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Tuesday, May 5, 2020

शेखर कपूर की फिल्म Bandit Queen पर अरुंधति राय के आलोचनात्मक लेख The great Indian Rape-Trick I का हिंदी अनुवाद

बैंडिट क्वीन में शेखर कपूर ने कई थिएटर कलाकारों को एक्टिंग का मौका दिया, जो आगे इंडस्ट्री में बड़े नाम बने (फोटोः फर्स्टपोस्ट हिंदी)

महान भारतीय बलात्कार छल- 1


दिल्ली में बैंडिट क्वीन की प्रीमियर स्क्रीनिंग पर शेखर कपूर ने इन शब्दों के साथ फिल्म का परिचय दिया, मेरे पास सच और सौंदर्य के बीच एक चुनाव था. मैंने सच को चुना, क्योंकि सच पवित्र है.

इस बात पर जोर देना कि फिल्म सच बताती है ही उनके लिये सबसे बड़ी कॉमर्शियल और क्रिटिकल महत्व रखता है. बार-बार इंटरव्यू में, रिव्यू में और यहां तक कि फिल्म की शुरुआत में लिखा हुआ, 'यह एक सत्यकथा है' हमें यह भरोसा दिलाया जाता है.

अगर यह 'सच' नहीं होती. तो इसे उसी रेप और बदला थीम के क्लासिक वर्जन वाली चक्की से क्या बचाता जिसे हमेशा गाहे-बगाहे हमारी फिल्म इंडस्ट्री मथती रहती है. तो इसे इस सुपरिचित आरोप कि यह भारत को सही तरह से चित्रित नहीं किया गया है? वाकई कुछ भी नहीं.

यह 'सच' ही है जो इसे बचाता है. हर बार, जब यह स्विस चाकू लेकर सुपरमैन की तरह गोते लगाती है- और फिल्म को बेकार, नीरसता के जबड़े से खींच निकालती है. इसने सुर्खियां बनाईं. मुंहफट तर्क खींचे. और गहन आलोचना भी.

अगर आप कहें कि आपने फिल्म को बेमज़ा पाया, आपको बताया जायेगा- खैर ऐसा ही सच भी होता है- बेमजा. जोड़-तोड़ से भरा? ऐसी ही जिंदगी है- जोड़-तोड़ वाली.

यह ट्रकों के पीछे लिखे ऐसे ही डायलॉग जैसा कुछ-कुछ है -

प्यार ही ईश्वर है
जीवन कठिन है
सच ही पवित्र है
हॉर्न बजायें

चाहे हो या न हो सच और ज्यादा प्रासंगिक नहीं रह गया है. मसला यह है कि यह (अगर यह पहले से ही नहीं हो चुका है) - सच बन जायेगा.

फूलन देवी, एक औरत का महत्वपूर्ण होना खत्म हो चुका है. (हां यह भले ही सच है कि वह मौजूद है. उसकी आंखें हैं, कान हैं, अंग और बाल आदि हैं. बल्कि अब एक पता भी) लेकिन वह एक लीजेंड होने के शाप से ग्रसित हैं. वह केवल अपना एक वर्जन भर हैं. यहां उनके दूसरे वर्जन भी हैं जो कि ध्यान खींचने के लिये झगड़ रहे हैं. खासकर शेखर कपूर की एक सच्ची कथा. जिसपर फिलहाल हमें यकीन करने के लिये काफी जोर दिया जा रहा है.

डेरेक मैल्कम, द गार्डियन अख़बार में लिखते हैं, यह एक ऐसी कहानी है, जो अगर कोई फिक्शन का टुकड़ा होती, तो इसे क्रेडिट देना कठिन हो जाता कि यह फूलन देवी की असली कहानी है जो भारतीय बाल विवाहित है.

लेकिन क्या ऐसा है? यह सत्यकथा है? कोई कैसे यह तय करेगा? कौन तय करेगा?

शेखर कपूर कहते हैं कि फिल्म माला सेन की किताब - इंडिया की बैंडिट क्वीन : फूलन देवी की सच्ची कहानी (इंडियाज बैंडिट क्वीन : द ट्रू स्टोरी ऑफ फूलन देवी). किताब कहानी को पुनर्गठित करती है, इंटरव्यू के जरिये, न्यूजपेपर रिपोर्ट्स के जरिए, फूलन देवी से मुलाकातों के जरिए और फूलन देवी के लिखित वर्णन से लिए उद्धरणों के जरिए, जो कि जेल से उनसे मिलने जाने वालों ने तस्करी किये थे, हालांकि एक वक्त में कुछ एक पेज कर-करके ही.

