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Friday, April 17, 2020

क्या हमउम्र लोग बिना किसी लालच, एक ही मकसद के लिए कर सकते हैं काम? हां, कठफोड़वा ने किया

उबंटू दक्षिणी अफ्रीकी देशों में प्रचलित एक विचार है
आपने यूं हंसी-मजाक के लिए, किसी ट्रिप पर जाने के लिए, पार्टी के लिए, ट्रेक पर जाने के लिए तो एक ही उम्र के लोगों को साथ आते देखा होगा लेकिन इस देश में विरले ही होता है कि बिना संस्थागत प्रयास के ऐसा संभव हो कि एक ही उम्र के लोग साथ आकर लिखने-पढ़ने के लिए कोई काम करें, वह भी तब जब वे दोस्त न हों (बाद में भले ही दोस्त बन जाएँ). मैंने अपने से अधिक उम्र वालों से अक्सर ऐसी बातें सुनी हैं कि मेरे जो दोस्त थे, वे मेरे साथ अब संपर्क में नहीं हैं. इसके साथ ही वे ऐसा होने के पीछे तल्ख वजहें भी बताते हैं. यह नॉर्मल भी लगता है. लेकिन अगर वे यह कहते हैं कि जो कभी उनके बहुत करीबी थे और आज उनके विरोधी हैं तो थोड़ा अजीब भी लगता है. ऐसे में दोनों ही ओर से कहीं न कहीं चूक हुई है. आज इन्हीं चूक पर बात करेंगे.

करीब तीन साल के मुक्त विचारों के लिए काम कर रहा समूह

इससे जुड़ी बातें मेरे पर्सनल एक्सपीरियंस पर आधारित हैं. मैंने 2017 के आखिरी 6 महीनों में एक ग्रुप बनाया. मैंने लगातार उन लोगों से बात की जो अच्छा लिख सकते थे और जिनमें मुझे नयापन लगता था और उनसे इस ग्रुप में शामिल होने को कहा. लेकिन इसमें खास बात यह थी कि व्यक्तिगत स्तर पर मैं उनमें से सिर्फ 1 को अच्छे से जानता था और हम दोनों की करीब-करीब रोज़ की बातचीत वाली दोस्ती थी. बाकी 3 के साथ मेरी चलते-फिरते की जान-पहचान थी. हम सभी पांच का एक ही मकसद था एक वेबसाइट चलाना, जिसका नाम कठफोड़वा है. शुरुआती दिनों में मैंने और उन सभी ने उसपर बहुत मेहनत की. हालांकि वेबसाइट चली नहीं लेकिन यह ग्रुप चला. इस कोर ग्रुप का एक आउटर ग्रुप भी था, जिसमें दसियों लोग शामिल थे, खास बात यह है कि वह आउटर ग्रुप भी काफी हद तक बाकी है. लेकिन असली सफलता कोर ग्रुप की गतिविधियां रही हैं. हम पांचों शुरुआती दौर से अब बहुत आगे निकल चुके हैं. हमारे बीच में जबरदस्त असहमतियां हैं लेकिन कभी लड़ाई नहीं हुई. हममें से अधिकतर लगातार जबरदस्त तरीके से पढ़ने और लिखने में लगे हुए हैं और बाकी लगातार उनके विचारों की, उनके पढ़े हुए के आयाम निकालने की कोशिश करते रहते हैं और सामूहिक तौर पर यह पूरी तरह से सफल प्रयोग है.

दक्षिणी अफ्रीकी देशों में बहुचर्चित है उबंटू का विचार

इसकी वजहें क्या हैं? इसकी वजह है 'उबंटू'. वैसे उबंटू का साधारण अर्थ बताया जाता है, 'मैं हूं क्योंकि हम हैं' लेकिन इसका वास्तविक मतलब इससे कहीं ज्यादा वृहद और कॉम्पलेक्स है. दक्षिणी अफ्रीकी देशों में इस विचारधारा का खासा चलन है. और यह 1980-90 के दौर में काफी चर्चित हुई. नेल्सन मंडेला के 1994 में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने के बाद इसे अफ्रीकी देशों के बाहर भी जाना गया. जिम्बाब्वे में पहले से राजनीतिक रूप से स्वीकार्य इस विचार को दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद-नस्लभेद विरोधी आंदोलन में राजनीतिक मान्यता मिली. जिसके बाद बने अंतरिम संविधान (1993) में इसे यूं शामिल किया गया, "एक-दूसरे को समझने की जरूरत है-प्रतिशोध की नहीं, प्रतिपूर्ति की जरूरत है-बदले की नहीं, उबंटू की जरूरत है-जुल्म की नहीं."

उबंटू का पालन करते हुए प्रतिस्पर्धा कहीं खो जाती है

तो हम सबने ही उबंटू का पालन किया है. हालांकि पालन हमने पहले कर लिया और इसके बारे में विस्तार से बाद में जाना. या यूं कह लें कि जिन तरीकों को हम प्रैक्टिस में ला रहे थे उन्हें बाद में हमने उबंटू के तौर पर पहचाना. पहले सिर्फ इसका नाम भर सुना था और इसकी अफ्रीकी जड़ों के बारे में जानते थे. हमने एक-दूसरे की स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार किया. हमने एक-दूसरे के अलग व्यक्तित्व और हुनर को सम्मान दिया. इस दौरान हमारे पक्ष में एक बात यह हुई कि लगभग हम सभी अलग-अलग रोजगार के क्षेत्र में हैं, इसलिए प्रतिस्पर्धा की कोई भावना ही नहीं है. वैसे असलियत तो यह है कि जब आपने सामने वाले की खासियतों को स्वीकार कर लेते हैं तो आप उसकी यूनिकनेस को भी समझते हैं. ऐसे में प्रतिस्पर्धा की कोई बात ही नहीं रह जाती. बल्कि आप चाहते हैं कि आपके बीच में ज्ञान का आदान-प्रदान होता रहे ताकि आप अपने-आप में ही कूप-मंडूक बनकर न रह जाएं बल्कि दूसरे स्वतंत्र तौर पर किसी विषय पर कैसा सोच रहे हैं, उससे भी लाभ ले सकें. हम रोज़ ही किसी न किसी विषय पर लड़ रहे होते हैं लेकिन इस लड़ाई के दौरान हम बहुत कुछ सीख भी रहे होते हैं. और कभी उबंटू के विचार से बाहर जाकर स्वतंत्र होने के बारे में नहीं सोचते.

