोलॉजी और अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं. लेकिन क्या आजादी के बिना इनका कोई मोल है? सही मायनों में आजादी, जिसमें सोचने के लिए/ कल्पना करने के लिए/ महत्वाकांक्षाएं रख सकने की सीमाएं अथाह हों. क्या उस सही मायनों वाली आजादी के बिना इन सभी आधुनिक पैमानों का कोई मूल्य है. इसी की पड़ताल करती है ब्रिटिश लेखक एल्डस हक्सले की किताब 'ब्रेव न्यू वर्ल्ड'.

हमारे आधुनिक राष्ट्र-राज्यों की महत्वाकांक्षा जिस दुनिया में पूरी हो चुकी है. जिस दुनिया में देशभक्तों की अपने देश को अभेद्य, सबसे ताकतवर, शक्तिशाली और स्थिर बनाने जैसी कल्पनाएं साकार हो चुकी हैं. राज्य ने अपने नागरिकों के जीन, सेक्सुएलिटी, विचारों और कल्याण के उपायों में इतनी स्थिरता ला दी है कि 'अगर ऐसा हुआ तो क्या करेंगे' जैसी छोटी-बड़ी सभी चिंताएं सुलझाई जा चुकी हैं. कोई डर, कोई असुरक्षा कहीं मौजूद नहीं है. कलाओं का नया उत्कर्ष है. सच्ची परफेक्टनेस अचीव हो चुकी है. गायन, वादन सहित कला का हर रूप, हर तरह से दोषहीन है. इसकी वजह यह है कि ये कलाएं गलतियों के पुतले मनुष्य के दिमाग की उपज न होकर बेहतरीन मशीनों/ रोबोट्स की उत्पाद हैं.

लेकिन ऐसी परफेक्ट दुनिया में भी एक आदमी के मन में थोड़ी सी असंतुष्टि और जिज्ञासा क्या पनपती है कि इस निष्कलंक दुनिया का संतुलन ही बिगड़ जाता है. लगभग खात्मे की कगार पर हमारे-आपके जैसे अपूर्ण इंसानों को इसी दुनिया के एक अलग हिस्से में म्यूजियम जैसी व्यवस्था में रखा गया है और हमपर असभ्यता का टैग लगा, प्रयोग किए जाते हैं. फिर ब्रेव न्यू वर्ल्ड के चंद असंतुष्ट शख्सों में से एक हम असभ्यों की खोज में रिसर्च का बहाना करके असभ्यों के म्यूजियम आता है और ब्रेव न्यू वर्ल्ड की ही एक पुरानी स्त्री जो कभी यहां आई थी और परिस्थितियोंवश यहीं फंस गई को खोज निकालता है. वह उसे और उसके बेटे को जब वह वापस लेकर जाता है तो न सिर्फ ब्रेव न्यू वर्ल्ड को बनाने में लगी अमानवीयता का पर्दाफाश हो जाता है बल्कि इसे चलाने वालों के धूर्त चेहरे भी सामने आ जाते हैं.

1932 में प्रकाशित इस उपन्यास में वर्तमान लक्षणों वाले लोकतंत्रों के चरित्र की गहन पड़ताल है. शक्तिशाली नेताओं के सामने किसी समाज के अपने विचारों, भावनाओं का समर्पण कर देने के बाद का राष्ट्र-राज्यों का स्वरूप है. मीडियोक्रिटी का चरमोत्कर्ष है और एक नशा है, जिसके बिना किसी व्यवस्था को अद्वितीय, सर्वश्रेष्ठ साबित करने का प्रयास मुमकिन नहीं हो सकता. कार्ल मार्क्स कुछ लोगों के लिए यह नशा धर्म को बताते थे, आजकल कहा जा रहा है कि झूठा राष्ट्रवाद नशा है, हो सकता है कहीं व्यापार प्रगति-आर्थिक उत्कर्ष ऐसा नशा हो. ब्रेव न्यू वर्ल्ड का संदेश है कि वह नशा कोई न कोई होता ही है, ब्रेव न्यू वर्ल्ड में यह नशा टेक्नोलॉजी और एक सीधे नशे 'सोमा' टेबलेट का है. जो किसी नागरिक को दुख का एहसास ही नहीं होने देती.

यह किताब 'ब्रेव न्यू वर्ल्ड' संदेश देती है कि चाहे जो हो लेकिन व्यक्ति और समाज में महत्वपूर्ण कौन के जवाब में अगर समाज कहा जाता रहेगा तो सरकारें निश्चय ही इसका फायदा उठायेंगीं. भला तभी होगा जब ऐसी कोई प्रतिस्पर्धा ही न हो और हर बात पर व्यक्ति या समाज को महत्वपूर्ण बताने के बजाए ऐसे समाज का निर्माण किया जाये, जिसमें व्यक्ति को तब तक हर तरह के व्यक्तिगत काम की आजादी हो, जब तक वह अन्य के लिए हानिकारक न हो.

Tuesday, May 5, 2020

शेखर कपूर की फिल्म Bandit Queen पर अरुंधति राय के आलोचनात्मक लेख The great Indian Rape-Trick I का हिंदी अनुवाद

बैंडिट क्वीन में शेखर कपूर ने कई थिएटर कलाकारों को एक्टिंग का मौका दिया, जो आगे इंडस्ट्री में बड़े नाम बने (फोटोः फर्स्टपोस्ट हिंदी)

महान भारतीय बलात्कार छल- 1


दिल्ली में बैंडिट क्वीन की प्रीमियर स्क्रीनिंग पर शेखर कपूर ने इन शब्दों के साथ फिल्म का परिचय दिया, मेरे पास सच और सौंदर्य के बीच एक चुनाव था. मैंने सच को चुना, क्योंकि सच पवित्र है.

इस बात पर जोर देना कि फिल्म सच बताती है ही उनके लिये सबसे बड़ी कॉमर्शियल और क्रिटिकल महत्व रखता है. बार-बार इंटरव्यू में, रिव्यू में और यहां तक कि फिल्म की शुरुआत में लिखा हुआ, 'यह एक सत्यकथा है' हमें यह भरोसा दिलाया जाता है.

अगर यह 'सच' नहीं होती. तो इसे उसी रेप और बदला थीम के क्लासिक वर्जन वाली चक्की से क्या बचाता जिसे हमेशा गाहे-बगाहे हमारी फिल्म इंडस्ट्री मथती रहती है. तो इसे इस सुपरिचित आरोप कि यह भारत को सही तरह से चित्रित नहीं किया गया है? वाकई कुछ भी नहीं.

यह 'सच' ही है जो इसे बचाता है. हर बार, जब यह स्विस चाकू लेकर सुपरमैन की तरह गोते लगाती है- और फिल्म को बेकार, नीरसता के जबड़े से खींच निकालती है. इसने सुर्खियां बनाईं. मुंहफट तर्क खींचे. और गहन आलोचना भी.

अगर आप कहें कि आपने फिल्म को बेमज़ा पाया, आपको बताया जायेगा- खैर ऐसा ही सच भी होता है- बेमजा. जोड़-तोड़ से भरा? ऐसी ही जिंदगी है- जोड़-तोड़ वाली.

यह ट्रकों के पीछे लिखे ऐसे ही डायलॉग जैसा कुछ-कुछ है -

प्यार ही ईश्वर है
जीवन कठिन है
सच ही पवित्र है
हॉर्न बजायें

चाहे हो या न हो सच और ज्यादा प्रासंगिक नहीं रह गया है. मसला यह है कि यह (अगर यह पहले से ही नहीं हो चुका है) - सच बन जायेगा.

फूलन देवी, एक औरत का महत्वपूर्ण होना खत्म हो चुका है. (हां यह भले ही सच है कि वह मौजूद है. उसकी आंखें हैं, कान हैं, अंग और बाल आदि हैं. बल्कि अब एक पता भी) लेकिन वह एक लीजेंड होने के शाप से ग्रसित हैं. वह केवल अपना एक वर्जन भर हैं. यहां उनके दूसरे वर्जन भी हैं जो कि ध्यान खींचने के लिये झगड़ रहे हैं. खासकर शेखर कपूर की एक सच्ची कथा. जिसपर फिलहाल हमें यकीन करने के लिये काफी जोर दिया जा रहा है.

डेरेक मैल्कम, द गार्डियन अख़बार में लिखते हैं, यह एक ऐसी कहानी है, जो अगर कोई फिक्शन का टुकड़ा होती, तो इसे क्रेडिट देना कठिन हो जाता कि यह फूलन देवी की असली कहानी है जो भारतीय बाल विवाहित है.

लेकिन क्या ऐसा है? यह सत्यकथा है? कोई कैसे यह तय करेगा? कौन तय करेगा?

शेखर कपूर कहते हैं कि फिल्म माला सेन की किताब - इंडिया की बैंडिट क्वीन : फूलन देवी की सच्ची कहानी (इंडियाज बैंडिट क्वीन : द ट्रू स्टोरी ऑफ फूलन देवी). किताब कहानी को पुनर्गठित करती है, इंटरव्यू के जरिये, न्यूजपेपर रिपोर्ट्स के जरिए, फूलन देवी से मुलाकातों के जरिए और फूलन देवी के लिखित वर्णन से लिए उद्धरणों के जरिए, जो कि जेल से उनसे मिलने जाने वालों ने तस्करी किये थे, हालांकि एक वक्त में कुछ एक पेज कर-करके ही.

कभी-कभी एक ही वाकये के कई सारे वर्जन - वर्जन जो एक-दूसरे से सीधे टकराते हैं जैसे फूलन का वर्जन, एक पत्रकार का वर्जन, और एक चश्मदीद गवाह का वर्जन - जिन सभी को किताब में पाठकों के लिए प्रस्तुत किया गया है. इससे जो उभरता है वह एक जटिल, बुद्धिमान और इंसानी किताब है. अस्पष्टता, चिंता और उत्सुकता से भरी कि जिस औरत को फूलन देवी कहा जाता है, वह असलियत में है क्या.

शेखर कपूर जिज्ञासु नहीं थे.

उन्होंने खुले तौर पर स्वीकार किया था कि उन्हें महसूस नहीं हुआ कि उन्हें फूलन से मिलने की जरूरत है.  उनके प्रोड्यूसर बॉबी बेदी इस फैसले का समर्थन करते हैं,  "शेखर उससे मिला होता अगर उसे इसकी जरूरत महसूस हुई होती." (संडे ऑब्जर्वर, 20 अगस्त, 1944)

जारी...

लेख के बारे में-

22 अगस्त 1994 को लिखा गया अरुंधति राय का लेख The Great Indian Rape-Trick I, शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन की मानवतावादी (न कि सिर्फ नारीवादी) दृष्टिकोण से फिल्म की आलोचना है. पॉपुलर आयामों में, खासकर कला को एक प्रॉडक्ट की शक्ल देते हुए, हो जाने वाली गलतियों को यह उजागर करता है.

अनुवाद के बारे में- 

करीब 2 साल से इस अनुवाद को पूरा करने की इच्छा थी ताकि हिंदी के पाठक जो अक्सर शेखर कपूर की इस फिल्म को लेकर कई वजहों से लहालोट रहते हैं, इसकी कमियों को भी बारीकी से समझें.

(नोट: इस बड़े लेख का कई हिस्सों में अनुवाद कर रहा हूं. इससे पहले किए किताबों के अनुवाद आप इससे पहले के ब्लॉग में पढ़ सकते हैं. आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Thursday, April 30, 2020

क्या इरफान साब, इतना भी खुद्दार क्या होना कि हमारी दुआएं लेने से भी इंकार कर गए...

फिल्म 'लंचबॉक्स' के एक दृश्य में इरफान खान
इरफान खान की मौत पर भरोसा नहीं है. अंतिम खबर आने से पहले 2 साल तक हमेशा लगा, 'वो वापस आएंगे, फिर से फिल्में करेंगे' लेकिन जैसा वरुण ग्रोवर ने कहा कि इरफान ने "एकतरफा हमें दिया, हमसे लिया कुछ नहीं". वैसे ही पिछले दो सालों में दिल से कई बार निकली दुआ कि 'वो जल्दी से ठीक हो जाएं और फिर से एक के बाद एक फिल्म करें' को भी इरफान खान ने लेने से इंकार कर दिया. मैं ऐसे पेशे में हूं जिसके चलते उनके एक दिन पहले हॉस्पिटल में भर्ती होने की खबर मिल गई थी और यह भी सोचा था कि कोरोना के प्रसार के खतरनाक समय में कैसे तबीयत बिगड़ गई, फिर सोचा, 'कोई बात नहीं, वो इरफान खान हैं, सही होकर वापस आ जाएंगे.'

वापस आने की बात पर इतना विश्वास था कि अगले दिन सवेरे 11 बजे के बाद जब मेरे मित्र अजय ने मुझसे पूछा कि इरफान पर कुछ लिखा है क्या तुमने? तो मैंने उन्हें पलट कर जवाब दिया, "याद तो नहीं लेकिन क्यों लिखना है, वो तो ठीक हो जाएंगे न!" मुझे विश्वास ही नहीं था कि उन्हें कुछ हो सकता है. अंतिम खबर पा जाने के बाद भी इरफान के बारे में लिखना कई वजहों से टालता रहा. लेकिन अजय ने कई बार कहा तो मैंने तय किया लिखूंगा. हालांकि अब भी मुझे खुद पर विश्वास नहीं है. ऐसा लग रहा है कि सूरज को टॉर्च की रौशनी दिखाने जा रहा हूं. फिर भी अपनी बात रखता हूं.