कभी-कभी एक ही वाकये के कई सारे वर्जन - वर्जन जो एक-दूसरे से सीधे टकराते हैं जैसे फूलन का वर्जन, एक पत्रकार का वर्जन, और एक चश्मदीद गवाह का वर्जन - जिन सभी को किताब में पाठकों के लिए प्रस्तुत किया गया है. इससे जो उभरता है वह एक जटिल, बुद्धिमान और इंसानी किताब है. अस्पष्टता, चिंता और उत्सुकता से भरी कि जिस औरत को फूलन देवी कहा जाता है, वह असलियत में है क्या.

शेखर कपूर जिज्ञासु नहीं थे.

उन्होंने खुले तौर पर स्वीकार किया था कि उन्हें महसूस नहीं हुआ कि उन्हें फूलन से मिलने की जरूरत है.  उनके प्रोड्यूसर बॉबी बेदी इस फैसले का समर्थन करते हैं,  "शेखर उससे मिला होता अगर उसे इसकी जरूरत महसूस हुई होती." (संडे ऑब्जर्वर, 20 अगस्त, 1944)

जारी...

लेख के बारे में-

22 अगस्त 1994 को लिखा गया अरुंधति राय का लेख The Great Indian Rape-Trick I, शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन की मानवतावादी (न कि सिर्फ नारीवादी) दृष्टिकोण से फिल्म की आलोचना है. पॉपुलर आयामों में, खासकर कला को एक प्रॉडक्ट की शक्ल देते हुए, हो जाने वाली गलतियों को यह उजागर करता है.

अनुवाद के बारे में- 

करीब 2 साल से इस अनुवाद को पूरा करने की इच्छा थी ताकि हिंदी के पाठक जो अक्सर शेखर कपूर की इस फिल्म को लेकर कई वजहों से लहालोट रहते हैं, इसकी कमियों को भी बारीकी से समझें.

(नोट: इस बड़े लेख का कई हिस्सों में अनुवाद कर रहा हूं. इससे पहले किए किताबों के अनुवाद आप इससे पहले के ब्लॉग में पढ़ सकते हैं. आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Thursday, April 16, 2020

Friends के चैंडलर बिंग-मोनिका गेलर का प्यार और आपके रिलेशन में कोई तीसरा?

एक्सट्राऑर्डिनरी की तलाश में रहने वाले ऑर्डिनरी मोनिका गेलर-चैंडलर बिंग का प्यार काफी कुछ सिखाता है
दुनिया की तमाम रोचक प्रेम कहानियों में से एक मुझे लगी चैंडलर बिंग और मोनिका गेलर की. शायद कम ही लोग हों जिन्हें मशहूर अमेरिकन टीवी सीरीज फ्रेंड्स (Friends) के बारे में न पता हो. हो सकता है आपमें से कुछ ने इसे देखा न हो लेकिन दुनिया में सबसे ज्यादा देखी गई अंग्रेजी भाषा की टीवी सीरीज में यह शुमार होती आई है. यह ऐसे छह दोस्तों की कहानी है जो 25-30 साल की उम्र के है. नौकरीपेशा हैं और दो अपार्टमेंट शेयर करते हैं (हालांकि एक दोस्त अलग रहता है, जिसकी शादी और तलाक दोनों ही हो चुके हैं).

बहरहाल इसके दो किरदारों के बीच पहले आकर्षण पनपता है फिर प्यार. इनके नाम हैं चैंडलर बिंग और मोनिका गेलर. चैंडलर एमेच्योर लेकिन अच्छे ह्यूमर वाला और जानकार है. मोनिका बेहद सफाई पसंद और समझदार बनने की कोशिश में उलझ जाने वाली है, कई मायनों में उसे बहुत सी चीजों से ऑब्सेस्ड कहा जा सकता है. सीरीज में कई सीजन बाद दोनों को प्यार हो जाता है. यह प्यार बिल्कुल प्यार जैसा है, कन्फ्यूजिंग और एक्साइटिंग. न कि स्क्रीन पर अक्सर दिखाया जाने वाला पहली नजर का प्यार टाईप.