आज भी बहुत आसानी से चलता है हमारा काम

जिस तरह वैचारिकता के स्तर पर कठफोड़वा सफल रहा है आशा है कि आप भी ऐसे छोटे-बड़े वैचारिक समूहों का निर्माण इस विचार के आधार पर कर सकेंगे. यूं तो कठफोड़वा की वेबसाइट नहीं चल सकी. लेकिन जिन दिनों में यह लगातार काम कर रही थी, इसके पांच एडिटर थे और फिर भी यह बिना किसी गतिरोध के चल रही थी. साथ ही इसे बनाने वाला मस्तिष्क समूह आज भी पूरी क्षमता के साथ काम कर रहा है. यह हमउम्रों के साथ काम करने के लिए आजमाने पर खरा पाया गया फॉर्मूला है. मुझे जानने वाले कई लोगों को आश्चर्य होता है कि चाहे वेबासाइट के लिए सभी से मांगा गया एक निश्चित रकम का सहयोग हो (वेबसाइट जिसके चलते आज भी फंक्शनिंग है) या किसी लेख पर सभी से मांगे गए विचार, हमेशा समय से सहयोग आ जाता है. साथ ही यहां किसी हायआर्की के अभाव में लोगों को अपने विचारों को पूरे एक्सपोजर के साथ पेश करने का मौका भी मिलता है. आशा है हमें भविष्य में इसके और प्रयोग देखने को मिलेंगे.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Thursday, April 16, 2020

Friends के चैंडलर बिंग-मोनिका गेलर का प्यार और आपके रिलेशन में कोई तीसरा?

एक्सट्राऑर्डिनरी की तलाश में रहने वाले ऑर्डिनरी मोनिका गेलर-चैंडलर बिंग का प्यार काफी कुछ सिखाता है
दुनिया की तमाम रोचक प्रेम कहानियों में से एक मुझे लगी चैंडलर बिंग और मोनिका गेलर की. शायद कम ही लोग हों जिन्हें मशहूर अमेरिकन टीवी सीरीज फ्रेंड्स (Friends) के बारे में न पता हो. हो सकता है आपमें से कुछ ने इसे देखा न हो लेकिन दुनिया में सबसे ज्यादा देखी गई अंग्रेजी भाषा की टीवी सीरीज में यह शुमार होती आई है. यह ऐसे छह दोस्तों की कहानी है जो 25-30 साल की उम्र के है. नौकरीपेशा हैं और दो अपार्टमेंट शेयर करते हैं (हालांकि एक दोस्त अलग रहता है, जिसकी शादी और तलाक दोनों ही हो चुके हैं).

बहरहाल इसके दो किरदारों के बीच पहले आकर्षण पनपता है फिर प्यार. इनके नाम हैं चैंडलर बिंग और मोनिका गेलर. चैंडलर एमेच्योर लेकिन अच्छे ह्यूमर वाला और जानकार है. मोनिका बेहद सफाई पसंद और समझदार बनने की कोशिश में उलझ जाने वाली है, कई मायनों में उसे बहुत सी चीजों से ऑब्सेस्ड कहा जा सकता है. सीरीज में कई सीजन बाद दोनों को प्यार हो जाता है. यह प्यार बिल्कुल प्यार जैसा है, कन्फ्यूजिंग और एक्साइटिंग. न कि स्क्रीन पर अक्सर दिखाया जाने वाला पहली नजर का प्यार टाईप.

प्यार के बहुत शुरुआती दौर में चैंडलर और मोनिका दोनों ही किसी तरह के प्यार को स्वीकारने से बचते हैं और इसे मात्र आकर्षण मानकर खत्म करना चाहते हैं. लेकिन कई बार फिजिकल होने के बाद, वे लगभग प्यार में होते हैं, जिसकी पहली स्वीकारोक्ति चैंडलर की ओर से आती है कि उसे सेक्स का ऐसा अनुभव सिर्फ मोनिका के साथ रहा और सिर्फ उसकी वजह से (अपनी एमेच्योरिश गढ़न के चलते वह इस बात को पूरी तरह नहीं कह पाता लेकिन उसका इशारा केयर और प्यार की ओर ही है). वह यह दावा भी करता है कि मोनिका इसकी ताकीद उसकी अन्य पार्ट्नर्स से कर सकती है. फिर धीरे-धीरे दोनों ओर से प्यार का भाव दिखने लगता है.

चैंडलर और मोनिका का एक दृश्य
इन किरदारों को लेकर लिखे एक सीन तक मेरी बात सीमित है. एक सीन में मोनिका की दोस्त रेचल उसे एक मेल नर्स के साथ डेट पर चलने को कहती है क्योंकि वह उसके साथी मेल नर्स के साथ खुद डेट पर जाने वाली है. इसी बीच चैंडलर की किसी बात से खफा मोनिका, उसे जलाने के लिए डेट की बात पर हामी भर देती है. हालांकि इसके बाद जब चैंडलर उससे माफी मांगता है और उसे अपने एमेच्योर होने के चलते बात को गलत तरीके से पेश कर देने का हवाला देता है तो मोनिका झट से उसके प्रति वफादार रहने की हामी भर देती है. दरअसल वह इस माफीनामे का ही इंतजार कर रही होती है.