पहली बात मुझे अब भी विश्वास नहीं कि वो नहीं रहे. लिखना इसलिए भी टाला कि लग रहा था जब लिखूंगा तो स्वीकारना पड़ेगा, वो नहीं रहे. दूसरी बात, इरफान खान को जब-जब एक्टिंग करते देखा तो लगा कि जैसे यही तो सहजता है, कोई प्रयास ही नहीं. कोई परफॉर्मेंस प्रेशर नहीं. ये आदमी यही तो कर रहा है, हमेशा से. इसके लिए क्या तारीफ करूं. मेरे लिए इरफान की एक्टिंग सूरज की तरह थी, जो आती-जाती रहती है. उसकी कमी तब महसूस हो रही है, जब धीरे-धीरे एहसास हो रहा है कि अब वह नहीं होगी, कभी नहीं होगी. हमें पता होता था, इरफान खान फिल्म में हैं तो बिना ज्यादा सोचे फिल्म देख लेनी है, फिल्म से कुछ मिले न मिले, इरफान निराश नहीं करेंगे. मैंने कभी एक लेख में लिखा था कि रवि किशन जिस फिल्म में झांककर चले जाते हैं, उसमें भी उनका रोल याद रह जाता है. क्या यह इरफान पर लागू नहीं होता. कुछ सेकेंड का सीन 'सलाम बॉम्बे' का मुझे आज भी याद है. एक 'डॉक्टर की मौत' का रिपोर्टर, कोई भूल सकता है उसे क्या?

उनके न रहने पर मेरी शुरुआती प्रतिक्रिया इस खबर को नकारने वाली थी. मैंने इस पर न सोचने, इसे न मानने का निश्चय किया था. वैसे मेरे लिए एक बात चौंकाने वाली रही. मैंने देखा लोग उनकी अंतिम खबर पर रो रहे थे. मैंने दसियों लोगों से इस पर रोते देखा और सुना. मैंने इंस्टा चेक किया, हर एक पोस्ट इरफान पर थी. मैंने वॉट्सएप स्टोरी चेक की, हर स्टोरी इरफान पर थी. मैंने सोचा ऐसा क्या था इस बंदे में कि सिनेमा-विनेमा से कोई लगाव न रखने वाले लोग भी इस तरह से महसूस कर रहे हैं. मैंने अपनी भावनाओं में इसका उत्तर ढूंढने की कोशिश की. मुझे समझ आया कि ये सारे ही लोग अभी इरफान से बहुत कुछ चाहते थे, मेरी ही तरह ये रोज सूरज को दिन लेकर आते देखना चाहते थे. उन्हें एहसास हो रहा है कि अब उनकी एक्टिंग और देखने को नहीं मिलेगी और वो रो रहे हैं, मातम कर रहे हैं. यह सोचकर मेरा दिल बैठने लगा. तबसे से जब-जब कभी न देख पाने का एहसास हो रहा है. बहुत बुरा लग रहा है. मैं अब भी स्वीकारना नहीं चाहता ऐसा हुआ है.

एक और बात बता दूं कि मैं इरफान खान का फैन नहीं रहा हूं. मैंने अपने आपको जिनके फैन के तौर पर हमेशा स्वीकारा है, वे हैं केके मेनन और विजयराज. इन दोनों के पास लोगों को चौंकाने के लिए पर्याप्त उपकरण होते हैं. लेकिन यह मानूंगा कि इरफान इनसे कहीं ज्यादा वास्तविक और सहज थे. केके मेनन और विजयराज के बीच कहीं. वह इंटेंसिटी भी और अपना मजाक बनाकर सारी महफिल खींच लेने का माद्दा भी. फिर भी इरफान इतने सहज थे कि उनपर अलग से नोटिस की जरूरत नहीं पड़ती थी, मुझे हमेशा लगा कि यह इरफान नहीं, फिल्म का वह किरदार ही तो है. एक और बात जिसके चलते मैंने लोगों को दुख करते देखा शायद वह यह था कि अभी उन्होंने किया ही क्या था, कितना सब तो अपने साथ लेकर चले गए. अरे आखिर पिछले दशक तक इरफान फिल्मों के केंद्र में कहां थे? वो कहानी में कहीं साइड पर खड़े पूरी फिल्म का ताना-बाना सुलझा रहे होते थे. लेकिन जबसे 'सात खून माफ' और 'लाइफ ऑफ पाई' जैसी फिल्में आईं तब तय हुआ कि इरफान वापस टीवी में खर्च होने नहीं जाएंगे. उनका एक मुकाम है, वे यहीं रहेंगे, सिल्वर स्क्रीन पर प्रमुखता के साथ.

इस घोषणा के बाद हमें वे 'हैदर', 'साहब बीवी और...' फिर अपने सबसे ऊंचे मकाम 'पान सिंह तोमर', 'लंचबॉक्स' और 'पीकू' में दिखे. तय हो गया कि वो इंडस्ट्री को अब तक मिले सबसे बेहतरीन एक्टर्स में से एक हैं. अखबार, मैग्जीन के कॉलम उनकी तारीफों से पटे रहने लगे. लेकिन तबसे उन्होंने फिल्में ही कितनी कीं. बहुत ज्यादा तो 10. दरअसल हम अभी उनसे बहुत चाहते थे, बहुत कुछ. लेकिन एक बंदा जो समाज से ले कुछ नहीं रहा, कब तक एक तरफा देने की प्रक्रिया चलाए रखता, उस खुद्दार शख्स ने तो ईश्वर को हमारी दुआएँ तक कुबूल करने से मना कर दिया था...

PS: बहुत दुख के साथ आज लगातार 21वें दिन (किसी काम की आदत डालने के लिए इतने दिन वह काम करना जरूरी होता है) के ब्लॉग को लिखते हुए मुझे 'द इमैजिंड कम्युनिटीज' के अगले अंक की जगह इरफान खान की मौत के बारे में लिखना पड़ रहा है. अब भी चाहता हूं काश ये बुरा सपना टूटे और मेरी आंख खुल जाए.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Saturday, April 18, 2020

वो टाइमटेबल जो कभी फेल नहीं होता, ऐसे बनाया जाता है

किसी भी टाइमटेबल में निरंतरता जरूर होनी चाहिए
12वीं के तुरंत बाद की बात है. उस दौर की, जो मेरे जीवन में अब तक सबसे निराशाजनक रहा. मैं 12वीं में साइंस को अपने साथ घसीट रहा था और कविताओं-गीतों-गज़लों आदि में रुचि ले रहा था. लेकिन 12वीं में बहुत कम मार्क्स आने के बाद मैंने तय किया कि अब अपने और साइंस दोने के साथ ही अधिक अन्याय नहीं किया जाएगा. इसके साथ ही मैंने ह्यूमैनिटीज को अपने मुक्ति देने वाले रास्ते के तौर पर पाया. लेकिन असल समस्या यह थी कि मैं कभी बहुत संगठित रहकर पढ़ा ही नहीं था. हमेशा मैंने पढ़ाई किसी न किसी दबाव या डर से की थी. और शायद जब 14-17 की अवस्था में पढ़ाई में स्वत: लग सकता था, तब मेरे पास फिजिक्स, केमेस्ट्री और मैथ्स जैसे सब्जेक्ट थे, जो मेरी रूह कंपा देते थे. मैं यहां स्वीकार करूंगा कि मुझे बहुत ही औसत टीचर भी मिले, जो किसी काम के नहीं थे.

खुद से संवाद कीजिए, अपनी कई कमियों को सुधारने में मिलेगी मदद

बहरहाल, जब 12वीं फेल नहीं हुआ और इतने कम नंबरों से पास हुआ कि बता नहीं सकता था, उसके बाद मैंने खुद से अपने पर काम करने के बारे में फैसला किया. मैंने अपने को यह सबसे पहले साफ किया कि देखो सुधरने का और कई चीजों को जीवन में बदलने का समय आ चुका है. कहीं सुना था कि पिछली शताब्दी में यूरोप के लोग प्रेम का अहसास पाने के लिए खुद को ही प्रेमपत्र लिख देते थे, जिसे यूं लिखा जाता था कि जैसे किसी प्रेमी/प्रेमिका ने उसे लिखा हो. फिर जब वह पत्र उनके पास लौटकर आता तो डाकिए से उसे ऐसे शर्माते हुए रिसीव करते जैसे वाकई उसे किसी प्रेमी/प्रेमिका ने लिखा हो. ऐसा ही कुछ प्रयोग मैंने अपने साथ किया और खुद को एक भ्रम में रखा. मैंने अपना एक आदर्श बनाया, जिससे सभी चीजें सकारात्मक और सही तरह से किया जाना अपेक्षित था और उससे अपने असली अहम का लिखित संवाद कराया. इसके लिए मैंने पत्र पोस्ट नहीं किए बल्कि अपने आदर्श के लिखे पत्र, अपनी वास्तविकता को सीधे तौर पर पढ़ाए.

मुझे लगता आया है कि संगति का खासा असर आपपर होता है. ऐसे में मैंने अपने तमाम दोस्तों की संगति छोड़, खुद को अपने आदर्श की संगति में डाला. और इसका मुझे फायदा भी हुआ. लेकिन इस बीच सबसे कठिन जो रहा, वो था पढ़ने की आदत डालना. जैसा मैंने बताया कि मैंने ग्रेजुएशन में साइंस को त्यागते हुए ह्यूमैनिटीज के विषय पढ़े. लेकिन यह जितना सोचा गया, उतना आसान नहीं रहा. पॉलिटिकल साइंस का मुझे P भी नहीं समझ आता था. फिर भी पूरे मनोयोग से इसके समझ आने के लिए रणनीतियां बनाता रहा. अभी तो ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन के स्तर पर कोचिंग भी दे सकता हूं. लेकिन सब्जेक्ट में घुसपैठ के लिए मैंने हर लाइन को लिख-लिख कर पढ़ना शुरू किया.

सारे ही प्रयासों में निरतरंता स्थापित करना पाना बहुत जरूरी बात

लेकिन सारे प्रयासों के बावजूद, एक चीज के बिना सारा पढ़ा-लिखा बर्बाद हो रहा था. और वह एक चीज थी, निरंतरता. मैं यह स्वीकार करना चाहूंगा कि यही मेरी अब तक कि सबसे बड़ी उपलब्धि रहा है. और यह निरंतरता पैदा हुई 'डेली डे डिजाइनर' नाम के एक टूल से. जिसे मैं शॉर्ट में 'डी3' कहा करता था. इसमें कुछ खास नहीं होता था. मैं लिखित में अपने अगले दिन की प्राथमिकताओं को सोने से पहले लिख लेता था. साथ ही उस दिन के बारे में एक टिप्पणी भी दर्ज करता चलता था ताकि खुद को स्पष्ट रहे कि मेरे प्रयास काम आ रहे हैं या नहीं.
उतार चढ़ाव दिनों के हिसाब से आते रहेंगे लेकिन आप इनका हिसाब रखने की कोशिश करें तो अच्छा
निरंतरता सिर्फ कई दिनों तक कुछ करते जाना नहीं है. बल्कि एक खास लक्ष्य के साथ और अपने प्रयासों का मूल्यांकन करते हुए कई दिनों तक एक ही विषय पर काम करना है. ऐसे में अब मेरा सालों-साल एक ही विषय पर जुटे रहना मुझे जल्दी सीखने में मदद करता है. इसके अलावा सबसे बड़ी बात की वह मुझे बहुत ज्यादा सुकून देता है. इसलिए मैं यहां पर कुछ बिंदुओं में इसके पीछे अपने कदमों का खुलासा कर रहा हूं-

1. आपको सबसे पहले अपनी प्राथमिकता के कामों की लिस्ट बनानी है. और बाकी कुछ भी करने से पहले उन्हें कर लेना है. जरूरी है कि यह लिस्ट बेहद सोच-समझकर बनाई जाए. ये लिस्ट क्या किया जाए वाले कामों की होने के बजाए, क्या किया जाना है की होनी चाहिए. वरना ये तय है कि आप वे काम नहीं कर पाएंगे.

2. तय करें कि आपके मिजाज के हिसाब से किसी दिन के कामों में सबसे कठिन क्या है? करते समय क्या सबसे ज्यादा समय लेने वाला है. इसके जवाब में जो काम सामने आए, आप सबसे पहले उसे करें. जैसे फिलहाल लिखना मेरे लिए सबसे ज्यादा मुश्किल हो रहा था तो मैं सबसे पहले लिख रहा हूं और उसके बाद ही कोई काम करता हूं.