प्यार के बहुत शुरुआती दौर में चैंडलर और मोनिका दोनों ही किसी तरह के प्यार को स्वीकारने से बचते हैं और इसे मात्र आकर्षण मानकर खत्म करना चाहते हैं. लेकिन कई बार फिजिकल होने के बाद, वे लगभग प्यार में होते हैं, जिसकी पहली स्वीकारोक्ति चैंडलर की ओर से आती है कि उसे सेक्स का ऐसा अनुभव सिर्फ मोनिका के साथ रहा और सिर्फ उसकी वजह से (अपनी एमेच्योरिश गढ़न के चलते वह इस बात को पूरी तरह नहीं कह पाता लेकिन उसका इशारा केयर और प्यार की ओर ही है). वह यह दावा भी करता है कि मोनिका इसकी ताकीद उसकी अन्य पार्ट्नर्स से कर सकती है. फिर धीरे-धीरे दोनों ओर से प्यार का भाव दिखने लगता है.

चैंडलर और मोनिका का एक दृश्य
इन किरदारों को लेकर लिखे एक सीन तक मेरी बात सीमित है. एक सीन में मोनिका की दोस्त रेचल उसे एक मेल नर्स के साथ डेट पर चलने को कहती है क्योंकि वह उसके साथी मेल नर्स के साथ खुद डेट पर जाने वाली है. इसी बीच चैंडलर की किसी बात से खफा मोनिका, उसे जलाने के लिए डेट की बात पर हामी भर देती है. हालांकि इसके बाद जब चैंडलर उससे माफी मांगता है और उसे अपने एमेच्योर होने के चलते बात को गलत तरीके से पेश कर देने का हवाला देता है तो मोनिका झट से उसके प्रति वफादार रहने की हामी भर देती है. दरअसल वह इस माफीनामे का ही इंतजार कर रही होती है.

हमेशा आपके रिश्ते में एक तीसरा बना रहता है, उसे इग्नोर किया तो रिलेशन गया

इस सीन में काफी कुछ ऐसा है, जो किसी रिलेशन में रह रहे लोग सीख सकते हैं. हमेशा एक्सट्राऑर्डिनरी की तलाश में रहने वाले चैंडलर और मोनिका दोनों को ही 'आर्डिनरी एक-दूसरे' में वह भाव-वह प्यार मिलता है. लेकिन इससे भी जरूरी एक सीख है. कि चाहे चैंडलर-मोनिका हों, आप हों या कोई अन्य. हमेशा आपके रिश्ते में एक तीसरा बना रहता है. आपका पार्टनर जो हमेशा आपके साथ है, वो जितना इस तीसरे के बारे में जानता है, उतना अच्छा है. जरूरी नहीं कि यह तीसरा कोई इंसान ही हो. हो सकता है यह तीसरा आपका करियर हो, यह तीसरा आपका कोई पैशन हो या इंसान भी हो सकता है, जिसके प्रति आपका खिंचाव हो.

इसलिए कभी इस तीसरे के बारे में अपने पार्टनर से बात करने से न बचें. जितना ज्यादा आपको अपने पार्टनर के इस तीसरे के बारे में पता होगा, उतने ज्यादा आप अपने रिश्ते में सुरक्षित होंगे और ईमानदार रह सकेंगे. जितना कम आप उसके बारे में जानेंगे, तीसरे के मजबूत होने के चांसेस उतने ज्यादा बढ़ जाएंगे. इसलिए हमेशा उस तीसरे को जानने की कोशिश करें ताकि आपका पार्टनर तीसरे पर आपको चुने, इसलिए नहीं कि इसका उसपर दबाव हो बल्कि इसलिए कि आप उस तीसरे से अच्छे हों.
क्या आपने अपने पार्टनर को बताया है कि आपने उसके साथ रहना ही क्यों चुना?
मसलन उस पल के बारे में सोचिए जब खुद आपका पार्टनर आपको इस बात की सूचना दे कि उसे देखा है, उसके साथ मेरी हल्की-फुल्की बात हुई, जिसके बाद उसने मुझे डिनर पर बुलाया लेकिन मैंने उसके डिनर के ऑफर को टाला क्योंकि आज मैं तुम्हारे साथ खाना खाना चाहता था. ऐसी छोटी-छोटी चीजें ही पार्टनर पर कॉन्फिडेंस बिल्डिंग की एक्सरसाइज के तौर पर काम करती हैं ताकि वह भी ईमानदारी से अपने तीसरे की बातें आपसे शेयर करने से झिझके नहीं. आखिरकार प्यार तब क्या ही प्यार रह जाएगा, जब आपने किसी को जबरदस्ती इमोशनल बंधक बनाकर रखा हो और वैसे भी कोई कितने दिन ऐसा कर सकता है!