हमेशा आपके रिश्ते में एक तीसरा बना रहता है, उसे इग्नोर किया तो रिलेशन गया

इस सीन में काफी कुछ ऐसा है, जो किसी रिलेशन में रह रहे लोग सीख सकते हैं. हमेशा एक्सट्राऑर्डिनरी की तलाश में रहने वाले चैंडलर और मोनिका दोनों को ही 'आर्डिनरी एक-दूसरे' में वह भाव-वह प्यार मिलता है. लेकिन इससे भी जरूरी एक सीख है. कि चाहे चैंडलर-मोनिका हों, आप हों या कोई अन्य. हमेशा आपके रिश्ते में एक तीसरा बना रहता है. आपका पार्टनर जो हमेशा आपके साथ है, वो जितना इस तीसरे के बारे में जानता है, उतना अच्छा है. जरूरी नहीं कि यह तीसरा कोई इंसान ही हो. हो सकता है यह तीसरा आपका करियर हो, यह तीसरा आपका कोई पैशन हो या इंसान भी हो सकता है, जिसके प्रति आपका खिंचाव हो.

इसलिए कभी इस तीसरे के बारे में अपने पार्टनर से बात करने से न बचें. जितना ज्यादा आपको अपने पार्टनर के इस तीसरे के बारे में पता होगा, उतने ज्यादा आप अपने रिश्ते में सुरक्षित होंगे और ईमानदार रह सकेंगे. जितना कम आप उसके बारे में जानेंगे, तीसरे के मजबूत होने के चांसेस उतने ज्यादा बढ़ जाएंगे. इसलिए हमेशा उस तीसरे को जानने की कोशिश करें ताकि आपका पार्टनर तीसरे पर आपको चुने, इसलिए नहीं कि इसका उसपर दबाव हो बल्कि इसलिए कि आप उस तीसरे से अच्छे हों.
क्या आपने अपने पार्टनर को बताया है कि आपने उसके साथ रहना ही क्यों चुना?
मसलन उस पल के बारे में सोचिए जब खुद आपका पार्टनर आपको इस बात की सूचना दे कि उसे देखा है, उसके साथ मेरी हल्की-फुल्की बात हुई, जिसके बाद उसने मुझे डिनर पर बुलाया लेकिन मैंने उसके डिनर के ऑफर को टाला क्योंकि आज मैं तुम्हारे साथ खाना खाना चाहता था. ऐसी छोटी-छोटी चीजें ही पार्टनर पर कॉन्फिडेंस बिल्डिंग की एक्सरसाइज के तौर पर काम करती हैं ताकि वह भी ईमानदारी से अपने तीसरे की बातें आपसे शेयर करने से झिझके नहीं. आखिरकार प्यार तब क्या ही प्यार रह जाएगा, जब आपने किसी को जबरदस्ती इमोशनल बंधक बनाकर रखा हो और वैसे भी कोई कितने दिन ऐसा कर सकता है!

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Tuesday, April 14, 2020

किताबें क्यों पढ़ें, कब पढ़ें, कहां पढ़ें और कैसे पढ़ें?

पूरी किताब एक बार में पढ़ने के बजाए, रोज़ थोड़ी-थोड़ी पढ़ें
एक रिसर्च में पाया गया कि रोज 30 मिनट किताब पढ़ने वालों की उम्र में करीब 2 साल की बढ़ोत्तरी हो जाती है. यह भी पाया गया कि ऐसे लोगों की नौकरी में तरक्की की संभावना अपने सहकर्मियों की अपेक्षा ज्यादा होती है. तो सवाल यह उठता है कि आखिर किताबों में ऐसा भी क्या है, जो ये इतनी जादुई साबित हुई जा रही हैं. दरअसल किताबों में एक ही विषय पर लंबे समय तक टिकाए रहने का गुर, तसल्ली और सुकून है, बाकी जानकारी जो है, सो तो है ही.

अक्सर किताबें पढ़ने के लिए लोग सुझाव देते दिखते हैं. अक्सर इसके फायदे गिनाए जाते हैं. लेकिन किताब पढ़ना इतना आसान काम नहीं. अगर आप कोई ठीक-ठाक किताब पढ़ने के लिए उठा रहें हैं तो यह है कि उसे पढ़ने में आपको 10 से 20 घंटे का समय लगेगा. ऐसे में किताब पूरी कर पाना. उसमें अपना इंट्रेस्ट बनाए रख पाना आसान बात नहीं होती. इसलिए आज क्रमवार अपने अनुभव रख रहा हूं कि किताब क्यों पढ़ें, कब पढ़ें, कहां पढ़ें और कैसे पढ़ें?

पहला सवाल- किताब क्यों पढ़ें?

यह इस प्रक्रिया का सबसे अहम सवाल है. अगर आप स्टूडेंट हैं और रोज़ ज्यादा से ज्यादा नई चीजें जानने-समझने के लिए ही आपके पास सारा समय है तो आपसे किताबों के महत्व के बारे में बात करना बेईमानी है. लेकिन फिर भी बात इसलिए की जानी चाहिए क्योंकि आजकल इंटरनेट के चलते स्टूडेंट्स भी किताबों को छोड़कर इंटरनेट भरोसे हो चुके हैं. लेकिन मैं यहां यह साफ कर देना चाहता हूं कि इंटरनेट पर जानकारियां जुटाकर एक बार को किसी विषय या घटना के बारे में जाना जरूर जा सकता है लेकिन उसकी प्रक्रिया को लेकर एकदम निश्चित नहीं हुआ जा सकता. उसके लिए या तो आपको उस पर डॉक्यूमेंट्री देखनी होगी या किताब पढ़नी होगी. हर विषय पर एक्सप्लेंड वीडियो डॉक्यूमेंटेशन मिल पाना अब भी संभव नहीं हो सका है. साथ ही अगर यह मिल भी जाता है तो कई बार इसमें सभी जरूरी तत्व शामिल नहीं किए जा पाते इसलिए अच्छा यही होता है कि सब्सटीट्यूड तलाशने के बजाए किताबों से ही विषय को कवर किया जाए. किताब से किसी विषय को कवर करते हुए आपको उस विषय के साथ भी लंबा समय गुजारने का मौका मिलता है. ऐसे में उस विषय से न सिर्फ आपकी पहचान और जानकारी में बढ़ोत्तरी होती है बल्कि आपका उस विषय के प्रति लगाव और प्रेम भी बढ़ जाता है.

