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Thursday, April 30, 2020

क्या इरफान साब, इतना भी खुद्दार क्या होना कि हमारी दुआएं लेने से भी इंकार कर गए...

फिल्म 'लंचबॉक्स' के एक दृश्य में इरफान खान
इरफान खान की मौत पर भरोसा नहीं है. अंतिम खबर आने से पहले 2 साल तक हमेशा लगा, 'वो वापस आएंगे, फिर से फिल्में करेंगे' लेकिन जैसा वरुण ग्रोवर ने कहा कि इरफान ने "एकतरफा हमें दिया, हमसे लिया कुछ नहीं". वैसे ही पिछले दो सालों में दिल से कई बार निकली दुआ कि 'वो जल्दी से ठीक हो जाएं और फिर से एक के बाद एक फिल्म करें' को भी इरफान खान ने लेने से इंकार कर दिया. मैं ऐसे पेशे में हूं जिसके चलते उनके एक दिन पहले हॉस्पिटल में भर्ती होने की खबर मिल गई थी और यह भी सोचा था कि कोरोना के प्रसार के खतरनाक समय में कैसे तबीयत बिगड़ गई, फिर सोचा, 'कोई बात नहीं, वो इरफान खान हैं, सही होकर वापस आ जाएंगे.'

वापस आने की बात पर इतना विश्वास था कि अगले दिन सवेरे 11 बजे के बाद जब मेरे मित्र अजय ने मुझसे पूछा कि इरफान पर कुछ लिखा है क्या तुमने? तो मैंने उन्हें पलट कर जवाब दिया, "याद तो नहीं लेकिन क्यों लिखना है, वो तो ठीक हो जाएंगे न!" मुझे विश्वास ही नहीं था कि उन्हें कुछ हो सकता है. अंतिम खबर पा जाने के बाद भी इरफान के बारे में लिखना कई वजहों से टालता रहा. लेकिन अजय ने कई बार कहा तो मैंने तय किया लिखूंगा. हालांकि अब भी मुझे खुद पर विश्वास नहीं है. ऐसा लग रहा है कि सूरज को टॉर्च की रौशनी दिखाने जा रहा हूं. फिर भी अपनी बात रखता हूं.

पहली बात मुझे अब भी विश्वास नहीं कि वो नहीं रहे. लिखना इसलिए भी टाला कि लग रहा था जब लिखूंगा तो स्वीकारना पड़ेगा, वो नहीं रहे. दूसरी बात, इरफान खान को जब-जब एक्टिंग करते देखा तो लगा कि जैसे यही तो सहजता है, कोई प्रयास ही नहीं. कोई परफॉर्मेंस प्रेशर नहीं. ये आदमी यही तो कर रहा है, हमेशा से. इसके लिए क्या तारीफ करूं. मेरे लिए इरफान की एक्टिंग सूरज की तरह थी, जो आती-जाती रहती है. उसकी कमी तब महसूस हो रही है, जब धीरे-धीरे एहसास हो रहा है कि अब वह नहीं होगी, कभी नहीं होगी. हमें पता होता था, इरफान खान फिल्म में हैं तो बिना ज्यादा सोचे फिल्म देख लेनी है, फिल्म से कुछ मिले न मिले, इरफान निराश नहीं करेंगे. मैंने कभी एक लेख में लिखा था कि रवि किशन जिस फिल्म में झांककर चले जाते हैं, उसमें भी उनका रोल याद रह जाता है. क्या यह इरफान पर लागू नहीं होता. कुछ सेकेंड का सीन 'सलाम बॉम्बे' का मुझे आज भी याद है. एक 'डॉक्टर की मौत' का रिपोर्टर, कोई भूल सकता है उसे क्या?