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Wednesday, April 15, 2020

मनी हाइस्ट का पहला सीन याद है आपको? डायरेक्टर ने पूरी सीरीज इसी में डिफाइन कर रखी है

मनी हीस्ट के पहले ही सीन में पूरी सीरीज डिफाइन कर दी जाती है
मनी हीस्ट पर उसका सबसे कमजोर सीजन देखने के बाद लिखना थोड़ा असहज कर रहा है लेकिन अच्छी बात यह है कि मैं चौथे सीजन का रिव्यू नहीं लिख रहा. सिर्फ उसमें दिखाए गए प्रतीकों पर बात कर रहा हूं. कुछ ऐसे प्रतीक जिनके बारे में समझना अपेक्षाकृत आसान है, जैसे लाल रंग का जंपसूट और सीरीज में कई जगह दिखाया गया लाल रंग. लेकिन इसके अलावा कुछ और प्रतीक हैं, जिनके बारे में मैं यहां बात कर रहा हूं-


बिग डायरेक्टोरियल सक्सेस: पहले सीन में ही डिफाइन कर दी गई थी पूरी सीरीज

मनी हीस्ट की शुरुआत याद करें, लाल रंग का बैकड्रॉप है. टोक्यो एक बुरे सपने से जागती है, बंदूक लिए हुए. यह सपना उसके भूतकाल के बारे में है. मैं पूरी सीरीज देखने के बाद अभिभूत हो गया कि सीरीज का निर्माण करने वालों की अपनी थीम पर इतनी अच्छी पकड़ थी कि उन्होंने ओपनिंग सीन में ही मनी हीस्ट की पूरी व्याख्या रख दी. इस पहले सीन को समझ लें तो मनी हीस्ट की प्रतीकात्मता काफी कुछ समझ आ जाएगी.


ओपनिंग सीन में टोक्यो ही क्यों?

आपने नाभिकीय विखंडन की प्रक्रिया के बारे में जरूर सुना होगा. जिसके आधार पर परमाणु बम काम करता है. परमाणु बम की तरह ही अनियंत्रित तरीके से काम करने वाला मनी हीस्ट का एकमात्र किरदार है टोक्यो. टोक्यो कब, किस चीज को लेकर अनियंत्रित हो जाए नहीं पता. मनी हीस्ट के कुछ किरदारों की तरह उसे भावुक या संवेदनशील नहीं कह सकते, उसे सिर्फ अनियंत्रित कह सकते हैं. और ध्यान दें तो मनी हीस्ट के प्लॉट में जो सबसे जरूरी तत्व है वह है परिस्थितियों को अनियंत्रित कर देना ताकि प्रोफेसर उनका अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर सके. ऐसी प्रक्रिया को मैं केऑस का दर्शन (Philosophy of Chaos) कहना पसंद करता हूं. आगे बढ़ूं, उससे पहले इस प्रक्रिया पर हिंदी के लेखक अनिल यादव के विचार पढ़ने चाहिए क्योंकि उन्होंने इसे बहुत अच्छे से सामने रखा है-

"जीवन में अनिश्चितता एक ग़ज़ब की चीज़ है, वह अक्सर वहां पहुंचाती है, जहां आप प्रयास और योजना के भरोसे नहीं जा सकते. आपको अपने भीतर की उस शक्ति का पता चलता है जो सुरक्षित माहौल में ऊबकर सोई रहती है."
इसी का फायदा प्रोफेसर उठाने की कोशिश करता है. यानि वह नाभिकीय विखंडन की प्रक्रिया को नियंत्रित कर परमाणु बम के बजाए परमाणु रिएक्टर में तब्दील करना चाहता है. भले ही सीरीज में प्रोफेसर की ओर से सबकुछ प्लान्ड लगता हो लेकिन वह प्लानिंग केऑस यानि गड़बड़ी फैलाने की ही है.

टोक्यो मनी हीस्ट के किरदारों के लिए सोचा गया पहला नाम था

टोक्यो के किरदार से ही शुरु हुआ सब, यह उसके प्रति समर्पण भी

इसके अलावा ओपनिंग सीन में टोक्यो के होने के पीछे एक वजह यह भी है कि मनी हीस्ट के किरदारों में सबसे पहले उसी का नामकरण हुआ था. सबसे पहले उसी के बारे में सोचा गया था. शो डेवलपर्स में से एक पहले दिन ही एक ऐसी टीशर्ट पहनकर आया था, जिस पर टोक्यो लिखा था. वहीं से यह नाम आया. जिसके बाद बाकी किरदार आए. टोक्यो से सीरीज की शुरुआत एक तरह से डायरेक्टर का इस क्रोनोलॉजी के प्रति समर्पण भी है.