लेकिन अगर आप स्टूडेंट नहीं हैं और आपके पास नौकरी या व्यापार करते हुए अन्य कामों के लिए सिर्फ सीमित समय ही बचता है तो क्या आपको किताबें ही पढ़नी चाहिए. जी बिल्कुल, जैसा कि ऊपर बताया गया कि नौकरी में तरक्की की आपकी संभावना इससे बढ़ सकती है. मैं सिर्फ अनुमान लगा रहा हूं कि ऐसा क्यों होता होगा? दरअसल किताबें पढ़ते हुए हमारी एक ही विषय पर देर तक ध्यान लगा पाने की क्षमता का अनजाने ही विकास हो जाता है. ऐसे में न सिर्फ ऑफिस के काम हम अच्छे से कर पाते हैं बल्कि हमारे पास उन्हें करने के लिए अच्छे सुझाव भी होते हैं. इतना ही नहीं हम जल्दीबाजी में निर्णय लेने से, कोई बात कहने से भी खुद को रोक पाते हैं. सीधे तौर पर कहें तो किताबें आपकी व्यक्तिगत कूटनीतिक क्षमता का विकास करती हैं. लेकिन नौकरी-पेशा लोगों को इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि अक्सर वे किसी न किसी दबाव में रहते हैं और किताबें उस दबाव को कम करने में या परेशानियों के बेहतर उत्तर ढूंढने में बहुत मदद करती हैं. ऐसे में किताबें पढ़ना दबाव में काम करने वाले इन लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में भी मदद करती है.
अगली बार जब सोशल मीडिया स्क्रॉल करने का मन करे तो किताब लेकर बैठ जाएं

अगला सवाल- किताबें कब पढ़ें?

किताबें तब पढ़ें जब आप सोशल मीडिया स्क्रॉल करना चाहते हों. आज के कुछ समय पहले शायद मैं इस जवाब को अलग तरीके से दे रहा होता. लेकिन अनुभव से यह सीखा हूं कि अगर आप सोशल मीडिया स्क्रॉल करना चाहते हैं तो इसका मतलब है कि आप फिलहाल खाली हैं और आपके समय काटना चाहते हैं तो सोशल मीडिया पर तस्वीरें और व्यक्तिगत विचार पढ़ने के बजाए वही 20 मिनट-आधे घंटे का समय किताबों को दीजिए. इस तरह महीने भर में एक अच्छी किताब खत्म कर देंगे और किसी किताब को रोज थोड़ा-थोड़ा पढ़ने से आपके अंदर निरंतरता की आदत स्वत: पैदा हो जाएगी, जो जिंदगी के दूसरे काम करने में भी आपके बहुत काम आएगी. निरंतरता के जरिए आप रोज़ थोड़ा-थोड़ा अभ्यास करके कोई भाषा सीख सकते हैं. कोई कलाकृति बना सकते हैं और अपनी बुरी आदतों में सुधार भी ला सकते हैं. ऐसे में हम कह सकते हैं कि किताब के जितने फायदे दिखते हैं, हैं उससे कहीं ज्यादा.

इसके अलावा अगर आप नियमित और संतुलित जीवन पहले से ही जीने के हामी हैं तो कोशिश करें कि सवेरे किताब पढ़ सकें. नियमित व्यायाम वगैरह कर, अखबार वगैरह देखने के बजाए, थोड़ी देर किताब भी पढ़ लें फिर अपने काम-धाम में जुटें. ऐसा करने से आपके दिमाग के पास सोचने के लिए फर्जी की चिंताओं और डर से इतर कोई किस्सा-कहानी या कोई जानकारी होगी और आप हल्का महसूस करेंगे. रात को भी सोने से पहले थोड़ी देर पढ़ा जा सकता है. पढ़ते हुए भी सोया जा सकता है लेकिन अगर आप ऐसा कर रहे हैं तो सोते हुए कोई फिक्शन-थ्रिलर वगैरह पढ़ने के बजाए कोई गरिष्ठ विषय वाली किताब पढ़ें, जिससे जल्दी नींद आ जाए. एक और बात यह कि जब तरोताजा महसूस कर रहे हों, उस समय किताब पढ़ने से सबसे अधिक फायदा होगा.

अगला सवाल- किताबें कहां पढ़ें?

सीधे किताब पढ़ने का कोई विकल्प नहीं है लेकिन धीरे-धीरे तकनीकी की मदद से किताबें पढ़ने के कई विकल्प सामने आ चुके हैं. इसमें सबसे अच्छा और कई लोगों को भा चुका विकल्प है किंडल. शुरुआती दौर में तो किंडल पर किताबें सस्ते में उपलब्ध थीं लेकिन अब उसके प्रमोशन का दौर खत्म होने के बाद ऐसा नहीं रह गया है. ऐसे में पहले से ही किताब पढ़ने का मंहगा विकल्प किंडल खरीद, उसमें भी मंहगी किताबें खरीदने से आपकी जेब पर वजन पड़ना तय है. ऐसे में यह किया जा सकता है कि किंडल खरीदकर उसमें किताबों को जुगाड़ अपने किसी ऐसे दोस्त से करवाया जाए, जो किंडल के लिए किताबें जुटाने के खेल को समझता हो. अंग्रेजी में किंडल पर किताबें जुटाना कोई मुश्किल काम नहीं हैं. हालांकि हिंदी के लिए किंडल पर सीमित किताबें भी हैं. लेकिन ये लगातार बढ़ रही हैं और किंडल पर किताबें पढ़कर आराम से उसका पैसा वसूल किया जा सकता है.

कई मोबाइल ऐप भी पढ़ने में मदद कर सकती हैं लेकिन मोबाइल की स्क्रीन पढ़ने के लिए मुफीद नहीं होती और पाठक की आंखों पर अनावश्यक जोर पड़ता है इसलिए मोबाइल पर पढ़ने से बचें. हालांकि मोबाइल पर किताबों के ऑडियो टेप जरूर सुने जा सकते हैं. हालांकि किताबें सुनने और पढ़ने का एक्सपीरियंस काफी अलग है लेकिन आखिरकार आपको किताबों से तुरंत क्या ही मिलता है, आनंद और जानकारी. दोनों ही चीजें आपको ऑडियो टेप से भी मिल जाएंगीं. किताबें पढ़ें, जरूरी नहीं कि किताबें खरीदकर ही पढ़ें. किताबें मांगकर भी पढ़ सकते हैं. मांगकर पढ़ने से लौटाने की बात दिमाग में होने से किताबें एक तय समयसीमा के भीतर ही पढ़ ली जाती हैं.