3. किसी खास दिन में करने को सीमित काम ही अपने पास रखें. बहुत ज्यादा काम किसी दिन के लिए तय कर लेने से आपको रोजमर्रा के काम करने में बहुत परेशानी होगी और कामों के हो जाने से मिलने वाली संतुष्टि के बजाए आपको असंतुष्टि ही होगी.

4. कोशिश करें कि अपनी सफलता और असफलता दर्ज करें. इससे आपको न सिर्फ अगले दिन और अच्छा करने का प्रोत्साहन मिलेगा बल्कि कुछ मुश्किल कर लेने पर खुशी भी होगी. मैं तो अपने आपको डेली 10 में से कुछ प्वाइंट्स दिया करता था.

5. उठने और सोने के समय को नियत रखिए, यह अगर गड़बड़ होता है तो पूरे दिन का ढांचा और प्लानिंग गड़बड़ा जाती है और आपको उसमें बदलाव करने पड़ते हैं.

6. दोस्तों और साथियों के साथ आगे की प्लानिंग को भी ज्यादातर तय रखने की कोशिश करें. या एक समय नियत कर लें और उन्हें भी इसके बारे में बता दें. अपनी इस प्रायोगिक जीवनशैली के बारे में सभी को जानने दें, छिपाएं नहीं. आपका विश्वास इससे खुद पर बढ़ेगा.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Friday, April 17, 2020

क्या हमउम्र लोग बिना किसी लालच, एक ही मकसद के लिए कर सकते हैं काम? हां, कठफोड़वा ने किया

उबंटू दक्षिणी अफ्रीकी देशों में प्रचलित एक विचार है
आपने यूं हंसी-मजाक के लिए, किसी ट्रिप पर जाने के लिए, पार्टी के लिए, ट्रेक पर जाने के लिए तो एक ही उम्र के लोगों को साथ आते देखा होगा लेकिन इस देश में विरले ही होता है कि बिना संस्थागत प्रयास के ऐसा संभव हो कि एक ही उम्र के लोग साथ आकर लिखने-पढ़ने के लिए कोई काम करें, वह भी तब जब वे दोस्त न हों (बाद में भले ही दोस्त बन जाएँ). मैंने अपने से अधिक उम्र वालों से अक्सर ऐसी बातें सुनी हैं कि मेरे जो दोस्त थे, वे मेरे साथ अब संपर्क में नहीं हैं. इसके साथ ही वे ऐसा होने के पीछे तल्ख वजहें भी बताते हैं. यह नॉर्मल भी लगता है. लेकिन अगर वे यह कहते हैं कि जो कभी उनके बहुत करीबी थे और आज उनके विरोधी हैं तो थोड़ा अजीब भी लगता है. ऐसे में दोनों ही ओर से कहीं न कहीं चूक हुई है. आज इन्हीं चूक पर बात करेंगे.

करीब तीन साल के मुक्त विचारों के लिए काम कर रहा समूह

इससे जुड़ी बातें मेरे पर्सनल एक्सपीरियंस पर आधारित हैं. मैंने 2017 के आखिरी 6 महीनों में एक ग्रुप बनाया. मैंने लगातार उन लोगों से बात की जो अच्छा लिख सकते थे और जिनमें मुझे नयापन लगता था और उनसे इस ग्रुप में शामिल होने को कहा. लेकिन इसमें खास बात यह थी कि व्यक्तिगत स्तर पर मैं उनमें से सिर्फ 1 को अच्छे से जानता था और हम दोनों की करीब-करीब रोज़ की बातचीत वाली दोस्ती थी. बाकी 3 के साथ मेरी चलते-फिरते की जान-पहचान थी. हम सभी पांच का एक ही मकसद था एक वेबसाइट चलाना, जिसका नाम कठफोड़वा है. शुरुआती दिनों में मैंने और उन सभी ने उसपर बहुत मेहनत की. हालांकि वेबसाइट चली नहीं लेकिन यह ग्रुप चला. इस कोर ग्रुप का एक आउटर ग्रुप भी था, जिसमें दसियों लोग शामिल थे, खास बात यह है कि वह आउटर ग्रुप भी काफी हद तक बाकी है. लेकिन असली सफलता कोर ग्रुप की गतिविधियां रही हैं. हम पांचों शुरुआती दौर से अब बहुत आगे निकल चुके हैं. हमारे बीच में जबरदस्त असहमतियां हैं लेकिन कभी लड़ाई नहीं हुई. हममें से अधिकतर लगातार जबरदस्त तरीके से पढ़ने और लिखने में लगे हुए हैं और बाकी लगातार उनके विचारों की, उनके पढ़े हुए के आयाम निकालने की कोशिश करते रहते हैं और सामूहिक तौर पर यह पूरी तरह से सफल प्रयोग है.

दक्षिणी अफ्रीकी देशों में बहुचर्चित है उबंटू का विचार

इसकी वजहें क्या हैं? इसकी वजह है 'उबंटू'. वैसे उबंटू का साधारण अर्थ बताया जाता है, 'मैं हूं क्योंकि हम हैं' लेकिन इसका वास्तविक मतलब इससे कहीं ज्यादा वृहद और कॉम्पलेक्स है. दक्षिणी अफ्रीकी देशों में इस विचारधारा का खासा चलन है. और यह 1980-90 के दौर में काफी चर्चित हुई. नेल्सन मंडेला के 1994 में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने के बाद इसे अफ्रीकी देशों के बाहर भी जाना गया. जिम्बाब्वे में पहले से राजनीतिक रूप से स्वीकार्य इस विचार को दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद-नस्लभेद विरोधी आंदोलन में राजनीतिक मान्यता मिली. जिसके बाद बने अंतरिम संविधान (1993) में इसे यूं शामिल किया गया, "एक-दूसरे को समझने की जरूरत है-प्रतिशोध की नहीं, प्रतिपूर्ति की जरूरत है-बदले की नहीं, उबंटू की जरूरत है-जुल्म की नहीं."

उबंटू का पालन करते हुए प्रतिस्पर्धा कहीं खो जाती है

तो हम सबने ही उबंटू का पालन किया है. हालांकि पालन हमने पहले कर लिया और इसके बारे में विस्तार से बाद में जाना. या यूं कह लें कि जिन तरीकों को हम प्रैक्टिस में ला रहे थे उन्हें बाद में हमने उबंटू के तौर पर पहचाना. पहले सिर्फ इसका नाम भर सुना था और इसकी अफ्रीकी जड़ों के बारे में जानते थे. हमने एक-दूसरे की स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार किया. हमने एक-दूसरे के अलग व्यक्तित्व और हुनर को सम्मान दिया. इस दौरान हमारे पक्ष में एक बात यह हुई कि लगभग हम सभी अलग-अलग रोजगार के क्षेत्र में हैं, इसलिए प्रतिस्पर्धा की कोई भावना ही नहीं है. वैसे असलियत तो यह है कि जब आपने सामने वाले की खासियतों को स्वीकार कर लेते हैं तो आप उसकी यूनिकनेस को भी समझते हैं. ऐसे में प्रतिस्पर्धा की कोई बात ही नहीं रह जाती. बल्कि आप चाहते हैं कि आपके बीच में ज्ञान का आदान-प्रदान होता रहे ताकि आप अपने-आप में ही कूप-मंडूक बनकर न रह जाएं बल्कि दूसरे स्वतंत्र तौर पर किसी विषय पर कैसा सोच रहे हैं, उससे भी लाभ ले सकें. हम रोज़ ही किसी न किसी विषय पर लड़ रहे होते हैं लेकिन इस लड़ाई के दौरान हम बहुत कुछ सीख भी रहे होते हैं. और कभी उबंटू के विचार से बाहर जाकर स्वतंत्र होने के बारे में नहीं सोचते.

आज भी बहुत आसानी से चलता है हमारा काम

जिस तरह वैचारिकता के स्तर पर कठफोड़वा सफल रहा है आशा है कि आप भी ऐसे छोटे-बड़े वैचारिक समूहों का निर्माण इस विचार के आधार पर कर सकेंगे. यूं तो कठफोड़वा की वेबसाइट नहीं चल सकी. लेकिन जिन दिनों में यह लगातार काम कर रही थी, इसके पांच एडिटर थे और फिर भी यह बिना किसी गतिरोध के चल रही थी. साथ ही इसे बनाने वाला मस्तिष्क समूह आज भी पूरी क्षमता के साथ काम कर रहा है. यह हमउम्रों के साथ काम करने के लिए आजमाने पर खरा पाया गया फॉर्मूला है. मुझे जानने वाले कई लोगों को आश्चर्य होता है कि चाहे वेबासाइट के लिए सभी से मांगा गया एक निश्चित रकम का सहयोग हो (वेबसाइट जिसके चलते आज भी फंक्शनिंग है) या किसी लेख पर सभी से मांगे गए विचार, हमेशा समय से सहयोग आ जाता है. साथ ही यहां किसी हायआर्की के अभाव में लोगों को अपने विचारों को पूरे एक्सपोजर के साथ पेश करने का मौका भी मिलता है. आशा है हमें भविष्य में इसके और प्रयोग देखने को मिलेंगे.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Tuesday, April 14, 2020

किताबें क्यों पढ़ें, कब पढ़ें, कहां पढ़ें और कैसे पढ़ें?

पूरी किताब एक बार में पढ़ने के बजाए, रोज़ थोड़ी-थोड़ी पढ़ें
एक रिसर्च में पाया गया कि रोज 30 मिनट किताब पढ़ने वालों की उम्र में करीब 2 साल की बढ़ोत्तरी हो जाती है. यह भी पाया गया कि ऐसे लोगों की नौकरी में तरक्की की संभावना अपने सहकर्मियों की अपेक्षा ज्यादा होती है. तो सवाल यह उठता है कि आखिर किताबों में ऐसा भी क्या है, जो ये इतनी जादुई साबित हुई जा रही हैं. दरअसल किताबों में एक ही विषय पर लंबे समय तक टिकाए रहने का गुर, तसल्ली और सुकून है, बाकी जानकारी जो है, सो तो है ही.

अक्सर किताबें पढ़ने के लिए लोग सुझाव देते दिखते हैं. अक्सर इसके फायदे गिनाए जाते हैं. लेकिन किताब पढ़ना इतना आसान काम नहीं. अगर आप कोई ठीक-ठाक किताब पढ़ने के लिए उठा रहें हैं तो यह है कि उसे पढ़ने में आपको 10 से 20 घंटे का समय लगेगा. ऐसे में किताब पूरी कर पाना. उसमें अपना इंट्रेस्ट बनाए रख पाना आसान बात नहीं होती. इसलिए आज क्रमवार अपने अनुभव रख रहा हूं कि किताब क्यों पढ़ें, कब पढ़ें, कहां पढ़ें और कैसे पढ़ें?

पहला सवाल- किताब क्यों पढ़ें?

यह इस प्रक्रिया का सबसे अहम सवाल है. अगर आप स्टूडेंट हैं और रोज़ ज्यादा से ज्यादा नई चीजें जानने-समझने के लिए ही आपके पास सारा समय है तो आपसे किताबों के महत्व के बारे में बात करना बेईमानी है. लेकिन फिर भी बात इसलिए की जानी चाहिए क्योंकि आजकल इंटरनेट के चलते स्टूडेंट्स भी किताबों को छोड़कर इंटरनेट भरोसे हो चुके हैं. लेकिन मैं यहां यह साफ कर देना चाहता हूं कि इंटरनेट पर जानकारियां जुटाकर एक बार को किसी विषय या घटना के बारे में जाना जरूर जा सकता है लेकिन उसकी प्रक्रिया को लेकर एकदम निश्चित नहीं हुआ जा सकता. उसके लिए या तो आपको उस पर डॉक्यूमेंट्री देखनी होगी या किताब पढ़नी होगी. हर विषय पर एक्सप्लेंड वीडियो डॉक्यूमेंटेशन मिल पाना अब भी संभव नहीं हो सका है. साथ ही अगर यह मिल भी जाता है तो कई बार इसमें सभी जरूरी तत्व शामिल नहीं किए जा पाते इसलिए अच्छा यही होता है कि सब्सटीट्यूड तलाशने के बजाए किताबों से ही विषय को कवर किया जाए. किताब से किसी विषय को कवर करते हुए आपको उस विषय के साथ भी लंबा समय गुजारने का मौका मिलता है. ऐसे में उस विषय से न सिर्फ आपकी पहचान और जानकारी में बढ़ोत्तरी होती है बल्कि आपका उस विषय के प्रति लगाव और प्रेम भी बढ़ जाता है.