लेकिन पहले सीन में तीन बातें और हैं, जिनका जिक्र मैंने किया है, लाल रंग का बैकड्रॉप, भूतकाल के बुरे सपने से जागना और बंदूक. आप जानते ही हैं कि पहले सीन का लाल रंग आगे चलकर लाल रंग के कपड़ों में बदल जाता है. लाल रंग का ऐसे ही सीरीज में बार-बार प्रयोग होता है. लाल रंग, दुनिया में तीन भावों का प्रतीक होता है- प्यार, मौत (खून-खराबा) और प्रतिरोध. ये तीनों ही तत्व सीरीज में अच्छे से गुंथे देखे जा सकते हैं.


लाल जंपसूट, सल्वाडोर डाली का मास्क और लाल रंग का हर जगह प्रयोग

दुनिया की कई क्रांतियों में लाल रंग की प्रतीकात्मकता का प्रयोग हो चुका है. 18वीं शताब्दी में हुई फ्रांस की क्रांति हो या 1950 के दशक में हुई क्यूबा की क्रांति- लाल रंग को नई स्वतंत्रता और आजादी के प्रतीक के तौर पर पेश किया गया. आखिर 'बेला चाओ' का बार-बार सीरीज में दोहराया जाना भी तो ऐसा ही स्टेटमेंट है.

लाल रंग के सीरीज में प्रयोग का एक अच्छा उदाहरण यह भी है कि मनी हीस्ट के प्रमुख किरदार ही लाल जंपसूट नहीं पहनते. बैंक पर कब्जे के बाद ये लाल रंग के जंपसूट वे बंधकों को भी पहनने को देते हैं. हालांकि इसे ऐसे पेश किया जाता है कि इससे बैंक के बाहर सुरक्षा में तैनात पुलिस और सेना के लोग भ्रमित होंगे और किसी बंधक को मार देने के डर से गोलियां नहीं चलाएंगे. लेकिन सबका एक तरह के कपड़े पहनना समानता का प्रतीक भी है. जो कि न सिर्फ बंधकों और चोरी के प्रमुख किरदारों के बीच संबंध स्थापित करता है बल्कि हाल ही में उनकी बदली निष्ठा को भी दिखाता है.

थोड़ा विषयांतर जरूर लग सकता है लेकिन लगे हाथ डाडा कला आंदोलन के मशहूर कलाकार सल्वाडोर डाली के मास्क की बात भी कर लेते हैं. यह इस स्पेनिश कलाकार के विचारों को एक समर्पण है, जिनके विचार बार-बार सीरीज में प्रतिबिंबित होते रहते हैं. ज्यूरिख के इस डाडा आंदोलन में आधुनिक पूंजीवादी समाज को नकारने की बात की गई थी. खुद प्रोफेसर के शब्दों में इन किरदारों के कपड़ों का मतलब प्रतिरोध, आक्रोश, और संदेह है.

बंदूकें आतंक का प्रतीक, खुद प्रोफेसर भी इस आतंक से नहीं बचा

इसके अलावा अगला प्रतीक है बंदूक. जो कि आतंक और हिंसा का प्रतीक है. जाहिर है मनी हीस्ट में यह प्रतीक जमकर भुनाया जाता है. सभी बंदूके लिए घूमते दिखते हैं. प्रमुख किरदारों के अलावा बंधकों के पास भी नकली बंदूकें दिखती हैं. एकबारगी तो सबसे स्मार्ट किरदार प्रोफेसर खुद भी बंदूकों के इस आतंक के झांसे में आ जाता है. जब वह बंदूक की गोलियों से अपनी प्रेमिका लिस्बन को मरा मान बैठता है.


भूतकाल हर तरह से रहा है मनी हाइस्ट की नींव

आखिरी है भूतकाल के बुरे सपने से जागना. भूतकाल इस सीरीज में कभी पीछा नहीं छोड़ता. चाहे वह किरदारों का भूत में जाकर बार-बार प्लान को दोहराना हो. बार-बार दिखाए जाने वाले फ्लैशबैक हों या भूतकाल में मार दिए गए लोगों की याद में ही रचा गया पूरा महान चोरियों का खेल हो. यहां तक कि जब प्रोफेसर के पास रकेल के सामने कहने को कुछ नहीं रह जाता तो वह भूतकाल के एक वाकये यूरोपीय देशों के 'लिक्विडिटी इंजेक्शन' की घटना का हवाला देकर खुद को बचाता है. फिर चाहे नैरोबी के बच्चे की कहानी हो या पलेर्मो-बर्लिन के प्यार की भूतकाल पूरी तरह से सीरीज पर हावी है.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.) 