एक बार में एक किताब पढ़ने के बजाए दो या दो से ज्यादा किताबें पढ़ने की कोशिश करें

अगला सवाल- किताबें कैसे पढ़ें?

बहुत से लोग एक ही बैठक में किताब खत्म करने का दंभ भरते हैं. मुझे यह तरीका बिल्कुल पसंद नहीं है, खासकर तब जब किताब में 50-60 पन्नों से अधिक हों. किताब को एक बैठक में पढ़ने से आप उसके कुछ सबसे जरूरी बिंदुओं को नजरअंदाज कर सकते हैं. जिससे किताब पढ़ने का बहुत काम फायदा होता है. इसलिए किसी किताब को खत्म होने तक रोज़ थोड़ा-थोड़ा पढ़ा जाना चाहिए. सिर्फ उतना ही जितना एक बार में समझा जा सके. मैं इसी विधि से पढ़ता हूं. डिजिटली आप किताब पढ़ते हैं तब तो किताब सीधे उसी जगह से खुल जाती है लेकिन अगर आप किताब भी पढ़ रहे हैं तो बुकमार्क वगैरह के चक्कर में मत पढ़िए, रोज़ पढ़िए. रोज पढ़ेंगे तो कभी नहीं भूलेंगे कि कहां पर थे, इससे पहले.

इसके अलावा कोशिश करें कि एक साथ दो या उससे भी ज्यादा किताबें पढ़ें. अलग-अलग भाषाओं की किताबें भी पढ़ सकते हैं. ऐसे में न सिर्फ लेखन की बारीकियों, व्याख्या की बारीकियों को समझेंगे बल्कि बातें रखने का हुनर भी सीख जाएंगे. बाकी कभी इस पर विस्तार से लिखूंगा कि नो नॉनसेंस रीडर कैसे बना जाए? आज के लिए इतना ही.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.) 

Monday, April 13, 2020

ये 5 तरीके अपनाकर नींद के लिए इस्तेमाल होने के बजाए नींद को खुद के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं आप

नींद को लेकर अक्सर डांट लगाई जाती है, हिदायतें दी जाती हैं लेकिन इसे समझने की कोशिशें कम ही होती हैं...
सोने को लेकर अक्सर बहुत बातें होती हैं. बहुत से लोगों का इस पर कोई अधिकार नहीं होता. कई लोग ऐसे होते हैं जो पढ़ने की कोशिश करते हुए अक्सर सो जाते हैं. कई बार लोग परेशान दिखते हैं कि उन्होंने क्या-क्या चीजें अगले दिन करने को सोच रखी थीं लेकिन अपनी नींद के चलते नहीं कर सके. इसलिए सोने पर मेरे अनुभवों की बात बताता हूं.

एक बात तय है कि नींद एक बायलॉजिकल प्रक्रिया है. जाहिर है इसकी बायलॉजी के बारे में मैं कोई सुझाव नहीं दे सकता. लेकिन असमय सोने, टूटी-टूटी नींद सोने और कम से कम सोकर ज्यादा से ज्यादा काम करने के बारे में सुझाव दे सकता हूं. लेकिन इन सुझावों से पहले मैं अपनी नींद की प्रैक्टिस के बारे में कुछ विचार साझा करना चाहूंगा.

नींद कोई बुरी चीज नहीं, ईश्वर की ओर से आपकी 'डेली फ्री सर्विसिंग' का तोहफा

मैं एक ऐसे परिवार का सदस्य रहा हूं जो आजीवन 5 से साढ़े 5 के बीच उठता आया है. ऐसे में बचपन से 16-17 साल की उम्र तक मुझे भी 6 बजे तक उठना ही पड़ता था. जिसके बाद मुझे पढ़ने के लिए बिठा दिया जाता और मैं फिर सो जाता. इस पूरे दौर में हम रात में 10 से 11 बजे सो जाते थे यानि इस दौरान मैं करीब 7 घंटे की नींद ले पाता था. मैं ज्यादातर साउंड स्लीपर था यानि एक बार सोया तो सीधे सवेरे उठा. लेकिन 18 साल की उम्र होने तक चीजें बदलीं और मैंने नींद को नियंत्रित करने के बारे में सोचा. ऐसा पढ़ाई और सीखने को ज्यादा समय देने के लिए किया गया था.

किशोरावस्था में 7-साढ़े 7 घंटे सोना मुझे बुरी बात नहीं लगती लेकिन 18 साल की उम्र के बाद भी अगर आप रोज़ इतना सोते हैं तो आप रोज़ के हिसाब से अपने एक से डेढ़ घंटे का नुकसान कर रहे होते हैं. आप 6 घंटे सोकर भी काम चला सकते हैं. अगर आप की उम्र 18 से 50 के बीच है और आप रोज़ 7-8 घंटे या उससे ज्यादा सो रहे हैं तो एक बात तय है कि या तो आप जानबूझकर इतनी देर बिस्तर में पड़े रहना चाहते हैं या कई बार उठकर फिर सो जा रहे हैं

आगे बढ़ने से पहले एक बात और समझ लें कि नींद कोई बुरी चीज नहीं है. यह आपके फायदे के लिए ही है. यह आपको तरोताजा करती है. आपके दिमाग में रोज़ भरने वाले कचरे की सफाई करती है. आपकी दिमागी और शारीरिक फंक्शनिंग सही करती है बल्कि सीधे तौर पर कहें तो यह ईश्वर की ओर से आपकी शारीरिक मशीन को दी गई 'डेली फ्री सर्विसिंग' है. लेकिन वर्तमान दौर में अगर आप ज्यादा से ज्यादा सोते हैं तो आप अपने को कई हुनर सीखने, कई बातें जानने या कई काम कर पाने से महरूम कर रहे होते हैं. इसलिए नींद का दुश्मन नहीं बल्कि दोस्त होते हुए भी मैं चाहता हूं कि कम से कम नींद में अपना काम चलाया जाए.