लेकिन अगर आप स्टूडेंट नहीं हैं और आपके पास नौकरी या व्यापार करते हुए अन्य कामों के लिए सिर्फ सीमित समय ही बचता है तो क्या आपको किताबें ही पढ़नी चाहिए. जी बिल्कुल, जैसा कि ऊपर बताया गया कि नौकरी में तरक्की की आपकी संभावना इससे बढ़ सकती है. मैं सिर्फ अनुमान लगा रहा हूं कि ऐसा क्यों होता होगा? दरअसल किताबें पढ़ते हुए हमारी एक ही विषय पर देर तक ध्यान लगा पाने की क्षमता का अनजाने ही विकास हो जाता है. ऐसे में न सिर्फ ऑफिस के काम हम अच्छे से कर पाते हैं बल्कि हमारे पास उन्हें करने के लिए अच्छे सुझाव भी होते हैं. इतना ही नहीं हम जल्दीबाजी में निर्णय लेने से, कोई बात कहने से भी खुद को रोक पाते हैं. सीधे तौर पर कहें तो किताबें आपकी व्यक्तिगत कूटनीतिक क्षमता का विकास करती हैं. लेकिन नौकरी-पेशा लोगों को इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि अक्सर वे किसी न किसी दबाव में रहते हैं और किताबें उस दबाव को कम करने में या परेशानियों के बेहतर उत्तर ढूंढने में बहुत मदद करती हैं. ऐसे में किताबें पढ़ना दबाव में काम करने वाले इन लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में भी मदद करती है.
अगली बार जब सोशल मीडिया स्क्रॉल करने का मन करे तो किताब लेकर बैठ जाएं

अगला सवाल- किताबें कब पढ़ें?

किताबें तब पढ़ें जब आप सोशल मीडिया स्क्रॉल करना चाहते हों. आज के कुछ समय पहले शायद मैं इस जवाब को अलग तरीके से दे रहा होता. लेकिन अनुभव से यह सीखा हूं कि अगर आप सोशल मीडिया स्क्रॉल करना चाहते हैं तो इसका मतलब है कि आप फिलहाल खाली हैं और आपके समय काटना चाहते हैं तो सोशल मीडिया पर तस्वीरें और व्यक्तिगत विचार पढ़ने के बजाए वही 20 मिनट-आधे घंटे का समय किताबों को दीजिए. इस तरह महीने भर में एक अच्छी किताब खत्म कर देंगे और किसी किताब को रोज थोड़ा-थोड़ा पढ़ने से आपके अंदर निरंतरता की आदत स्वत: पैदा हो जाएगी, जो जिंदगी के दूसरे काम करने में भी आपके बहुत काम आएगी. निरंतरता के जरिए आप रोज़ थोड़ा-थोड़ा अभ्यास करके कोई भाषा सीख सकते हैं. कोई कलाकृति बना सकते हैं और अपनी बुरी आदतों में सुधार भी ला सकते हैं. ऐसे में हम कह सकते हैं कि किताब के जितने फायदे दिखते हैं, हैं उससे कहीं ज्यादा.

इसके अलावा अगर आप नियमित और संतुलित जीवन पहले से ही जीने के हामी हैं तो कोशिश करें कि सवेरे किताब पढ़ सकें. नियमित व्यायाम वगैरह कर, अखबार वगैरह देखने के बजाए, थोड़ी देर किताब भी पढ़ लें फिर अपने काम-धाम में जुटें. ऐसा करने से आपके दिमाग के पास सोचने के लिए फर्जी की चिंताओं और डर से इतर कोई किस्सा-कहानी या कोई जानकारी होगी और आप हल्का महसूस करेंगे. रात को भी सोने से पहले थोड़ी देर पढ़ा जा सकता है. पढ़ते हुए भी सोया जा सकता है लेकिन अगर आप ऐसा कर रहे हैं तो सोते हुए कोई फिक्शन-थ्रिलर वगैरह पढ़ने के बजाए कोई गरिष्ठ विषय वाली किताब पढ़ें, जिससे जल्दी नींद आ जाए. एक और बात यह कि जब तरोताजा महसूस कर रहे हों, उस समय किताब पढ़ने से सबसे अधिक फायदा होगा.

अगला सवाल- किताबें कहां पढ़ें?

सीधे किताब पढ़ने का कोई विकल्प नहीं है लेकिन धीरे-धीरे तकनीकी की मदद से किताबें पढ़ने के कई विकल्प सामने आ चुके हैं. इसमें सबसे अच्छा और कई लोगों को भा चुका विकल्प है किंडल. शुरुआती दौर में तो किंडल पर किताबें सस्ते में उपलब्ध थीं लेकिन अब उसके प्रमोशन का दौर खत्म होने के बाद ऐसा नहीं रह गया है. ऐसे में पहले से ही किताब पढ़ने का मंहगा विकल्प किंडल खरीद, उसमें भी मंहगी किताबें खरीदने से आपकी जेब पर वजन पड़ना तय है. ऐसे में यह किया जा सकता है कि किंडल खरीदकर उसमें किताबों को जुगाड़ अपने किसी ऐसे दोस्त से करवाया जाए, जो किंडल के लिए किताबें जुटाने के खेल को समझता हो. अंग्रेजी में किंडल पर किताबें जुटाना कोई मुश्किल काम नहीं हैं. हालांकि हिंदी के लिए किंडल पर सीमित किताबें भी हैं. लेकिन ये लगातार बढ़ रही हैं और किंडल पर किताबें पढ़कर आराम से उसका पैसा वसूल किया जा सकता है.

कई मोबाइल ऐप भी पढ़ने में मदद कर सकती हैं लेकिन मोबाइल की स्क्रीन पढ़ने के लिए मुफीद नहीं होती और पाठक की आंखों पर अनावश्यक जोर पड़ता है इसलिए मोबाइल पर पढ़ने से बचें. हालांकि मोबाइल पर किताबों के ऑडियो टेप जरूर सुने जा सकते हैं. हालांकि किताबें सुनने और पढ़ने का एक्सपीरियंस काफी अलग है लेकिन आखिरकार आपको किताबों से तुरंत क्या ही मिलता है, आनंद और जानकारी. दोनों ही चीजें आपको ऑडियो टेप से भी मिल जाएंगीं. किताबें पढ़ें, जरूरी नहीं कि किताबें खरीदकर ही पढ़ें. किताबें मांगकर भी पढ़ सकते हैं. मांगकर पढ़ने से लौटाने की बात दिमाग में होने से किताबें एक तय समयसीमा के भीतर ही पढ़ ली जाती हैं.

एक बार में एक किताब पढ़ने के बजाए दो या दो से ज्यादा किताबें पढ़ने की कोशिश करें

अगला सवाल- किताबें कैसे पढ़ें?

बहुत से लोग एक ही बैठक में किताब खत्म करने का दंभ भरते हैं. मुझे यह तरीका बिल्कुल पसंद नहीं है, खासकर तब जब किताब में 50-60 पन्नों से अधिक हों. किताब को एक बैठक में पढ़ने से आप उसके कुछ सबसे जरूरी बिंदुओं को नजरअंदाज कर सकते हैं. जिससे किताब पढ़ने का बहुत काम फायदा होता है. इसलिए किसी किताब को खत्म होने तक रोज़ थोड़ा-थोड़ा पढ़ा जाना चाहिए. सिर्फ उतना ही जितना एक बार में समझा जा सके. मैं इसी विधि से पढ़ता हूं. डिजिटली आप किताब पढ़ते हैं तब तो किताब सीधे उसी जगह से खुल जाती है लेकिन अगर आप किताब भी पढ़ रहे हैं तो बुकमार्क वगैरह के चक्कर में मत पढ़िए, रोज़ पढ़िए. रोज पढ़ेंगे तो कभी नहीं भूलेंगे कि कहां पर थे, इससे पहले.

इसके अलावा कोशिश करें कि एक साथ दो या उससे भी ज्यादा किताबें पढ़ें. अलग-अलग भाषाओं की किताबें भी पढ़ सकते हैं. ऐसे में न सिर्फ लेखन की बारीकियों, व्याख्या की बारीकियों को समझेंगे बल्कि बातें रखने का हुनर भी सीख जाएंगे. बाकी कभी इस पर विस्तार से लिखूंगा कि नो नॉनसेंस रीडर कैसे बना जाए? आज के लिए इतना ही.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.) 

Monday, April 13, 2020

ये 5 तरीके अपनाकर नींद के लिए इस्तेमाल होने के बजाए नींद को खुद के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं आप

नींद को लेकर अक्सर डांट लगाई जाती है, हिदायतें दी जाती हैं लेकिन इसे समझने की कोशिशें कम ही होती हैं...
सोने को लेकर अक्सर बहुत बातें होती हैं. बहुत से लोगों का इस पर कोई अधिकार नहीं होता. कई लोग ऐसे होते हैं जो पढ़ने की कोशिश करते हुए अक्सर सो जाते हैं. कई बार लोग परेशान दिखते हैं कि उन्होंने क्या-क्या चीजें अगले दिन करने को सोच रखी थीं लेकिन अपनी नींद के चलते नहीं कर सके. इसलिए सोने पर मेरे अनुभवों की बात बताता हूं.

एक बात तय है कि नींद एक बायलॉजिकल प्रक्रिया है. जाहिर है इसकी बायलॉजी के बारे में मैं कोई सुझाव नहीं दे सकता. लेकिन असमय सोने, टूटी-टूटी नींद सोने और कम से कम सोकर ज्यादा से ज्यादा काम करने के बारे में सुझाव दे सकता हूं. लेकिन इन सुझावों से पहले मैं अपनी नींद की प्रैक्टिस के बारे में कुछ विचार साझा करना चाहूंगा.

नींद कोई बुरी चीज नहीं, ईश्वर की ओर से आपकी 'डेली फ्री सर्विसिंग' का तोहफा

मैं एक ऐसे परिवार का सदस्य रहा हूं जो आजीवन 5 से साढ़े 5 के बीच उठता आया है. ऐसे में बचपन से 16-17 साल की उम्र तक मुझे भी 6 बजे तक उठना ही पड़ता था. जिसके बाद मुझे पढ़ने के लिए बिठा दिया जाता और मैं फिर सो जाता. इस पूरे दौर में हम रात में 10 से 11 बजे सो जाते थे यानि इस दौरान मैं करीब 7 घंटे की नींद ले पाता था. मैं ज्यादातर साउंड स्लीपर था यानि एक बार सोया तो सीधे सवेरे उठा. लेकिन 18 साल की उम्र होने तक चीजें बदलीं और मैंने नींद को नियंत्रित करने के बारे में सोचा. ऐसा पढ़ाई और सीखने को ज्यादा समय देने के लिए किया गया था.

किशोरावस्था में 7-साढ़े 7 घंटे सोना मुझे बुरी बात नहीं लगती लेकिन 18 साल की उम्र के बाद भी अगर आप रोज़ इतना सोते हैं तो आप रोज़ के हिसाब से अपने एक से डेढ़ घंटे का नुकसान कर रहे होते हैं. आप 6 घंटे सोकर भी काम चला सकते हैं. अगर आप की उम्र 18 से 50 के बीच है और आप रोज़ 7-8 घंटे या उससे ज्यादा सो रहे हैं तो एक बात तय है कि या तो आप जानबूझकर इतनी देर बिस्तर में पड़े रहना चाहते हैं या कई बार उठकर फिर सो जा रहे हैं

आगे बढ़ने से पहले एक बात और समझ लें कि नींद कोई बुरी चीज नहीं है. यह आपके फायदे के लिए ही है. यह आपको तरोताजा करती है. आपके दिमाग में रोज़ भरने वाले कचरे की सफाई करती है. आपकी दिमागी और शारीरिक फंक्शनिंग सही करती है बल्कि सीधे तौर पर कहें तो यह ईश्वर की ओर से आपकी शारीरिक मशीन को दी गई 'डेली फ्री सर्विसिंग' है. लेकिन वर्तमान दौर में अगर आप ज्यादा से ज्यादा सोते हैं तो आप अपने को कई हुनर सीखने, कई बातें जानने या कई काम कर पाने से महरूम कर रहे होते हैं. इसलिए नींद का दुश्मन नहीं बल्कि दोस्त होते हुए भी मैं चाहता हूं कि कम से कम नींद में अपना काम चलाया जाए.


तो अगर आप की उम्र 18 से 50 साल के बीच है और आप 7 से 8 घंटे या उससे ज्यादा सो रहे हैं तो आप इस तरह से अपनी नींद को मैनेज कर सकते हैं. जो भी तरीके मैं यहां लिख रहा हूं वो सारे ही मैंने खुद पर आजमाए हैं-

1. जरूरी नहीं कि आपका 6 घंटे सोकर काम चल जाए. कम से कम सोना उतना सोना है, जितने में आपको सवेरे उठने के बाद नींद न आती रहे, उतना है आपके लिए कम से कम सोना. कम से कम कितना सोकर काम चलाया जा सकता है, इसके लिए मैंने 2011 में एक तरीका ईजाद किया था. मसलन आप रोज़ 8 घंटे सोते हैं और सीधे तौर पर कहें तो मसलन 12 बजे सोकर 8 बजे जागते हैं तो आप 8 बजे का अलार्म लगाने के बजाए 07:58 का अलार्म लगाइए और कोशिश करके दो मिनट पहले जाग जाइए. अगले दिन 07:56 का अलार्म लगाइए, उसके अगले दिन 07:54 का.