उनके न रहने पर मेरी शुरुआती प्रतिक्रिया इस खबर को नकारने वाली थी. मैंने इस पर न सोचने, इसे न मानने का निश्चय किया था. वैसे मेरे लिए एक बात चौंकाने वाली रही. मैंने देखा लोग उनकी अंतिम खबर पर रो रहे थे. मैंने दसियों लोगों से इस पर रोते देखा और सुना. मैंने इंस्टा चेक किया, हर एक पोस्ट इरफान पर थी. मैंने वॉट्सएप स्टोरी चेक की, हर स्टोरी इरफान पर थी. मैंने सोचा ऐसा क्या था इस बंदे में कि सिनेमा-विनेमा से कोई लगाव न रखने वाले लोग भी इस तरह से महसूस कर रहे हैं. मैंने अपनी भावनाओं में इसका उत्तर ढूंढने की कोशिश की. मुझे समझ आया कि ये सारे ही लोग अभी इरफान से बहुत कुछ चाहते थे, मेरी ही तरह ये रोज सूरज को दिन लेकर आते देखना चाहते थे. उन्हें एहसास हो रहा है कि अब उनकी एक्टिंग और देखने को नहीं मिलेगी और वो रो रहे हैं, मातम कर रहे हैं. यह सोचकर मेरा दिल बैठने लगा. तबसे से जब-जब कभी न देख पाने का एहसास हो रहा है. बहुत बुरा लग रहा है. मैं अब भी स्वीकारना नहीं चाहता ऐसा हुआ है.

एक और बात बता दूं कि मैं इरफान खान का फैन नहीं रहा हूं. मैंने अपने आपको जिनके फैन के तौर पर हमेशा स्वीकारा है, वे हैं केके मेनन और विजयराज. इन दोनों के पास लोगों को चौंकाने के लिए पर्याप्त उपकरण होते हैं. लेकिन यह मानूंगा कि इरफान इनसे कहीं ज्यादा वास्तविक और सहज थे. केके मेनन और विजयराज के बीच कहीं. वह इंटेंसिटी भी और अपना मजाक बनाकर सारी महफिल खींच लेने का माद्दा भी. फिर भी इरफान इतने सहज थे कि उनपर अलग से नोटिस की जरूरत नहीं पड़ती थी, मुझे हमेशा लगा कि यह इरफान नहीं, फिल्म का वह किरदार ही तो है. एक और बात जिसके चलते मैंने लोगों को दुख करते देखा शायद वह यह था कि अभी उन्होंने किया ही क्या था, कितना सब तो अपने साथ लेकर चले गए. अरे आखिर पिछले दशक तक इरफान फिल्मों के केंद्र में कहां थे? वो कहानी में कहीं साइड पर खड़े पूरी फिल्म का ताना-बाना सुलझा रहे होते थे. लेकिन जबसे 'सात खून माफ' और 'लाइफ ऑफ पाई' जैसी फिल्में आईं तब तय हुआ कि इरफान वापस टीवी में खर्च होने नहीं जाएंगे. उनका एक मुकाम है, वे यहीं रहेंगे, सिल्वर स्क्रीन पर प्रमुखता के साथ.

इस घोषणा के बाद हमें वे 'हैदर', 'साहब बीवी और...' फिर अपने सबसे ऊंचे मकाम 'पान सिंह तोमर', 'लंचबॉक्स' और 'पीकू' में दिखे. तय हो गया कि वो इंडस्ट्री को अब तक मिले सबसे बेहतरीन एक्टर्स में से एक हैं. अखबार, मैग्जीन के कॉलम उनकी तारीफों से पटे रहने लगे. लेकिन तबसे उन्होंने फिल्में ही कितनी कीं. बहुत ज्यादा तो 10. दरअसल हम अभी उनसे बहुत चाहते थे, बहुत कुछ. लेकिन एक बंदा जो समाज से ले कुछ नहीं रहा, कब तक एक तरफा देने की प्रक्रिया चलाए रखता, उस खुद्दार शख्स ने तो ईश्वर को हमारी दुआएँ तक कुबूल करने से मना कर दिया था...

PS: बहुत दुख के साथ आज लगातार 21वें दिन (किसी काम की आदत डालने के लिए इतने दिन वह काम करना जरूरी होता है) के ब्लॉग को लिखते हुए मुझे 'द इमैजिंड कम्युनिटीज' के अगले अंक की जगह इरफान खान की मौत के बारे में लिखना पड़ रहा है. अब भी चाहता हूं काश ये बुरा सपना टूटे और मेरी आंख खुल जाए.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Monday, April 13, 2020

द प्लेटफॉर्म: हर स्थापित सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था की सीमाएं दिखाने वाली फिल्म

स्पेनिश डायस्टोपियन फिल्म एल होयो (द प्लेटफॉर्म) का एक दृश्य
द प्लेटफॉर्म (The Platform- El Hoyo) पिछले दिनों खासी चर्चित रही. मुझे फिल्म अच्छी लगी लेकिन एक बार फिर अजय कुमार को फिल्म अच्छी नहीं लगी. अच्छा-बुरा लगना अक्सर हमारी समझ, हमारे वैचारिक दायरे और हमारे मूल्यों पर निर्भर करता है. मुझे लगता है कमोबेश एक जैसी ही मानसिकता वाले हम दोनों पर प्रभाव का ऐसा अंतर समझ न आने वाली बात है.