तो अगर आप की उम्र 18 से 50 साल के बीच है और आप 7 से 8 घंटे या उससे ज्यादा सो रहे हैं तो आप इस तरह से अपनी नींद को मैनेज कर सकते हैं. जो भी तरीके मैं यहां लिख रहा हूं वो सारे ही मैंने खुद पर आजमाए हैं-

1. जरूरी नहीं कि आपका 6 घंटे सोकर काम चल जाए. कम से कम सोना उतना सोना है, जितने में आपको सवेरे उठने के बाद नींद न आती रहे, उतना है आपके लिए कम से कम सोना. कम से कम कितना सोकर काम चलाया जा सकता है, इसके लिए मैंने 2011 में एक तरीका ईजाद किया था. मसलन आप रोज़ 8 घंटे सोते हैं और सीधे तौर पर कहें तो मसलन 12 बजे सोकर 8 बजे जागते हैं तो आप 8 बजे का अलार्म लगाने के बजाए 07:58 का अलार्म लगाइए और कोशिश करके दो मिनट पहले जाग जाइए. अगले दिन 07:56 का अलार्म लगाइए, उसके अगले दिन 07:54 का.

यकीन मानिए ऐसे रोज़ दो मिनट पहले उठने से न ही आपकी नींद पर कोई असर होगा और न ही आपके शरीर पर. इस तरह से आप चाहें तो अपनी नींद को 1 महीने में 8 से 6 घंटे पर ला सकते हैं. लेकिन अगर आपको 6 घंटे सोने से सवेरे भी नींद आ रही है तो आपको इसी क्रम में बढ़ाकर भी चेक कर लेना चाहिए कि इससे कितने मिनट ज्यादा सोऊँ कि सवेरे नींद न आए. नींद की क्वालिटी पर भी निर्भर करता है कि आप कितनी देर सोएं. ऐसे में पूरी कोशिश करें कि रात में कोई आपको डिस्टर्ब न करे, न उठाए. और अगर आपकी नींद रात में कई बार खुलती हो तो डॉक्टर से जरूर संपर्क करें.

2. ऊपर वाले क्रमिक तरीके से अलग है इंस्टेंट तरीका. आपको सीधे 8 घंटे की नींद से साढ़े 6 घंटे की नींद पर अलार्म लगाकर उठ जाना चाहिए. यह थोड़ी मुश्किल बात होगी. लेकिन अगर आप ऐसा लगातार 3-4 दिन करने में सफल हो जाते हैं तो आपकी आंख रोज उतने ही समय खुलनी शुरू हो जाएगी. इस कदम को उठाने में अधिक इच्छाशक्ति की जरूरत होती है और मैं इसे अपनाने पर बहुत जोर नहीं देता लेकिन मैंने जैसे ऊपर के तरीके को खुद पर आजमाया है, इसे भी आजमाया है और दोनों ही सफल रहे हैं.

3. तीसरा तरीका है दो नींद का तरीका. लेकिन इसे सिर्फ खुद का व्यापार करने वाले और स्टूडेंट्स ही अपना सकते हैं. यह तरीका हमारी सभ्यता में पुराने समय से मौजूद रहा है. इसके मुताबिक नींद को दो भागों में तोड़ दिया जाता है. एशियाई सभ्यताओं में जल्दी जागने का महत्व रहा है. बहुत सवेरे से ही लोग अपने काम-धंधे शुरू कर देते हैं. आप आज भी उत्तर भारत के गांवों में जाएंगे तो देखेंगे कि महिलाएं 12 बजे तक कुछ न कुछ काम में लगी रहती हैं और फिर सवेरे ही 5 बजे उठकर काम शुरू कर देती हैं. शहरों और कस्बों में भी छोटे दुकानदार दोपहर के दो-तीन घंटे दुकानें बंद कर नींद लेते हैं. चीन में तो कई ऑफिस में भी यह नीति लागू है.
आप भी ऐसे ही रात में 4.5 से 5 घंटे की नींद लेकर बाकी 1.5 से 2 घंटे की नींद दिन में ले सकते हैं लेकिन दोनों ही नीदों का समय नियत रखें वरना इसमें खलल पड़ेगा. यह बढ़िया तरीका है, मैंने कई दिन अपनाया और आदत पड़ जाने पर इसका अच्छा असर रहा. लेकिन ध्यान रखें कि नींद के दो से ज्यादा टुकड़े न करें और एक टुकड़ा कम से कम 5 घंटे के आसपास जरूर रहे.

4. नींद एक बायलॉजिकल प्रक्रिया है इसलिए हमारी बायलॉजिकल क्लॉक के साथ सिंक होती है. हम जिस समय उठते हैं, उसी समय हमारी आंखें रोज़ खुलनी शुरू हो जाती हैं जब तक सोने के समय में या नींद के दौरान कोई खास व्यवधान न खड़ा हो. ऐसे में कोशिश करें कि एक नियत समय सोएं भी. रात में मोबाइल न चलाकर अपने दिमाग और आंखों को कम से कम स्ट्रेस दें ताकि कम से कम नींद से आपकी सर्विसिंग हो सके. मेरे लिए सोने जाते हुए कोई हल्का पॉडकास्ट या म्यूजिक सुनना अक्सर फायदेमंद रहा है, आप भी इसे ट्राई कर सकते हैं.

5. सोने से पहले आप घर या किसी खास के नंबरों के लिए अलग कॉलरट्यून लगाकर, अपने फोन को साइलेंट पर भी कर सकते हैं. ताकि घर जरूरी फोन के अलावा कोई और आपको डिस्टर्ब न करे. आप भी किसी को देर रात फोन न करें. सोने से पहले यह जरूर सोच लें कि कल करने के लिए आपके पास क्या-क्या जरूरी काम हैं और दिमाग में उनके लिए एक खाका बना दें कि किस समय, क्या काम करना है, इससे भी आपको जल्दी और एक बार अलार्म बजते ही उठने में मदद मिलेगी. लेकिन कितने भी जरूरी काम हों, उतनी नींद जरूर लें, जितनी आपको जरूरी लगती है.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.) 