यकीन मानिए ऐसे रोज़ दो मिनट पहले उठने से न ही आपकी नींद पर कोई असर होगा और न ही आपके शरीर पर. इस तरह से आप चाहें तो अपनी नींद को 1 महीने में 8 से 6 घंटे पर ला सकते हैं. लेकिन अगर आपको 6 घंटे सोने से सवेरे भी नींद आ रही है तो आपको इसी क्रम में बढ़ाकर भी चेक कर लेना चाहिए कि इससे कितने मिनट ज्यादा सोऊँ कि सवेरे नींद न आए. नींद की क्वालिटी पर भी निर्भर करता है कि आप कितनी देर सोएं. ऐसे में पूरी कोशिश करें कि रात में कोई आपको डिस्टर्ब न करे, न उठाए. और अगर आपकी नींद रात में कई बार खुलती हो तो डॉक्टर से जरूर संपर्क करें.

2. ऊपर वाले क्रमिक तरीके से अलग है इंस्टेंट तरीका. आपको सीधे 8 घंटे की नींद से साढ़े 6 घंटे की नींद पर अलार्म लगाकर उठ जाना चाहिए. यह थोड़ी मुश्किल बात होगी. लेकिन अगर आप ऐसा लगातार 3-4 दिन करने में सफल हो जाते हैं तो आपकी आंख रोज उतने ही समय खुलनी शुरू हो जाएगी. इस कदम को उठाने में अधिक इच्छाशक्ति की जरूरत होती है और मैं इसे अपनाने पर बहुत जोर नहीं देता लेकिन मैंने जैसे ऊपर के तरीके को खुद पर आजमाया है, इसे भी आजमाया है और दोनों ही सफल रहे हैं.

3. तीसरा तरीका है दो नींद का तरीका. लेकिन इसे सिर्फ खुद का व्यापार करने वाले और स्टूडेंट्स ही अपना सकते हैं. यह तरीका हमारी सभ्यता में पुराने समय से मौजूद रहा है. इसके मुताबिक नींद को दो भागों में तोड़ दिया जाता है. एशियाई सभ्यताओं में जल्दी जागने का महत्व रहा है. बहुत सवेरे से ही लोग अपने काम-धंधे शुरू कर देते हैं. आप आज भी उत्तर भारत के गांवों में जाएंगे तो देखेंगे कि महिलाएं 12 बजे तक कुछ न कुछ काम में लगी रहती हैं और फिर सवेरे ही 5 बजे उठकर काम शुरू कर देती हैं. शहरों और कस्बों में भी छोटे दुकानदार दोपहर के दो-तीन घंटे दुकानें बंद कर नींद लेते हैं. चीन में तो कई ऑफिस में भी यह नीति लागू है.
आप भी ऐसे ही रात में 4.5 से 5 घंटे की नींद लेकर बाकी 1.5 से 2 घंटे की नींद दिन में ले सकते हैं लेकिन दोनों ही नीदों का समय नियत रखें वरना इसमें खलल पड़ेगा. यह बढ़िया तरीका है, मैंने कई दिन अपनाया और आदत पड़ जाने पर इसका अच्छा असर रहा. लेकिन ध्यान रखें कि नींद के दो से ज्यादा टुकड़े न करें और एक टुकड़ा कम से कम 5 घंटे के आसपास जरूर रहे.

4. नींद एक बायलॉजिकल प्रक्रिया है इसलिए हमारी बायलॉजिकल क्लॉक के साथ सिंक होती है. हम जिस समय उठते हैं, उसी समय हमारी आंखें रोज़ खुलनी शुरू हो जाती हैं जब तक सोने के समय में या नींद के दौरान कोई खास व्यवधान न खड़ा हो. ऐसे में कोशिश करें कि एक नियत समय सोएं भी. रात में मोबाइल न चलाकर अपने दिमाग और आंखों को कम से कम स्ट्रेस दें ताकि कम से कम नींद से आपकी सर्विसिंग हो सके. मेरे लिए सोने जाते हुए कोई हल्का पॉडकास्ट या म्यूजिक सुनना अक्सर फायदेमंद रहा है, आप भी इसे ट्राई कर सकते हैं.

5. सोने से पहले आप घर या किसी खास के नंबरों के लिए अलग कॉलरट्यून लगाकर, अपने फोन को साइलेंट पर भी कर सकते हैं. ताकि घर जरूरी फोन के अलावा कोई और आपको डिस्टर्ब न करे. आप भी किसी को देर रात फोन न करें. सोने से पहले यह जरूर सोच लें कि कल करने के लिए आपके पास क्या-क्या जरूरी काम हैं और दिमाग में उनके लिए एक खाका बना दें कि किस समय, क्या काम करना है, इससे भी आपको जल्दी और एक बार अलार्म बजते ही उठने में मदद मिलेगी. लेकिन कितने भी जरूरी काम हों, उतनी नींद जरूर लें, जितनी आपको जरूरी लगती है.

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Friday, April 10, 2020

इन 5 तरीकों को अपनाकर 1 दिन में निपटाया जा सकता है पूरे हफ्ते का काम!

इन पांच तरीकों को अपनाएंगे तो एक दिन में ही निपटा सकते हैं हफ्ते भर के काम (फोटो क्रेडिट- NYT)
मैं रोज़ अमूमन एक किताब के बीस पेज पढ़ता हूं. एक समय में मैं तीन किताबें औसतन पढ़ रहा होता हूं. यानि अख़बार से इतर 60 पन्ने मैं रोज पढ़ता हूं. लेकिन हमेशा ऐसा चलता रहे मुझे पसंद नहीं. जैसे लोगों को नहीं पसंद होता कि वे रोज़ घर पर एकसार खाना खाएं. वे रेस्टोरेंट जाना चाहते हैं. कुछ तला-भुना घर पर ही खाना चाहते हैं. वैसे ही 'फॉर अ चेंज' मैं अपने इस प्रॉसेस को एक्सिलरेट कर देता हूं.

हर किताब 20 पेज रोज़ पढ़कर उसका आनंद नहीं लिया जा सकता और न ही इस तरह उसकी तासीर का लुत्फ लिया जा सकता है. फिक्शन के मामले में यह बात ज्यादा लागू होती है. इसलिए कई बार एक दिन निकालकर पूरी किताब खत्म कर देता हूं. मसलन कल की बात करूं तो करीब आधी 'ब्रेव न्यू वर्ल्ड- ऐल्डस हक्सले' मैंने कल ही खत्म कर दी. इसके अलावा 'मेडागास्कर' नाम की एक एनिमेशन फिल्म भी देखी. दो चैप्टर 'प्राइड एंड प्रिज्यूडिस- जेन ऑस्टिन' के पढ़े. डुओलिंगो पर करीब 100 प्रैक्टिस प्वाइंट्स जुटाए. एक घंटे का पॉडकास्ट बीबीसी ग्लोबल का और एक घंटे का पॉडकास्ट डीडब्ल्यू इनसाइड यूरोप का सुना. एक्सरसाइज की. अगले 18 दिनों का शिड्यूल तय किया. 1 घंटे लिखा. इंटरनेट बैंकिंग से जुड़े महीने भर के काम निपटाए. अपने सारे कपड़े धो दिए-बर्तन भी धोए. नाखून काटे-शेव किया, जो 21 दिनों से ड्यू था.

ऐल्डस हक्सले की किताब ब्रेव न्यू वर्ल्ड के कुछ कवर..

रात के 12 बजने तक मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे मैंने 1 दिन नहीं एक हफ्ता गुजार लिया हो. हालांकि तथ्यात्मकता से कहूं तो इतना काम मैं 3-4 दिनों में करता हूं, एक हफ्ता थोड़ा ज्यादा कह रहा. बहरहाल बात करते हैं, उन चीजों की, जिनके चलते आप ऐसा कर पाते हैं-

1. विज़नरी रहिए-पैशनेट रहिए. यानी सोचकर रखिए कि कौन सी किताब, कौन सी टीवी सीरीज एक साथ खत्म की जानी चाहिए तभी पूरा आनंद आएगा. उसे बचाकर रखिए. और जब मौका मिले तो उसे पूरी तवज्जो दीजिए. उतनी देर मोबाइल आदि का त्याग करके.

2. हालांकि मैंने एक दिन में किए जा सकने वाले कामों के मुकाबले ज्यादा काम किए लेकिन दिन का केवल कुछ हिस्सा ही प्लान्ड था. यकीनन अगर आप पूरे हफ्ते में जरूरी कामों को जुटाकर रखेंगे और वीकेंड पर सारे एक साथ खत्म कर देंगे तो आपको मुझे होने वाली खुशी और संतुष्टि से दोगुनी खुशी-संतुष्टि होगी.

3. रिलैक्सेशन प्लान भी काम का रखिए. मसलन मैं किताब पढ़-पढ़ कर थक गया था. करीब 150 से ज्यादा पन्ने अंग्रेजी में पढ़ने के बाद आंखें और दिमाग दोनों में ही थकान थी. तो इस थकान को मिटाने के लिए मैंने फिल्म देखी- मेडागास्कर. एक हल्की-फुल्की कार्टून फिल्म. लेकिन अच्छा लगा क्योंकि फिल्म क्रिटिकली एक्लेम्ड थी.

4. ऐसे किसी दिन पर मानसिक श्रम वाले काम पहले कीजिए. मैंने कल सबसे पहले लिखा, किताबें पढ़ी, लैंग्वेज प्रैक्टिस की, फिल्म देखी, पॉडकास्ट सुना फिर शारीरिक श्रम वाले काम- कपड़े-बर्तन धोए. शारीरिक श्रम वाले काम के दौरान आप अपना पसंदीदा म्यूजिक इंज्वाय कर सकते हैं, जिससे मानसिक तौर पर थके होने का अहसास न हो.

5. ऐसे किसी दिन के लिए डाइट बहुत जरूरी होती है. यानि इस दिन डाइट ऐसी होनी चाहिए कि आपको खाकर तुरंत नींद न आए. मेरा जोर यह भी रहता है कि आप इस दिन जरूरत से थोड़ा कम खाएं. ताकि भूख लगी रहे जो आपको अपने लक्ष्य की याद दिलाती रहे. लेकिन कम खाते हुए यह जरूर याद रखें कि पोषण की कोई कमी न महसूस हो. ऐसा हुआ तो भी आप काम पूरा नहीं कर पाएंगे.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.) 

Thursday, April 9, 2020

लगातार 21 दिन एक्सरसाइज़ करने और नाखून न चबाने से मिले ये सबक

एक्सरसाइज़ की आदत डालने के लिए अपने हिसाब से इसका चयन बहुत जरूरी है...
21 दिन पूरे हो गए. जो संकल्प लिया था. वह पूरा कर दिखाया. रोज़ एक्सरसाइज की. और नाखून नहीं खाया. अगर इसे मैं सही से रोज दर्ज कर पाता तो शायद आप ज्यादा बेहतर समझते कि कैसे किसी बुरी आदत का निषेध कर अच्छी आदत डाली जाती है और कैसे किसी अच्छी आदत को नए सिरे से डेवलप किया जाता है. चूंकि रोज़ की बात दर्ज नहीं है इसलिए मैं एक ही बार में आपको पूरी प्रक्रिया बताने की कोशिश करता हूं.


एक्सरसाइज की अच्छी आदत कैसे डाली?

पहले बात करते हैं रोज एक्सरसाइज़ की. निस्संदेह मैंने बहुत टाइमटेकिंग प्रक्रिया वाली और बहुत ज्यादा शारीरिक थकान देने वाली एक्सरसाइज उठाई होतीं तो लगातार इतने दिन तक कर पाना नामुमकिन होता. इसलिए मैंने 20-25 मिनट में हो जाने वाली हाथों-पैरों की एक्सरसाइज़ की. इसे आप यूट्यूब पर '1 माइल हैप्पी वॉक' (One Mile Happy Walk) के नाम से सर्च कर पा जाएंगे. यह बहुत मजेदार है और किसी भी समय आसानी से की जा सकती है. इसलिए कई दिन तो मैंने इसे नाश्ते या खाने के बाद भी किया. इतना समय मैं वर्क फ्रॉम होम (Work From Home) के बीच भी निकाल लेता था. इसलिए यह मेरे लिए बहुत कठिन नहीं रही. हालांकि आज से मैं एक्सरसाइज का समय कुछ बढ़ा रहा हूं. साथ ही थोड़े कठिन मूव्स भी आज से ऐड कर रहा हूं.

एक्सरसाइज़ की 21 दिन की स्ट्रीक बनाने या कह लें आदत डालने में मेरे काम ये तीन चीजें आईं-

पहली, खुद को कन्विंस करने वाली आदत का चुनाव (माने कोई ऐसी आदत चुनें जिससे किसी भी तरह का पर्सनल फायदा होने का विश्वास हो), दूसरी, आदत को अपनी दिनचर्या में घुसा पाने की सहजता (माने आप अपने टास्क को कभी भी कर सकें) और तीसरी, इंस्टेंट दिखने वाली प्रगति (माने ऐसा टास्क चुनें, जिसका फायदा आपको जल्द से जल्द दिखे. मसलन मुझे 9 से साढ़े 9 घंटे रोज वर्क फ्रॉम होम करना होता है. इस एक्सरसाइज़ के रुटीन से मेरा पीठदर्द बहुत कम हो गया है, यही इंस्टेंट फायदा है).
20 दिन लगातार नाखून न चबाने के बाद मेरे नाखून

नाखून चबाने की बुरी आदत कैसे छोड़ी?