Monday, April 13, 2020

द प्लेटफॉर्म: हर स्थापित सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था की सीमाएं दिखाने वाली फिल्म

स्पेनिश डायस्टोपियन फिल्म एल होयो (द प्लेटफॉर्म) का एक दृश्य
द प्लेटफॉर्म (The Platform- El Hoyo) पिछले दिनों खासी चर्चित रही. मुझे फिल्म अच्छी लगी लेकिन एक बार फिर अजय कुमार को फिल्म अच्छी नहीं लगी. अच्छा-बुरा लगना अक्सर हमारी समझ, हमारे वैचारिक दायरे और हमारे मूल्यों पर निर्भर करता है. मुझे लगता है कमोबेश एक जैसी ही मानसिकता वाले हम दोनों पर प्रभाव का ऐसा अंतर समझ न आने वाली बात है.

अजय ने मुझे विस्तार से तो नहीं बताया कि उनपर फिल्म के प्रभाव के पीछे क्या वजहें रहीं लेकिन मैं यहां अपने ऊपर पड़े इसके अच्छे प्रभाव की कुछ वजहें बता रहा हूं-


काफ्का के साहित्य जैसा है फिल्म का प्रभाव

फिल्म द प्लेटफॉर्म की सबसे अच्छी बात है कि उसमें डायस्टोपिक तरीके से सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था चलाने के सभी हालिया तरीकों पर एक साथ व्यंग्य करती है. इसके 'काफाएस्क' जैसी बात भी दिखती है. मतलब काफ्का के साहित्य जैसी. एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें लोग उलझे हुए हैं और उस प्रक्रिया का कोई मतलब नहीं है. इस प्रक्रिया में सफलता जैसी बातें ही निरर्थक हो जाती हैं. यह भी प्रभावित करने वाली बात रही कि दुनिया में आधुनिक दौर में राजनीतिक व्यवस्था पर हावी रही दो विचारधाराओं पूंजीवाद और समाजवाद दोनों पर ही फिल्म एक साथ तंज करती है.

फिल्म की बारीकियों पर फिर कभी विस्तार से लिखूंगा लेकिन मात्र मेरे अनुभव में ही नहीं बल्कि फिल्म बनाते हुए डायरेक्टर के दिमाग में भी व्यवस्थाओं पर व्यंग्य वाली बात हावी थी. इसके लिए मैं इसके डायरेक्टर गज़्तेलु उरुतिया के एक इंटरव्यू का अनुवादित अंश पेश कर रहा हूं, जिसकी बातों से मेरी भी सहमति है.

फिल्म में पूंजीवाद और समाजवाद दोनों की ही आलोचना

प्लेटफॉर्म के डायरेक्टर गज़्तेलु उरुतिया (Gaztelu-Urrutia) ने एक बार फिल्म के अंत को लेकर बात की थी. जिसके बारे में बताने से पहले फिल्म के स्क्रिप्ट राइटर के नाम बता देता हूं- डेविड डेसोरा और पेद्रो रिवेरो. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, "जिस तरह से प्लेटफॉर्म खत्म होती है. यह सीधे तौर पर दिखाता है कि शुरुआत में द प्लेटफॉर्म पूंजीवाद की आलोचना करती है लेकिन फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, इसका ध्यान और संदेश दोनों ही बदलते हैं."

गज़्तेलु उरुतिया ने समझाया,

"हम यह बिल्कुल मानते हैं कि पूंजी का बेहतर तरीके से बंटवारा होना चाहिए लेकिन फिल्म पूरी तरह से पूंजीवाद के बारे में नहीं है. भले ही शुरुआत में पूंजीवाद की आलोचना हो लेकिन हम यह भी देखते हैं कि जैसे ही गोरंग और बहारत समाजवाद के जरिए इसके हल की कोशिश करते हैं कि सभी अपनी इच्छा से अपना खाना शेयर करें. अंत आते-आते वे जिनकी मदद के लिए निकले होते हैं, उनमें से आधे को मारकर अपनी प्रक्रिया को भी खत्म कर देते हैं."


डायरेक्टर ने कहा- हमने अंत को दर्शकों की व्याख्या के लिए छोड़ दिया है

उन्होंने यह भी कहा, "समस्या तब सामने आती है, जब वे सभी के सहयोग के लिए प्रयास करते हैं और आप अंत में देखते हैं कि वे कोई बड़ी उपलब्धि नहीं प्राप्त करते. भले ही गोरंग आखिरी स्तर तक 'पना कोटा' को ले आता हो और बच्ची को ढूंढ लेता हो लेकिन वह खाना शेयर करने के लिए किसी का ह्रदय परिवर्तन कर पाने में  असफल रहता है. मेरे लिए इसका आखिरी स्तर, कहीं है ही नहीं. गोरंग यहां आने से पहले ही मर चुका है. और यह (आखिरी स्तर) केवल उस अहसास को व्यक्त करता है, जिसके मुताबिक गोरंग को महसूस होता है कि उसे क्या करना है."