अजय ने मुझे विस्तार से तो नहीं बताया कि उनपर फिल्म के प्रभाव के पीछे क्या वजहें रहीं लेकिन मैं यहां अपने ऊपर पड़े इसके अच्छे प्रभाव की कुछ वजहें बता रहा हूं-


काफ्का के साहित्य जैसा है फिल्म का प्रभाव

फिल्म द प्लेटफॉर्म की सबसे अच्छी बात है कि उसमें डायस्टोपिक तरीके से सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था चलाने के सभी हालिया तरीकों पर एक साथ व्यंग्य करती है. इसके 'काफाएस्क' जैसी बात भी दिखती है. मतलब काफ्का के साहित्य जैसी. एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें लोग उलझे हुए हैं और उस प्रक्रिया का कोई मतलब नहीं है. इस प्रक्रिया में सफलता जैसी बातें ही निरर्थक हो जाती हैं. यह भी प्रभावित करने वाली बात रही कि दुनिया में आधुनिक दौर में राजनीतिक व्यवस्था पर हावी रही दो विचारधाराओं पूंजीवाद और समाजवाद दोनों पर ही फिल्म एक साथ तंज करती है.

फिल्म की बारीकियों पर फिर कभी विस्तार से लिखूंगा लेकिन मात्र मेरे अनुभव में ही नहीं बल्कि फिल्म बनाते हुए डायरेक्टर के दिमाग में भी व्यवस्थाओं पर व्यंग्य वाली बात हावी थी. इसके लिए मैं इसके डायरेक्टर गज़्तेलु उरुतिया के एक इंटरव्यू का अनुवादित अंश पेश कर रहा हूं, जिसकी बातों से मेरी भी सहमति है.

फिल्म में पूंजीवाद और समाजवाद दोनों की ही आलोचना

प्लेटफॉर्म के डायरेक्टर गज़्तेलु उरुतिया (Gaztelu-Urrutia) ने एक बार फिल्म के अंत को लेकर बात की थी. जिसके बारे में बताने से पहले फिल्म के स्क्रिप्ट राइटर के नाम बता देता हूं- डेविड डेसोरा और पेद्रो रिवेरो. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, "जिस तरह से प्लेटफॉर्म खत्म होती है. यह सीधे तौर पर दिखाता है कि शुरुआत में द प्लेटफॉर्म पूंजीवाद की आलोचना करती है लेकिन फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, इसका ध्यान और संदेश दोनों ही बदलते हैं."

गज़्तेलु उरुतिया ने समझाया,

"हम यह बिल्कुल मानते हैं कि पूंजी का बेहतर तरीके से बंटवारा होना चाहिए लेकिन फिल्म पूरी तरह से पूंजीवाद के बारे में नहीं है. भले ही शुरुआत में पूंजीवाद की आलोचना हो लेकिन हम यह भी देखते हैं कि जैसे ही गोरंग और बहारत समाजवाद के जरिए इसके हल की कोशिश करते हैं कि सभी अपनी इच्छा से अपना खाना शेयर करें. अंत आते-आते वे जिनकी मदद के लिए निकले होते हैं, उनमें से आधे को मारकर अपनी प्रक्रिया को भी खत्म कर देते हैं."


डायरेक्टर ने कहा- हमने अंत को दर्शकों की व्याख्या के लिए छोड़ दिया है

उन्होंने यह भी कहा, "समस्या तब सामने आती है, जब वे सभी के सहयोग के लिए प्रयास करते हैं और आप अंत में देखते हैं कि वे कोई बड़ी उपलब्धि नहीं प्राप्त करते. भले ही गोरंग आखिरी स्तर तक 'पना कोटा' को ले आता हो और बच्ची को ढूंढ लेता हो लेकिन वह खाना शेयर करने के लिए किसी का ह्रदय परिवर्तन कर पाने में  असफल रहता है. मेरे लिए इसका आखिरी स्तर, कहीं है ही नहीं. गोरंग यहां आने से पहले ही मर चुका है. और यह (आखिरी स्तर) केवल उस अहसास को व्यक्त करता है, जिसके मुताबिक गोरंग को महसूस होता है कि उसे क्या करना है."