अब बात करते हैं नाखून खाने की आदत छोड़ने की. यह आदत छोड़ने के लिए शुरुआत से ही मेरे पास जबरदस्त वजहें थीं. लेकिन मेरे पास सिर्फ वजहें थीं, कभी इतना समय नहीं रहा कि बैठकर-विचारकर इसे रणनीतिक तरह से छोड़ा जा सके. बहुत ही साधारण सी रणनीति अभी भी मैंने इसके लिए फॉलो की. मैंने सिर्फ अपने नाखूनों को बढ़ने के लिए छोड़ दिया. 21 दिन तक उन्हें बढ़ने दिया. शुरुआत में इन्हें दांतों से काटने से बचने के लिए प्रयास करना पड़ा. कई बार मुंह में जाते-जाते रोका. एक-आध बार दांत से नाखून दबा भी दिया पर याद आ गया काटना नहीं है. लेकिन जब नखून थोड़े बड़े हो गए तब हमेशा याद रहने लगा और पिछले एक सप्ताह में तो मेरे लिए नाखून चबाना बिल्कुल अजीब बात हो चुकी थी. फिर भी आगे भी इससे कुछ दिन तक बचने का फैसला मैंने किया है ताकि इसे पूरी तरह पुख्ता किया जा सके.

बहरहाल 21 दिन नाखून न चबाने में काम आई ये चीजें-

इच्छाशक्ति (कभी भी किसी बुरी आदत को छोड़ने के लिए यही आपका पहला कदम होगा, इससे अच्छा हो सकता है कि आप बुरी आदत छोड़ने को अच्छी आदत डालने की तरह ही लें और खुद को ये तर्क दें कि इससे आपको क्या पर्सनल फायदा होगा. अगर आपने खुद को इसके फायदों के लिए कन्विंस कर लिया तो इसके खिलाफ इच्छाशक्ति डेवलप करने में बहुत मदद मिलेगी), दूसरी रणनीति, जैसे मैंने नाखून 21 दिन तक बढ़ने दिए ताकि बढ़े नाखून देख याद रहे कि इन्हें नहीं चबाना है. मैं इन्हें पेंट भी कर सकता था लाल रंग से और तीसरी चीज इंस्टेंट प्रगति, यह दूसरे प्वाइंट से ही जुड़ा है. आखिर मैंने अपने इतने बड़े नाखून पिछले 15-16 साल में शायद ही देखे थे. ऐसे में यह सीधी तरक्की जैसा था, जिससे इच्छाशक्ति भी बढ़ी और मेरी रणनीति और आत्मविश्वास को भी मजबूती मिली. 

इन दोनों ही चीजों का मुझे उत्साह जरूर है. तभी कल से कई लोगों को यह बात बता चुका हूं. लेकिन आपसे लगातार साझा नहीं कर पाया. ऐसे में तय किया है कि अगली निरंतरता की आदत के तौर पर लिखने को ही रखा जाएगा. जिससे उस प्रक्रिया को दर्ज किया जा सके जो किसी काम में निरंतरता के लिए निर्णायक होती है. फिलहाल चैलेंज यह है कि कैसे लेखन की प्रक्रिया को जीवन-शैली में ढालने जितना सहज बनाया जाए. दिन के 24 घंटों में वो समय क्या हो, जब लिखने के सिवाए कुछ सूझे ही न.


अगले 21 दिनों का लक्ष्य है- लिखना

ऐसे में तमाम बिंदुओं का आकलन कर कहा यही जा सकता है कि वह ऐसे ही सवेरे का समय हो क्योंकि पिछली बार लेखन को इसीलिए रात में करने से बचा गया था क्योंकि पाया गया कि रात में दिमाग अपनी पूरी क्षमता से साथ नहीं दे रहा. बाकी यह पूरी तरह से पारदर्शी प्रक्रिया होने जा रही है. क्योंकि यह मामला अगर जमा तो अगले 21 दिन यानी 30 अप्रैल तक मेरे 21 ब्लॉग आपके सामने होंगे. अब जो भी होगा आपकी नज़रों के सामने होगा.

वैसे पिछले कुछ दिनों में किताबों को पढ़े जाने में बेहतरीन निरंतरता आई है लेकिन मेरे लिए यह कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है क्योंकि मैं पिछले लंबे समय से निरंतर किताबें पढ़ता आ रहा हूं. इसलिए उनके प्रति किसी चैलेंज और स्ट्रीक का कोई मसला नहीं है.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Monday, March 23, 2020

कोरोना के चलते लॉकडाउन में जी रहे हैं तो कर डालिए ये जरूरी काम

आप भी पिछले दिनों में घर में बैठे-बैठे बोर हो गए होंगे और सोच रहे होंगे क्या करें?
निश्चित है कि भारत के ज्यादातर हिस्सों की तरह आप भी इस समय कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के दौर में जी रहे होंगे और सोच रहे होंगे कि ऐसे दौर में क्या किया जा सकता है?

तो यहां पर जरूरी कामों की एक लिस्ट है, जिन्हें आप घर में ऊब से बचने के लिए कर सकते हैं-

  1. घर का कोना-कोना साफ कर डालिए. किचन की छोटी से छोटी चीज को साफ कर डालिए. पूरी तसल्ली से सफाई कीजिए, घर का कोई कोना बचना नहीं चाहिए.
  2. जो सामान कचरा हो गया हो, उसे छांट दीजिए. सभी तरह के पुराने सामान और कपड़ों को एक जगह इकट्ठा कर लीजिए और जब स्थिति सामान्य हो जाए तबके लिए उसे जरूरतमंदों में बांटने के लिए रख दें.
  3. रोज सवेरे 10 मिनट सूरज की धूप लें. दरअसल लगातार घर में रहने से आपमें विटामिन डी की कमी हो सकती है इसलिए रोज दस मिनट धूप में खड़े हों. सवेरे 9 से पहले ऐसा करेंगे तो ज्यादा अच्छा रहेगा.
  4. रोज 15 मिनट के लिए मेडिटेशन यानी ध्यान करें. इसके साथ ही आप अपनी इम्युनिटी बनाए रखने के लिए एक्सरसाइज भी करें तो और अच्छा रहेगा.
  5. चूंकि हम ज्यादातर घर पर ही रह रहे हैं. ऐसे में या तो हमारे पास ज्यादा काम नहीं है या बहुत कम काम है. ऐसे में ज्यादा खाने से परहेज करें. आप एक दिन के लिए व्रत भी रख सकते हैं ताकि आपके शरीर से पूरी तरह बुरे तत्व खत्म हो जाएं.
  6. दिन में केवल तीन बार समाचार देखें. नकारात्मक विचार और ज्यादा नकारात्मक परिस्थितियां बनाते हैं. सकारात्मक बने रहें, आप पूरी तरह से जिंदादिल हैं.
  7. शतरंज, कैरम, लूडो, ताश और व्यापार जैसे खेल अपने मम्मी, पापा, साथियों या बच्चों के साथ खेलें.
  8. घर के सारे जरूरी कागजों को सही से फाइल में रख दें. इसमें से अपने प्रॉपर्टी के पेपर्स, सर्टिफिकेट, बैंक के कागज, दूसरे जरूरी कागजात और बिजली आदि की बिल को अलग-अलग फाइल में सहेज कर रख दें.
  9. अपने फोन/ लैपटॉप/ मेलबॉक्स आदि की भी सफाई कर दें. अपने सभी डिजिटल डेटा का बैकअप बना दें यानी जो तस्वीरें, वीडियो, मेल आप हमेशा के लिए सेव करना चाहते हों उन्हें गूगल ड्राइव आदि पर सेव कर लें.
  10. अपने परिवार से मिलें, जो हमेशा आपसे यह शिकायत करते रहते हैं कि आप उन्हें समय नहीं देते. घर से बैठे-बैठे काम करते हुए यह जरूर करें. उनसे उनके दोस्तों की कहानियां सुनें, अपनी सुनाएं.


सबसे ज्यादा जरूरी काम-


  1. चेक करें कि आपने अपने कहां-कहां सेविंग कर रखी है. उनके सभी कागजात जुटा लें. चेक करें कि आपने अपने इंवेस्टमेंट, इंश्योरेंस पॉलिसी, बैंक अकाउंट, प्रॉपर्टी, लॉकर आदि में किसे नॉमिनी बनाया हुआ है.
  2. अगर आपने अपने और अपने पति/ पत्नी के लिए वसीयतनामा नहीं बनाया है तो उसका एक ड्राफ्ट तैयार कर लें. अगर आप पहले ही बना चुके हैं तो उसे फिर से पढ़ लें.
  3. अगर आप हर साल के खर्चे आदि की बैलेंस शीट बनाते हैं तो यह आपको वसीयतनामा बनाने में मदद करेगी. नहीं तो अपनी पूरी संपत्ति और देनदारियों की लिस्ट बना लें.

इससे भी ज्यादा जरूरी- 


जो सीखा है, उसमें कुछ और जोड़ें, कुछ नया सीखें.


प्लीज इसे उन सभी लोगों तक पहुंचाएं जो खाली बैठना पसंद नहीं करते इसलिए यह माहौल उन्हें पसंद नहीं आ रहा है.

Sunday, March 22, 2020

गिटार भी सीखना हो और स्विमिंग भी तो पहले क्या सीखें? कौन सा हुनर सीखना सही रहेगा, यूं करें तय

कई बार हम यह नहीं तय कर पाते कि कौन सा हुनर सीखना है और समय निकल जाता है...
जैसा कि पिछले ब्लॉग में मैंने लिखा था कि आज इस पर बात होगी कि कैसे तय करें कि कौन सा हुनर सीखना है. तो किसी आदत को डालते हुए या किसी नई चीज को सीखते हुए बड़ी परेशानी तब भी सामने आती है, जब यह समझ नहीं आता कि किस चीज की आदत सबसे पहले डालें और किसकी बाद में? जैसे समझ नहीं आता गिटार सीखें, गाना सीखें, स्विमिंग सीखें या कोई लैंग्वेज. मन सबकुछ सीखने का करता है लेकिन समझ नहीं आता कि पहले क्या किया जाए और ऐसे ही सोचते-सोचते समय निकल जाता है और इन सारी चीजों में से कुछ भी नहीं सीख पाते. फिर जब खुद के बारे में सोचते हैं तो परेशान होते हैं और खुद पर बेहद औसत होने का आरोप लगाते हुए चिंता करते हैं.

लेकिन इसमें चिंता की बात नहीं है. थोड़े धैर्य के साथ आपको परिस्थितियों के बारे में बैठकर सोचना होगा और तय हो जाएगा कि आपको नई गतिविधि के तौर पर क्या करना चाहिए या नई स्किल के तौर पर क्या सीखना चाहिए. इसकी प्रक्रिया बहुत आसान है. सबसे पहले बैठकर याद कीजिए कि क्या करने के लिए आपकी तारीफ होती रही है. क्या स्कूल के दिनों तक आपकी तारीफ किसी गाने को लेकर हुई, डांस को लेकर हुई, पेंटिंग को लेकर हुई या पढ़ाई को लेकर हुई?


समय लेकर सोचिए वो एक हुनर क्या था जिसे लेकर आपको कई लोगों से मिला कॉम्पिमेंट

आपको दोस्तों ने, आपके टीचर्स ने किन बातों को लेकर आपको कॉम्प्लिमेंट किया. हो सकता है कि आज मेरे ऐसा कहते समय आपको लग रहा हो कि अब तक आपको ये बातें कहां ही याद रही होंगीं. लेकिन मेरी बात मानिए, आपको सब याद है. इंसान कभी कुछ नहीं भूलता. खासकर ऐसी चीजें. याद करने की कोशिश कीजिए, कब-कब, किस-किस बात पर लोगों ने आपकी तारीफ की. मान लीजिए आपको समझ आता है कि आपकी तारीफ अच्छी अंग्रेजी होने के चलते की गई तो अब म्यूजिक सीखने और फ्रेंच सीखने में सोचने के बजाए तुरंत फ्रेंच क्लासेज ज्वाइन करने का मन बना लीजिए.

अब सोचिए कि सीखी हुई इंग्लिश की स्किल्स का इस्तेमाल आप कैसे कर रहे हैं. क्या इसने आपके करियर को कोई सहारा या मजबूती दी? क्या इसने आपके जीवनस्तर और जानकारी में कोई इजाफा किया. अगर आपको लगता है कि ऐसा हुआ है तो फ्रेंच क्लासेज खोजनी शुरू कर दीजिए. अब सोचिए कि क्या आज भी आप नए अंग्रेजी शब्द सीखने और ग्रामर के सही इस्तेमाल को लेकर नई चीजें सीखते रहते हैं, अगर हां तो फीस भर दीजिए और जल्द से जल्द फ्रेंच की क्लासेज शुरू कर दीजिए.

दो हुनर के बीच कौन सा पहले सीखें, ये तय करने के लिए आपको थोड़ी देर बैठकर सोचने की जरूरत होगी...