अंतत: गज़्तेलु उरुतिया का 'द प्लेटफॉर्म' में फिल्म के अंतिम दृश्य का मकसद इसे तमाम कयासों के लिए खुला रखना है. वे चाहते हैं कि लोग खुद समझें कि क्या यह प्लान काम करता है और क्या ऊपर बैठे लोगों को नीचे वालों की फिक्र होती है. उन्होंने यह भी बताया है कि फिल्म का बिना लड़की के सीन के भी एक अंत फिल्माया गया था लेकिन वह हमारे सामने नहीं आया. गज़्तेलु उरुतिया कहते हैं,

"मैंने आपकी कल्पना पर छोड़ दिया है कि इससे क्या होता है."
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P.S.: यह सारी बातें 'द प्लेटफॉर्म' फिल्म पर कुछ विचारों के जैसी हैं. इन्हें किसी रिव्यू से कन्फ्यूज न किया जाए.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.) 

Saturday, April 11, 2020

इन वजहों के चलते पैरासाइट को ऑस्कर मिलना भारतीयों के लिए भी रहा खास

बॉन्ग जून हो की फिल्मपैरासाइट का एक दृश्य
यह लेख मेरे मित्र अजय कुमार की प्रेरणा से लिखा गया है. जिन्हें हाल ही में आई बॉन्ग जून हो की फिल्म पैरासाइट पसंद नहीं आई. मैंने ऑस्कर मिलते-मिलते पैरासाइट देख ली थी. हालांकि उसके बहुत बाद यह अमेजन प्राइम पर उपलब्ध हुई और भारत में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंची. अपनी दक्षिण एशियाई पहचान और महानगरीय जीवन के प्रति सचेत होने के चलते मुझे पैरासाइट अपने बेहद करीब की फिल्म लगी. इसलिए मैं इसके पक्ष में कुछ तर्क रख रहा हूं.

ऑस्कर की बात करें तो इसे ऑस्कर दिया जाना मुझे इसलिए भाया कि इसने अंग्रेजी का दबाव ऑस्कर दिए जाने के लिए हटाया और यह विश्वास भी दिलाया कि हम एशियाई लोगों की कहानियां और शायद अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकियों की भी अगर सिनेमा के जादू से भरी हुई हो तो उन्हें ऑस्कर में डिस्क्रिमिनेशन नहीं झेलना होगा. हम अपने टच के साथ ऑस्कर जीत सकते हैं.


हॉलीवुड की कहानियों से अलग पैरासाइट में है एशियाई समाज की चेतना

सीधे कहानी पर आते हैं. कहानी एक व्यंग्य है. ऐसा भी नहीं कि ऐसा व्यंग्य पहले कभी न हुआ हो. बॉन्ग जोन हू ने कई सारे अनुभवों को इस फिल्म में दिखाने की बात की है. साउथ कोरिया की राजधानी सियोल के बेसमेंट में बने घर में रहने वाले एक परिवार की कहानी है- पैरासाइट. यह बेसमेंट में रहने वाला परिवार छोटे-छोटे काम करके अपना जीवनयापन करता है, जैसे पिज्जा के डिब्बे बनाना आदि. लेकिन बेसमेंट में रह रहे और किसी भी तरह से राजधानी के उच्चवर्गीय लोगों के संपर्क से कटे इन लोगों को देखकर आपको भारत के महानगरों में एक-दो कमरे के घरों में रहने वाले उन लोगों की याद आ जाएगी, जिनके बच्चे पढ़ाई में तेज होने के बाद भी ऐसे स्कूलों से नहीं पढ़ पाते और ऐसी डिग्रियां नहीं जुटा पाते कि उनका जीवन अपने माता-पिता से अच्छा हो सके या वे बुढ़ापे में उनका सहारा बन सकें.