अंतत: गज़्तेलु उरुतिया का 'द प्लेटफॉर्म' में फिल्म के अंतिम दृश्य का मकसद इसे तमाम कयासों के लिए खुला रखना है. वे चाहते हैं कि लोग खुद समझें कि क्या यह प्लान काम करता है और क्या ऊपर बैठे लोगों को नीचे वालों की फिक्र होती है. उन्होंने यह भी बताया है कि फिल्म का बिना लड़की के सीन के भी एक अंत फिल्माया गया था लेकिन वह हमारे सामने नहीं आया. गज़्तेलु उरुतिया कहते हैं,

"मैंने आपकी कल्पना पर छोड़ दिया है कि इससे क्या होता है."
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P.S.: यह सारी बातें 'द प्लेटफॉर्म' फिल्म पर कुछ विचारों के जैसी हैं. इन्हें किसी रिव्यू से कन्फ्यूज न किया जाए.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.) 

Saturday, April 11, 2020

इन वजहों के चलते पैरासाइट को ऑस्कर मिलना भारतीयों के लिए भी रहा खास

बॉन्ग जून हो की फिल्मपैरासाइट का एक दृश्य
यह लेख मेरे मित्र अजय कुमार की प्रेरणा से लिखा गया है. जिन्हें हाल ही में आई बॉन्ग जून हो की फिल्म पैरासाइट पसंद नहीं आई. मैंने ऑस्कर मिलते-मिलते पैरासाइट देख ली थी. हालांकि उसके बहुत बाद यह अमेजन प्राइम पर उपलब्ध हुई और भारत में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंची. अपनी दक्षिण एशियाई पहचान और महानगरीय जीवन के प्रति सचेत होने के चलते मुझे पैरासाइट अपने बेहद करीब की फिल्म लगी. इसलिए मैं इसके पक्ष में कुछ तर्क रख रहा हूं.

ऑस्कर की बात करें तो इसे ऑस्कर दिया जाना मुझे इसलिए भाया कि इसने अंग्रेजी का दबाव ऑस्कर दिए जाने के लिए हटाया और यह विश्वास भी दिलाया कि हम एशियाई लोगों की कहानियां और शायद अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकियों की भी अगर सिनेमा के जादू से भरी हुई हो तो उन्हें ऑस्कर में डिस्क्रिमिनेशन नहीं झेलना होगा. हम अपने टच के साथ ऑस्कर जीत सकते हैं.


हॉलीवुड की कहानियों से अलग पैरासाइट में है एशियाई समाज की चेतना

सीधे कहानी पर आते हैं. कहानी एक व्यंग्य है. ऐसा भी नहीं कि ऐसा व्यंग्य पहले कभी न हुआ हो. बॉन्ग जोन हू ने कई सारे अनुभवों को इस फिल्म में दिखाने की बात की है. साउथ कोरिया की राजधानी सियोल के बेसमेंट में बने घर में रहने वाले एक परिवार की कहानी है- पैरासाइट. यह बेसमेंट में रहने वाला परिवार छोटे-छोटे काम करके अपना जीवनयापन करता है, जैसे पिज्जा के डिब्बे बनाना आदि. लेकिन बेसमेंट में रह रहे और किसी भी तरह से राजधानी के उच्चवर्गीय लोगों के संपर्क से कटे इन लोगों को देखकर आपको भारत के महानगरों में एक-दो कमरे के घरों में रहने वाले उन लोगों की याद आ जाएगी, जिनके बच्चे पढ़ाई में तेज होने के बाद भी ऐसे स्कूलों से नहीं पढ़ पाते और ऐसी डिग्रियां नहीं जुटा पाते कि उनका जीवन अपने माता-पिता से अच्छा हो सके या वे बुढ़ापे में उनका सहारा बन सकें.

मुझे पैरासाइट से पर्टिकुलर्ली एक महिला याद आई, जो अंडरवियर के फैक्ट्री से बनकर निकलने के बाद उनकी फिनिशिंग करती थी और हर अंडरवियर के उसे 25 पैसे मिलते थे. यह सब कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि मैंने अपने महानगरीय समाज में उस कहानी के तत्व पाए और महसूस किए जबकि हॉलीवुड की फिल्में जिन्हें लंबे समय से हम सेलिब्रेट करते आए हैं, हमारे लिए सिर्फ एक सपना होती है. न उनमें दिखाई जगहें, हमारे जैसी होती हैं, न उनकी सोच और न उनकी संस्कृति. हॉलीवुड फिल्मों में परिवार संस्था का महत्व और उसकी चेतना एशियाई विचारों से कहीं अलग होती है. पैरासाइट में ऐसा नहीं है.