इमारत के सबसे ऊपर भारी से भारी कंगूरे तभी बन सकेंगे, जब नींव पहले से मजबूत हो

ये मत सोचिएगा कि आप म्यूजिक सीख नहीं पाएंगे इसलिए मैंने आपको फ्रेंच सीखने को कहा. सीख तो आप कुछ भी लेंगे लेकिन उस सीखे हुए की क्या क्वालिटी होगी और वह आपकी जिंदगी में कितना काम आएगा यह आपके दिमाग पर निर्भर करता है. जब आपने अंग्रेजी के प्रति अपना मन बनाया और तेजी से उसे सीखना शुरू कर दिया, तभी साफ हो गया कि देवनागरी से अलग लिपि वाली भाषा को सीखने के लिए भी आपका दिमाग आसानी से तैयार है. ऐसे में बहुत मेहनत के साथ म्यूजिक सीखने से अच्छा है कि कम मेहनत और ज्यादा मज़े के साथ फ्रेंच सीखी जाए.

यानी अगर आप स्कूल की उम्र पार कर चुके हैं तो कंगूरे उसी इमारत के शानदार बनाने की कोशिश करें, जिस इमारत की नींव भी गहरी डाली गई हो. वरना किसी भी मुश्किल परिस्थिति यानी भूकंप आदि में वह इमारत ढह जाएगी.

ऐसे ही अगर आपकी तारीफ डांस को लेकर, पढ़ाई को लेकर और गाने को लेकर होती रही हो तो कोशिश करें कि उसी से जुड़े हुए हुनर सीखने की कोशिश करें.


इस तरह से करेंगे तय करने पर दिमाग न सिर्फ सीखने को तैयार रहेगा बल्कि इंज्वाए भी करेगा

अब आप यह पूछ सकते हैं कि तब क्या जब तारीफ तो लोगों ने बच्चा समझ कर की हो और आज हम उसे सीरियस लेते हुए डांस क्लास में एडमिशन ले लें. ऐसी स्थिति में मैं यही कहूंगा कि आप भूल जाइए एक बार तय करने के बाद कि आपकी तारीफ डांस को लेकर हुआ करती थी. दरअसल आपके दिमाग ने आपको यही याद दिलाया है कि आपकी तारीफ डांस को लेकर हुआ करती थी और लोग आपको देखना पसंद करते थे.

दिमाग ने जानबूझकर याद दिलाया है क्योंकि वह आपको एक डांसर के तौर पर पसंद करता है और उसी के तौर पर जानना चाहता है. इसलिए डांस सीखना शुरू कर दीजिए.

इसी तरह जो आपका दिमाग आपको बताए, जरूरी नहीं कि वह सच ही हो लेकिन यह जरूर होगा कि आपका दिमाग उस हुनर को पसंद करता होगा. और उसे न सिर्फ तेजी से सीखेगा बल्कि उसे सीखने के लिए धैर्य बनाने में भी आपकी बहुत मदद करेगा. तो बस यही है सिंपल सी ट्रिक की कैसे समझें कि आदत के तौर पर किस चीज को विकसित करना है और बुरी आदत के तौर पर किस चीज को छोड़ना है.


मेरे रेज्योल्यूशन अभी जिंदा, लग रहा है छोड़ दूंगा नाखून चबाना

अब आ जाते हैं मेरी नई आदतों पर. जिनके लिए मैंने रेजोल्यूशन ले रखा है. तो मैं बता हूं कि आज भी मैंने कल की तरह ही 15 मिनट की वॉकिंग एक्सरसाइज की. साथ ही मैंने नाखून भी नहीं चबाए. हां ऐसा जरूर हुआ कि मैंने एक बार मुंह में हाथ डाल लिया और दांतों से त्वचा का कुछ भाग काटा लेकिन याद आते ही मैंने उंगलियां मुंह से बाहर निकाल लीं. मुझे लगता है कि मेरा व्रत नहीं टूटा.

आप मुझे पढ़ें और बताएं कि किसी आदत को डालने और किसी हुनर को सीखने में मेरी ओर से क्या मदद हो सकती है. और हो सके तो मुझे भी इनके लिए सुझाव भेजें. बाकी कोरोना वायरस के प्रसार के दौर में आप सभी सुरक्षित रहें और जितने दिन घर में हैं एक अच्छी आदत डालने की कोशिश जरूर करें. जारी...

(नोट: आप मेरे लगातार नाखून न चबाने और एक्सरसाइज करने के दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर (सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ) दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Saturday, March 21, 2020

किसी अच्छी आदत को डालने और बुरी आदत को छोड़ने के लिए 21 दिन की प्रैक्टिस क्यों है जरूरी?

किसी आदत को डालने में 21 दिन लगने की बात करने के पीछे कई सारी वजहें हैं (फोटो साभार- विशाल भूटानी)
कल मैंने जोर देकर कहा था कि किसी आदत को डालने में 21 दिन का समय लगता है. वैसे अगर आप मुझसे पूछेंगे- किसने कहा तो मैं जवाब नहीं दे पाऊंगा. मैंने कभी इसके लिए पढ़ाई नहीं की. यह पढ़ाई करने वाली बात भी नहीं है, मेरे अनुभव की बात है. बचपन में कभी सुना कि 21 दिन लगते हैं और देखा कि जो चीजें लगातार 21 दिन कर लीं, वे आदत में आ गईं. बल्कि न सिर्फ 21 दिन में अच्छी आदतें बनीं बल्कि बुरी आदतें छूटीं.

जैसे मैं कानपुर से होने के नाते डिक्शनरी को डिक्शन...री बोला करता था. पूरा कानपुर बोलता है. लेकिन अपनी आदत को कुछ बार टोके जाने के बाद मैंने लगातार पढ़ने के दौरान डिक्शनरी बोलते हुए सुधार लिया. हालांकि मैंने 21 दिन गिने नहीं लेकिन रोज पढ़ाई करने के चलते यह ज्यादा आसान रहा. मैंने इसे 21 बार से ज्यादा ही सोचकर डिक्श...नरी कहा और अंतत: यह हो डिक्शनरी हो गई.

बोलने को छोड़ भी दें तो मेरी एक और आदत पढ़ते-पढ़ते सो जाने की थी. अब किताब चाहे कितनी बोरिंग क्यों न हो जाए, आप मुझे किताब लेकर सोता नहीं पाएँगे. कभी अपवाद हो सकता है, जब मैं बहुत थका होऊं लेकिन ज्यादातर ऐसा नहीं होगा. मोबाइल लेकर भी नहीं. हमेशा उसे सही जगह पर रखकर ही सो रहा होऊंगा.


तीन हफ्ते देखने में बेहद कम लेकिन आपकी जिंदगी में ला सकते हैं बड़े बदलाव

बहरहाल फिर से 21 दिन में आदत डालने और आदत छोड़ने की बात पर वापस आ जाते हैं. तो फिलहाल इसी 21 दिन के फॉर्मूले का यूज कर मैं अपनी नाखून चबाने और एक्सरसाइज करने की आदत क्रमश: छुड़ाने और बनाने पर काम कर रहा हूं. वैसे इनकी तरक्की कैसी है, यह बाद में बताऊंगा. पहले यह बताता हूं कि अच्छी आदत का 21 दिन लगातार प्रयास और बुरी आदत का 21 दिन लगातार निषेध क्यों?

ऐसे तो तीन हफ्ते बहुत ज्यादा नहीं लगते लेकिन यह आपकी जिंदगी में बड़े बदलाव के लिए काफी होते हैं.


21 दिन में या तो किसी प्रयास को आदत बना लेंगे या एक गलत आदत से बच जाएंगे

कई बार आप खुद को जिस चीज की आदत डालने के लिए तैयार कर रहे होते हैं. वह चीज आपके अंदाज, आपके व्यक्तित्व के मुताबिक नहीं होती है. जैसे अगर मैं कोशिश करूं कि आदत डालूंगा, प्राइमटाइम पर किसी भी न्यूज एंकर की डिबेट 21 दिन लगातार देखने की तो यह मेरे लिए बहुत मुश्किल होगा क्योंकि मैं भी इसी धंधे में लगा हूं और जानता हूं कि यह खेल कैसे चल रहा है. ऐसे में कुछ दिन जज करता रहूंगा और फिर इस काम को व्यर्थ मानकर छोड़ दूंगा. दरअसल यह काम मेरे लिए नहीं था और उसकी आदत डालकर मैं अपने उद्देश्यों को व्यर्थ कर रहा होता.

ऊपर जो मैंने लिखा उसमें कुछ भी गलत नहीं है. यानि किसी आदत को डालने के लिए बहुत जरूरी है आपके पास एक जरूरी मकसद हो. और यह मकसद मात्र आपके दिमाग का फितूर न हो बल्कि अपने आसपास के लोगों से इस मकसद को लेकर जिक्र किया हो और उन्होंने भी इस मकसद को लेकर आपका उत्साहवर्धन किया हो. उत्साहवर्धन न सही लेकिन इसके आप पर सकारात्मक प्रभाव की आशा जताई हो.


सिर्फ मकसद काफी नहीं आदत के लिए गजब के धैर्य की भी जरूरत

लेकिन इस 21 दिन के कार्यक्रम में सिर्फ मकसद ही सबकुछ नहीं. आप 2-4 दिन में ही या तो बोर हो जाएंगे, या तो यह सोचने लगेंगे कि यह नई चीज क्यों ही कर रहा हूं और बहुत कम मामलों में इसे लेकर बहुत आशावान हो जाएंगें लेकिन किसी भी परिस्थिति में इसे छोड़िएगा मत. दरअसल इस 21 दिन के कार्यक्रम में जो चीज सबसे ज्यादा जरूरी है, वह है धैर्य. आपने अपने लिए जो चुन लिया है, उसे बिना उसके फायदे नुकसान सोचे 21 दिन करते रहें. हालांकि ऐसा नहीं कि गंभीर परिस्थितियों में या नुकसान के दौर में भी ऐसा करें लेकिन जब तक चीजें सामान्य हों अपनी नई प्रैक्टिस को 21 दिन लगातार धैर्य के साथ करें.

पढ़ते हुए सो जाने की समस्या कई सारे लोगों को होती है...    (फोटो क्रेडिट- विक्टोरिया, etsy.com)

21 दिनों बाद आप परिस्थितियों के प्रति तटस्थ होकर कर सकते हैं निर्णय

दरअसल 21 दिन ही इतना वृहत अनुभव आपको दे सकेगा कि आप सही-गलत आदत, उसके फायदे-नुकसान आदि का सही अनुमान लगा सकें. इस वृहत अनुभव से ही आप बिल्कुल तटस्थ हो सकेंगे और विचार कर सकेंगे कि 21 दिन आपने जो किया, उससे क्या पाया और क्या खोया? साथ ही आप समझ जाएंगे कि इसे जारी रखेंगे तो आगे के भविष्य पर कैसा असर होगा.

मसलन आप कोई भाषा सीख रहे हों तो आप 21 दिन में करीब 100 शब्द सीख जाएंगे. ऐसे में आप उसके मामूली वाक्यों को बोलने और समझने लगेंगे. अब निकट भविष्य में उस भाषा में अवसर और उसके फायदे आदि तय करेंगे कि आप उस भाषा को सीखना चाहते हैं या नहीं. ये और कुछ अन्य फैक्टर मिलकर 21 दिन में आपके दिमाग में यह बात साफ कर देंगे कि आपको यह काम कर लेना है या छोड़ देना है.


21 दिन में का आदत डालने का कार्यक्रम पूरा किया तो हमेशा आदत डालने में होगी आसानी

साथ ही 21 दिन का कार्यक्रम हमेशा अपने साथ अच्छी प्लानिंग और निरंतरता का तोहफा आपको देकर जाएगा. यानी की आप जरूरी चीजों के लिए न सिर्फ काम करना सीख जाएंगे बल्कि आप यह भी जान जाएंगे कि लगातार उनके लिए समय कैसे निकाला जाए. इससे आगे की आदतें डालने में भी मदद मिलेगी.

अब बात मेरी आदतों की करें तो मुंह के पास हाथ जाते ही जैसे दिमाग डांट देता है. अब मेरे नाखून बड़े हो रहे हैं. मैं इनके ठीक-ठाक बड़े हो जाने के बाद इनकी तस्वीर पोस्ट करूंगा. इसके अलावा मैंने आज भी एक्सरसाइज की और स्ट्रीक को टूटने नहीं दिया. आज मैंने 'वन माइल वॉक' नाम की एक्सरसाइज की. आप यूट्यूब पर इस नाम से ढूंढेंगे तो आसानी से आपको मिल जाएगी.

दूसरे दिन भी आसानी से आदतें बनाने की तरफ बढ़ता रहा

मैंने एक्सरसाइज आज नहाने से पहले ही की. हालांकि दोपहर के 2 बज रहे थे. मुझे आज दिन में हरारत और जुकाम महसूस हुआ. क्योंकि मैं जर्मन एंबेसी के चक्कर 5 दिन पहले मार रहा था तो थोड़ा डरा भी रहा लेकिन सभी चीजें सही से पूरी कीं और देखिए भले ही दो घंटे लेट रहा होऊं, पर ब्लॉग भी लिख ही दिया है.