Friday, April 10, 2020

इन 5 तरीकों को अपनाकर 1 दिन में निपटाया जा सकता है पूरे हफ्ते का काम!

इन पांच तरीकों को अपनाएंगे तो एक दिन में ही निपटा सकते हैं हफ्ते भर के काम (फोटो क्रेडिट- NYT)
मैं रोज़ अमूमन एक किताब के बीस पेज पढ़ता हूं. एक समय में मैं तीन किताबें औसतन पढ़ रहा होता हूं. यानि अख़बार से इतर 60 पन्ने मैं रोज पढ़ता हूं. लेकिन हमेशा ऐसा चलता रहे मुझे पसंद नहीं. जैसे लोगों को नहीं पसंद होता कि वे रोज़ घर पर एकसार खाना खाएं. वे रेस्टोरेंट जाना चाहते हैं. कुछ तला-भुना घर पर ही खाना चाहते हैं. वैसे ही 'फॉर अ चेंज' मैं अपने इस प्रॉसेस को एक्सिलरेट कर देता हूं.

हर किताब 20 पेज रोज़ पढ़कर उसका आनंद नहीं लिया जा सकता और न ही इस तरह उसकी तासीर का लुत्फ लिया जा सकता है. फिक्शन के मामले में यह बात ज्यादा लागू होती है. इसलिए कई बार एक दिन निकालकर पूरी किताब खत्म कर देता हूं. मसलन कल की बात करूं तो करीब आधी 'ब्रेव न्यू वर्ल्ड- ऐल्डस हक्सले' मैंने कल ही खत्म कर दी. इसके अलावा 'मेडागास्कर' नाम की एक एनिमेशन फिल्म भी देखी. दो चैप्टर 'प्राइड एंड प्रिज्यूडिस- जेन ऑस्टिन' के पढ़े. डुओलिंगो पर करीब 100 प्रैक्टिस प्वाइंट्स जुटाए. एक घंटे का पॉडकास्ट बीबीसी ग्लोबल का और एक घंटे का पॉडकास्ट डीडब्ल्यू इनसाइड यूरोप का सुना. एक्सरसाइज की. अगले 18 दिनों का शिड्यूल तय किया. 1 घंटे लिखा. इंटरनेट बैंकिंग से जुड़े महीने भर के काम निपटाए. अपने सारे कपड़े धो दिए-बर्तन भी धोए. नाखून काटे-शेव किया, जो 21 दिनों से ड्यू था.

ऐल्डस हक्सले की किताब ब्रेव न्यू वर्ल्ड के कुछ कवर..

रात के 12 बजने तक मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे मैंने 1 दिन नहीं एक हफ्ता गुजार लिया हो. हालांकि तथ्यात्मकता से कहूं तो इतना काम मैं 3-4 दिनों में करता हूं, एक हफ्ता थोड़ा ज्यादा कह रहा. बहरहाल बात करते हैं, उन चीजों की, जिनके चलते आप ऐसा कर पाते हैं-

1. विज़नरी रहिए-पैशनेट रहिए. यानी सोचकर रखिए कि कौन सी किताब, कौन सी टीवी सीरीज एक साथ खत्म की जानी चाहिए तभी पूरा आनंद आएगा. उसे बचाकर रखिए. और जब मौका मिले तो उसे पूरी तवज्जो दीजिए. उतनी देर मोबाइल आदि का त्याग करके.

2. हालांकि मैंने एक दिन में किए जा सकने वाले कामों के मुकाबले ज्यादा काम किए लेकिन दिन का केवल कुछ हिस्सा ही प्लान्ड था. यकीनन अगर आप पूरे हफ्ते में जरूरी कामों को जुटाकर रखेंगे और वीकेंड पर सारे एक साथ खत्म कर देंगे तो आपको मुझे होने वाली खुशी और संतुष्टि से दोगुनी खुशी-संतुष्टि होगी.

3. रिलैक्सेशन प्लान भी काम का रखिए. मसलन मैं किताब पढ़-पढ़ कर थक गया था. करीब 150 से ज्यादा पन्ने अंग्रेजी में पढ़ने के बाद आंखें और दिमाग दोनों में ही थकान थी. तो इस थकान को मिटाने के लिए मैंने फिल्म देखी- मेडागास्कर. एक हल्की-फुल्की कार्टून फिल्म. लेकिन अच्छा लगा क्योंकि फिल्म क्रिटिकली एक्लेम्ड थी.

4. ऐसे किसी दिन पर मानसिक श्रम वाले काम पहले कीजिए. मैंने कल सबसे पहले लिखा, किताबें पढ़ी, लैंग्वेज प्रैक्टिस की, फिल्म देखी, पॉडकास्ट सुना फिर शारीरिक श्रम वाले काम- कपड़े-बर्तन धोए. शारीरिक श्रम वाले काम के दौरान आप अपना पसंदीदा म्यूजिक इंज्वाय कर सकते हैं, जिससे मानसिक तौर पर थके होने का अहसास न हो.

5. ऐसे किसी दिन के लिए डाइट बहुत जरूरी होती है. यानि इस दिन डाइट ऐसी होनी चाहिए कि आपको खाकर तुरंत नींद न आए. मेरा जोर यह भी रहता है कि आप इस दिन जरूरत से थोड़ा कम खाएं. ताकि भूख लगी रहे जो आपको अपने लक्ष्य की याद दिलाती रहे. लेकिन कम खाते हुए यह जरूर याद रखें कि पोषण की कोई कमी न महसूस हो. ऐसा हुआ तो भी आप काम पूरा नहीं कर पाएंगे.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.) 