गैरबराबरी दिखाने के लिए बेहतर तरीकों का किया गया है इस्तेमाल

कहीं मैंने पढ़ा कि कहानी लिखते हुए बॉग जून हो के दिमाग में लगातार यह बात बनी हुई थी कि रोजगार वह एकमात्र जरिया है, जिसके जरिए दो वर्गों को आस-पास दिखाया जा सकता है. और यहीं से उन्होंने इस डार्क सटायर में सबको अमीर परिवार के घर नौकरी दिलाने की बात सोची. आप खुद भी सोच सकते हैं कि किसी अमीर व्यक्ति से कोई गरीब अपने रोजगार के अलावा कहां मिलता है? समाज का बंटवारा इस हद तक हो चुका है कि उनके स्कूल अलग हैं. उनकी दुकानें अलग हैं. उनके मोहल्ले अलग हैं. उनके पार्क अलग हैं. उनके खेल के मैदान अलग हैं. ऐसे में कोई साहब जब घर से निकलते हैं तो उनके ड्राइवर और दफ्तर पहुंचने पर दरबान और चपरासी मात्र ऐसे होते हैं, जिन गरीब लोगों से उनका सामना होता है.

पैरासाइट में दुनिया में अच्छे साहित्य में गैरबराबरी दिखाने के लिए इस्तेमाल हुए तत्वों का बहुत समझदारी से इस्तेमाल हुआ है. जैसे बड़े घर के बेसमेंट में रहने वाले पहली केयरटेकर के पति को भूत के तौर पर पेश किया जाना. उसका चोरी करके फ्रीज़ से खाना. उसका अंधेरे बंद बेसमेंट में रहना. यह एचजी वेल्स की 'द टाइम मशीन' में दिखाए गए समाज का फिल्मी निरूपण है. इसके अलावा पैरासाइट की भावना आप पर लगातार हावी रहती है. यही फिल्म की सफलता है. इतना ही नहीं कई बार आपकी संवेदना भी पक्ष बदलती है. जब आप उन्हें अमीर परिवार को लूटते देखते हैं तो आपको पैरासाइट का व्यंग्य सार्थक लगने लगता है.

फिल्म पैरासाइट का एक दृश्य

जो समाज के अमीर वर्ग में नहीं, परिस्थितियां तय करती हैं उनका भविष्य

लेकिन जरा रिवर्स गियर लगाइए और देखिए जिस समाज में वे रह रहे हैं, उनके लिए बड़े विश्वविद्यालयों की डिग्री का क्या मोल है. और फिर सोचिए कि भारत का बहुतायत अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र और विज्ञान के विशेषज्ञों के बजाए क्यों किसी नेता पर विश्वास कर लेता है. यहीं वो गुप्त रहस्य है, जो आज तक पकड़ा नहीं जा पा रहा है. समाज में पैरासाइट के गरीब परिवार की स्थिति में जी रहे 50% से ज्यादा लोग फिर से किसी पार्टी को 60-70% वोट शेयर देते रहें तो माथा पकड़कर मत बैठ जाइएगा.

अंतत: बेसमेंट में छिपे अपने पिता को लाइट जलाते-बुझाते देख गरीब परिवार के बेटे का शपथ लेना कि मैं यह घर खरीदूंगा किस स्तर पर ले जाता है फिल्म को. यह वैसा ही लगता है कि पूर्वांचल या बुंदेलखंड का कोई शख्स अपने पिता का बदला लेने के लिए मर्डर करने का संकल्प उठा लेता है और वही उसकी जिंदगी का असली मकसद बन जाता है. लेकिन इससे उसकी जिंदगी का असली मकसद खो जाता है. वो मकसद जिसके लिए उसने पिज्जा के डिब्बे पैक किए होते हैं. विनम्र रहकर दुनिया में अपना आगे का रास्ता बनाने की सोची होती है.

P.S.: यह सारी बातें पैरासाइट फिल्म पर कुछ विचारों के जैसी हैं. इन्हें किसी रिव्यू से कन्फ्यूज न किया जाए.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)