कल हम बात इस बारे में करेंगे कि कैसे तय करें कि हमें क्या आदत डालनी चाहिए और उसके लिए कैसे प्रयास करें?
(नोट: आप मेरे लगातार नाखून न चबाने और एक्सरसाइज करने के दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर (सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ) दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.) 

Friday, March 20, 2020

सिर्फ Motivation से नहीं पड़ेगी अच्छी आदत, इन 3 बातों का रखना होगा ध्यान

कोई आदत डालने के लिए आपको 3 बातें ध्यान रखनी होंगीं- पहली- मोटिवेशन (प्रेरणा), दूसरी- वायाबिलिटी (व्यवहार्यता) और तीसरी- पेशेंश (धैर्य)
कल हमने बात इस पर खत्म की थी कि अच्छी आदतें डालने के लिए सिर्फ जोश की जरूरत नहीं होती है. हालांकि अगर मैं कहूं कि आदत डालने के लिए प्लानिंग की जरूरत होती है तो आपको लगेगा, मोटिवेशनल स्पीकर जैसी बात कर रहा हूं. तो मैं साफ कर देना चाहता हूं कि मैं यहां किसी काउंसलर या मोटिवेशनल स्पीकर जैसी बातें नहीं करना चाहता. मेरे पास सिर्फ एक स्ट्रैटजी है, जो मैंने अपने अनुभवों से पाई है, सिर्फ उसे आपके साथ शेयर करना चाहता हूं.

ऐसे में अगर आप मानते हैं कि कई बार आपने भी जोश में आकर कोई कदम उठाया है और मुश्किल से चार दिन भी पूरा न करके जल्द ही उसे छोड़ दिया है लेकिन चाहते हैं, आगे से ऐसा न हो तो-

इसके लिए आपको ये तीन बातें ध्यान रखनी होंगीं- पहली- मोटिवेशन (प्रेरणा), दूसरी- वायाबिलिटी (व्यवहार्यता) और तीसरी- पेशेंश (धैर्य).

मोटिवेशन या जोश का कोई काम पूरा करने में 10% से ज्यादा रोल नहीं होता

वैसे इनमें से आपके-मेरे पास कुछ भी नहीं होता है. आप चाहे जो भी हों, ये चीजें लेकर पैदा नहीं होते, इसी दुनिया में देखते-सुनते दिमाग में ये चीजें पैदा होती हैं (हालांकि कुछ रोल जेनेटिक्स का भी होता है). तो ये तीनों ही बातें स्टेट ऑफ माइंड जैसी हैं. ये तीनों ही आपको दिखेंगीं नहीं लेकिन इनकी प्रैक्टिस से आप अपने जीवन में जो बदलाव लाएंगे वह आपको दिखेगा. चाहे वह किसी म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट पर बजाई गई कोई धुन हो, या आपके पेट में एब्स. सीधी बात अब अपने ऊपर लिखे तीनों औजारों पर आते हैं-

तो मोटिवेशन यानी प्रेरणा वही है जिसकी बात तमाम मोटिवेशनल स्पीकर करते हैं. "अपने जीवन को बदलने के लिए उठ बैठिए, जुट जाइए. आप ही खुद को बदल सकते हैं," जैसी चीजें. ये बातें आपके दिमाग में भी उठती रहती हैं, इसलिए आप मोटिवेशनल स्पीकर जैसे लोगों की बातों से रिलेट कर पाते हैं. लेकिन यकीन मानिए कि यह प्रेरणा और मोटिवेशन पानी में तैरते ग्लेशियर के ऊपरी हिस्से की तरह होते हैं. जो पानी से ऊपर सिर्फ जरा सा दिखते हैं और उनका 90% भाग नीचे पानी में तैरता रहता है. वैसे ही आपके जोश-ओ-जुनून का पानी के ऊपर तैरते आइसबर्ग जितना ही मतलब है. बाकी दो बातें ही वह 90% भाग बनाती हैं, जो तय करता है कि आप किसी काम को पूरा कर पाएंगे/ किसी हुनर को सीख पाएंगे या नहीं.

जोश में कोई फैसला करने से पहले उसकी व्यवहार्यता के बारे में जरूर सोचें

ऐसे में बिल्कुल जोश में जाइए और बेस्ट पॉसिबल प्लान लेकर जिम में पैसे देकर आइए, या बेहतरीन किताबों की लिस्ट चेक करके उसमें से अपनी पसंद के विषय की किताब खरीदिए, या किसी ऑनलाइन कोर्स में एडमिशन लीजिए, या कोई भाषा सीखनी शुरू कीजिए लेकिन उससे पहले अगले कदम पर विचार जरूर कर लीजिए.

भले ही इस अगले कदम के बारे में पहला कदम उठाने से पहले सोचने को मैंने कहा लेकिन इस दूसरे कदम को पहले कदम के बाद ही काम में लाना होता है. इसके बारे में सोच लेना ही दूरदर्शी होने की पहचान होता है. दूसरा कदम का नाम मैंने बताया है- वायाबिलिटी यानी व्यवहार्यता. जो आप कर रहे हैं, वह व्यवहार्य है या नहीं. जैसा मैंने कहा कि ये सारी ही चीजें पहले से कुछ भी नहीं होतीं, ये सिर्फ स्टेट ऑफ माइंड हैं. ऐसे में अगर कोई प्लान वायबल नहीं है तो आपको उसे आपको वायबल बनाना होगा.

क्रिएटिव तरीके से अपने रिजोल्यूशन को पूरा करने के लिए बनाएं रास्ते

अपनी पसंदीदा हरकत को अपनी नई बनाई जा रही आदत से जोड़ें

जैसे आपने सोच लिया कि आप किताब पढ़ेंगे या जिम करेंगे लेकिन 4 दिन से ज्यादा लगातार नहीं कर सके. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि आपने अपने प्लान को वायबल नहीं बनाया. दरअसल आपको जिम करने को पकड़ना ही नहीं था. आपको पकड़ना था अपने शौक को. जाहिर है अगर आपका बॉडी बिल्डिंग और डाइट का शौक होता तो आपको जिम जाने के तरीके मुझे बताने ही नहीं पड़ते. तो आप देख लो आपको क्या शौक है?

क्या आपको कोई किताब पढ़ने का शौक है, कोई खास म्यूजिक सुनने का शौक है, कोई न्यूज बुलेटिन सुनने-देखने की आदत है (जैसे बहुत से लोग रवीश को रोज जरूर देखते हैं. वहीं बहुत से लोग अर्णब को जरूर देखते हैं) तो इसके आधार पर अपनी नई आदतों को वायबल बनाने की कोशिश करें. ये सोच लें कि इन कामों को मुझे घर पर पड़े हुए करने के बजाए जिम में करना है. बल्कि जिम को भी ऐसे समय रखें, जब आपके ऑफिस जाने या वहां से लौटने का समय हो उसके एक घंटे पहले या ऑफिस के तुरंत बाद. साथ ही घर से ऑफिस के रास्ते में जिम खोज सकें तो और अच्छा. अपने कान में पॉडकास्ट या म्यूज़िक लगाकर जिम में कुछ-कुछ करते रहें. यकीन मानिए धीरे-धीरे आपकी जानकारी वहां की चीजों को लेकर जैसे-जैसे बढ़ेगी, न सिर्फ आप अवेयर होंगे बल्कि आपको इंट्रेस्ट भी आने लगेगा.

अपने हिसाब से आदतों में व्यवहार्यता लाने की करें कोशिश

अब एक्स्ट्रीम तरीका बताता हूं. ऊपर दी चीजें करने पर भी अगर आपको लगता है कि अब भी आपसे जिम नहीं हो पा रहा है. तो सिर्फ ज्यादा पानी पीना शुरू कर दीजिए. जितनी देर घर पर रहें. उतनी देर ज्यादा से ज्यादा पानी पिएं. इससे आपको ज्यादा से ज्यादा पेशाब आएगी. पेशाब करने के बाद आप जब हाथ धोने जाएं तो उसके साथ ही सिर्फ दो पुशअप दीवार के सहारे कर लें. इस तरह से अगर आप ज्यादा पानी पीने से 7-8 बार भी पेशाब जाते हैं तो आप 14 से 16 पुशअप दिन में कर रहे होंगे. ऐसा नहीं कह रहा कि मैं आपको यही करना है लेकिन यह मेरा आजमाया एक तरीका है, जिसे आधार बनाकर आप भी ऐसा ही कुछ प्लान कर सकते हैं. मेरा सिर्फ इतना ही कहना है कि अपनी पसंदीदा चीजों को या कह लें कि जिन चीजों को आप आदत की तरह करते हैं, उनसे आप किसी मुश्किल आदत को जोड़ दें. इससे मुश्किलें आसान हो जाएंगीं.

21 दिन तक किसी नई आदत को दोहराते रहने में काम आएगा धैर्य

अब आती है बात अंतिम लेकिन सबसे जरूरी हथियार- पेशेंस यानी धैर्य की. यह पेशेंस ही आपकी आदत को 21 दिनों का इन्क्यूबेशन पीरियड पार कराएगा. (मैं पहले ब्लॉग में अपने 21 दिन के पीरियड के विश्वास के बारे में बता चुका हूं, उसे यहां पढ़ें) आपको लगे कि मैं क्यों ही कर रहा हूं. इससे मुझे परेशानी हो रही है फिर भी उस काम को तीन हफ्ते तक कीजिए. इन 21 दिनों में या तो आपको उस काम के फायदे दिखने लगेंगे या उसकी व्यर्थता समझ आ जाएगी. ऐसे में अगर आपको कोई काम व्यर्थ लगे तो उसे छोड़ दीजिएगा लेकिन 21 दिन बाद ही. या हो सकता है कि आपको यह लगने लगेगा कि काम तो सही है लेकिन मैं इसे गलत तरीके से कर रहा था, इसे इस तरह से करना चाहिए. जैसे 21 दिन किसी भाषा की ग्रामर सीखने के बाद आपको यह भी लग सकता है कि मुझे तो सीधे इसके गाने सीखकर, उसके अर्थ याद करने से तेजी से भाषा आ रही है. अगर आपके ऐसा लगे तो आप अपना तरीका बदल सकते हैं लेकिन हर तरीके को 21 दिन जरूर कीजिएगा.

इस 10 मिनट के वीडियो के जरिए कर रहा शुरुआती एक्सरसाइज

यहीं आपको अपने अंतिम हथियार पेशेंस का सहारा लेना पड़ेगा. आगे की चर्चा के दौरान कभी हम पेशेंस पर बहुत विस्तार से बात भी करेंगे. तब तक आप ऊपर बताए हथियारों को और धारदार बनाने पर काम करें. तब तक मैं कल से अब तक आपको पर्सनल लेवल पर अपनी जिंदगी में आए बदलावों के बारे में बता देता हूं.-

कल जैसा कि मैंने रेजोल्यूशन लिया था कि नाखून नहीं खाऊंगा और एक्सरसाइज यानि व्यायाम करूंगा तो बता दूं कि दोनों ही काम मैंने पहले दिन सफलतापूर्वक किए हैं. कई बार ऊंगलियां मुंह तक पहुंची लेकिन मैंने खुद को रोक लिया. आशा है जल्द ही उंगलियां मुंह तक जाना भी बंद हो जाएंगी. और अपनी वायाबिलिटी को देखते हुए कोरोना के प्रसार के दौर में मैंने  घर पर ही 10 मिनट की एक्सरसाइज नहाने के बाद ली. हालांकि कल से मेरा इसे नहाने से पहले करने का प्लान है. ये थी वह 10 मिनट की एक्सरसाइज-

10 MINUTE MORNING WORKOUT (NO EQUIPMENT)

अगर आप पढ़ रहें तो मुझसे सवाल पूछने और नई बातें सुझाने से न चूकें

किसी आदत को डालने का प्लान कर रहे हों तो मुझे बताएं, मेरी कोशिश रहेगी कि आपकी कुछ मदद कर सकूं. पढ़ाई करने वाले बच्चों या अपने ऐसे दोस्तों जो बहुत भटकते हों, इस ब्लॉग के बारे में बताएं. मैं रोज़ आदतें डालने के तरीके लिख रहा हूं और मेरी कोशिश है कि कोरोना से हमारी लड़ाई के दौरान ये तरीके न सिर्फ हमें इस लड़ाई से सफलतापूर्वक उबारेंगे बल्कि इस दौर को पार करते-करते हम कुछ अच्छी आदतें सीख चुके होंगे और अपनी जिंदगी में बेहतर महसूस कर रहे होंगे. कल मैं आपको विस्तार से बताऊंगा कि मैं किसी आदत को डालने के लिए किसी काम को 21 दिन लगातार करने पर इतना जोर क्यों देता हूं. कल मैं आपको यह भी बताऊंगा कि मेरे रिजोल्यूशन का क्या हुआ. फिलहाल जारी...

(नोट: आप मेरे लगातार नाखून न चबाने और एक्सरसाइज करने के दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर (सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ) दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)


अच्छी आदतों को लेकर पिछले ब्लॉग आप यहां पढ़, पढ़ा सकते हैं-


अच्छी आदत कैसे डाली जाए?