मुझे पैरासाइट से पर्टिकुलर्ली एक महिला याद आई, जो अंडरवियर के फैक्ट्री से बनकर निकलने के बाद उनकी फिनिशिंग करती थी और हर अंडरवियर के उसे 25 पैसे मिलते थे. यह सब कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि मैंने अपने महानगरीय समाज में उस कहानी के तत्व पाए और महसूस किए जबकि हॉलीवुड की फिल्में जिन्हें लंबे समय से हम सेलिब्रेट करते आए हैं, हमारे लिए सिर्फ एक सपना होती है. न उनमें दिखाई जगहें, हमारे जैसी होती हैं, न उनकी सोच और न उनकी संस्कृति. हॉलीवुड फिल्मों में परिवार संस्था का महत्व और उसकी चेतना एशियाई विचारों से कहीं अलग होती है. पैरासाइट में ऐसा नहीं है.


गैरबराबरी दिखाने के लिए बेहतर तरीकों का किया गया है इस्तेमाल

कहीं मैंने पढ़ा कि कहानी लिखते हुए बॉग जून हो के दिमाग में लगातार यह बात बनी हुई थी कि रोजगार वह एकमात्र जरिया है, जिसके जरिए दो वर्गों को आस-पास दिखाया जा सकता है. और यहीं से उन्होंने इस डार्क सटायर में सबको अमीर परिवार के घर नौकरी दिलाने की बात सोची. आप खुद भी सोच सकते हैं कि किसी अमीर व्यक्ति से कोई गरीब अपने रोजगार के अलावा कहां मिलता है? समाज का बंटवारा इस हद तक हो चुका है कि उनके स्कूल अलग हैं. उनकी दुकानें अलग हैं. उनके मोहल्ले अलग हैं. उनके पार्क अलग हैं. उनके खेल के मैदान अलग हैं. ऐसे में कोई साहब जब घर से निकलते हैं तो उनके ड्राइवर और दफ्तर पहुंचने पर दरबान और चपरासी मात्र ऐसे होते हैं, जिन गरीब लोगों से उनका सामना होता है.

पैरासाइट में दुनिया में अच्छे साहित्य में गैरबराबरी दिखाने के लिए इस्तेमाल हुए तत्वों का बहुत समझदारी से इस्तेमाल हुआ है. जैसे बड़े घर के बेसमेंट में रहने वाले पहली केयरटेकर के पति को भूत के तौर पर पेश किया जाना. उसका चोरी करके फ्रीज़ से खाना. उसका अंधेरे बंद बेसमेंट में रहना. यह एचजी वेल्स की 'द टाइम मशीन' में दिखाए गए समाज का फिल्मी निरूपण है. इसके अलावा पैरासाइट की भावना आप पर लगातार हावी रहती है. यही फिल्म की सफलता है. इतना ही नहीं कई बार आपकी संवेदना भी पक्ष बदलती है. जब आप उन्हें अमीर परिवार को लूटते देखते हैं तो आपको पैरासाइट का व्यंग्य सार्थक लगने लगता है.

फिल्म पैरासाइट का एक दृश्य

जो समाज के अमीर वर्ग में नहीं, परिस्थितियां तय करती हैं उनका भविष्य

लेकिन जरा रिवर्स गियर लगाइए और देखिए जिस समाज में वे रह रहे हैं, उनके लिए बड़े विश्वविद्यालयों की डिग्री का क्या मोल है. और फिर सोचिए कि भारत का बहुतायत अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र और विज्ञान के विशेषज्ञों के बजाए क्यों किसी नेता पर विश्वास कर लेता है. यहीं वो गुप्त रहस्य है, जो आज तक पकड़ा नहीं जा पा रहा है. समाज में पैरासाइट के गरीब परिवार की स्थिति में जी रहे 50% से ज्यादा लोग फिर से किसी पार्टी को 60-70% वोट शेयर देते रहें तो माथा पकड़कर मत बैठ जाइएगा.

अंतत: बेसमेंट में छिपे अपने पिता को लाइट जलाते-बुझाते देख गरीब परिवार के बेटे का शपथ लेना कि मैं यह घर खरीदूंगा किस स्तर पर ले जाता है फिल्म को. यह वैसा ही लगता है कि पूर्वांचल या बुंदेलखंड का कोई शख्स अपने पिता का बदला लेने के लिए मर्डर करने का संकल्प उठा लेता है और वही उसकी जिंदगी का असली मकसद बन जाता है. लेकिन इससे उसकी जिंदगी का असली मकसद खो जाता है. वो मकसद जिसके लिए उसने पिज्जा के डिब्बे पैक किए होते हैं. विनम्र रहकर दुनिया में अपना आगे का रास्ता बनाने की सोची होती है.

P.S.: यह सारी बातें पैरासाइट फिल्म पर कुछ विचारों के जैसी हैं. इन्हें किसी रिव्यू से कन्फ्यूज न किया जाए.

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