Thursday, April 9, 2020

लगातार 21 दिन एक्सरसाइज़ करने और नाखून न चबाने से मिले ये सबक

एक्सरसाइज़ की आदत डालने के लिए अपने हिसाब से इसका चयन बहुत जरूरी है...
21 दिन पूरे हो गए. जो संकल्प लिया था. वह पूरा कर दिखाया. रोज़ एक्सरसाइज की. और नाखून नहीं खाया. अगर इसे मैं सही से रोज दर्ज कर पाता तो शायद आप ज्यादा बेहतर समझते कि कैसे किसी बुरी आदत का निषेध कर अच्छी आदत डाली जाती है और कैसे किसी अच्छी आदत को नए सिरे से डेवलप किया जाता है. चूंकि रोज़ की बात दर्ज नहीं है इसलिए मैं एक ही बार में आपको पूरी प्रक्रिया बताने की कोशिश करता हूं.


एक्सरसाइज की अच्छी आदत कैसे डाली?

पहले बात करते हैं रोज एक्सरसाइज़ की. निस्संदेह मैंने बहुत टाइमटेकिंग प्रक्रिया वाली और बहुत ज्यादा शारीरिक थकान देने वाली एक्सरसाइज उठाई होतीं तो लगातार इतने दिन तक कर पाना नामुमकिन होता. इसलिए मैंने 20-25 मिनट में हो जाने वाली हाथों-पैरों की एक्सरसाइज़ की. इसे आप यूट्यूब पर '1 माइल हैप्पी वॉक' (One Mile Happy Walk) के नाम से सर्च कर पा जाएंगे. यह बहुत मजेदार है और किसी भी समय आसानी से की जा सकती है. इसलिए कई दिन तो मैंने इसे नाश्ते या खाने के बाद भी किया. इतना समय मैं वर्क फ्रॉम होम (Work From Home) के बीच भी निकाल लेता था. इसलिए यह मेरे लिए बहुत कठिन नहीं रही. हालांकि आज से मैं एक्सरसाइज का समय कुछ बढ़ा रहा हूं. साथ ही थोड़े कठिन मूव्स भी आज से ऐड कर रहा हूं.

एक्सरसाइज़ की 21 दिन की स्ट्रीक बनाने या कह लें आदत डालने में मेरे काम ये तीन चीजें आईं-

पहली, खुद को कन्विंस करने वाली आदत का चुनाव (माने कोई ऐसी आदत चुनें जिससे किसी भी तरह का पर्सनल फायदा होने का विश्वास हो), दूसरी, आदत को अपनी दिनचर्या में घुसा पाने की सहजता (माने आप अपने टास्क को कभी भी कर सकें) और तीसरी, इंस्टेंट दिखने वाली प्रगति (माने ऐसा टास्क चुनें, जिसका फायदा आपको जल्द से जल्द दिखे. मसलन मुझे 9 से साढ़े 9 घंटे रोज वर्क फ्रॉम होम करना होता है. इस एक्सरसाइज़ के रुटीन से मेरा पीठदर्द बहुत कम हो गया है, यही इंस्टेंट फायदा है).
20 दिन लगातार नाखून न चबाने के बाद मेरे नाखून

नाखून चबाने की बुरी आदत कैसे छोड़ी?

अब बात करते हैं नाखून खाने की आदत छोड़ने की. यह आदत छोड़ने के लिए शुरुआत से ही मेरे पास जबरदस्त वजहें थीं. लेकिन मेरे पास सिर्फ वजहें थीं, कभी इतना समय नहीं रहा कि बैठकर-विचारकर इसे रणनीतिक तरह से छोड़ा जा सके. बहुत ही साधारण सी रणनीति अभी भी मैंने इसके लिए फॉलो की. मैंने सिर्फ अपने नाखूनों को बढ़ने के लिए छोड़ दिया. 21 दिन तक उन्हें बढ़ने दिया. शुरुआत में इन्हें दांतों से काटने से बचने के लिए प्रयास करना पड़ा. कई बार मुंह में जाते-जाते रोका. एक-आध बार दांत से नाखून दबा भी दिया पर याद आ गया काटना नहीं है. लेकिन जब नखून थोड़े बड़े हो गए तब हमेशा याद रहने लगा और पिछले एक सप्ताह में तो मेरे लिए नाखून चबाना बिल्कुल अजीब बात हो चुकी थी. फिर भी आगे भी इससे कुछ दिन तक बचने का फैसला मैंने किया है ताकि इसे पूरी तरह पुख्ता किया जा सके.

बहरहाल 21 दिन नाखून न चबाने में काम आई ये चीजें-

इच्छाशक्ति (कभी भी किसी बुरी आदत को छोड़ने के लिए यही आपका पहला कदम होगा, इससे अच्छा हो सकता है कि आप बुरी आदत छोड़ने को अच्छी आदत डालने की तरह ही लें और खुद को ये तर्क दें कि इससे आपको क्या पर्सनल फायदा होगा. अगर आपने खुद को इसके फायदों के लिए कन्विंस कर लिया तो इसके खिलाफ इच्छाशक्ति डेवलप करने में बहुत मदद मिलेगी), दूसरी रणनीति, जैसे मैंने नाखून 21 दिन तक बढ़ने दिए ताकि बढ़े नाखून देख याद रहे कि इन्हें नहीं चबाना है. मैं इन्हें पेंट भी कर सकता था लाल रंग से और तीसरी चीज इंस्टेंट प्रगति, यह दूसरे प्वाइंट से ही जुड़ा है. आखिर मैंने अपने इतने बड़े नाखून पिछले 15-16 साल में शायद ही देखे थे. ऐसे में यह सीधी तरक्की जैसा था, जिससे इच्छाशक्ति भी बढ़ी और मेरी रणनीति और आत्मविश्वास को भी मजबूती मिली. 

इन दोनों ही चीजों का मुझे उत्साह जरूर है. तभी कल से कई लोगों को यह बात बता चुका हूं. लेकिन आपसे लगातार साझा नहीं कर पाया. ऐसे में तय किया है कि अगली निरंतरता की आदत के तौर पर लिखने को ही रखा जाएगा. जिससे उस प्रक्रिया को दर्ज किया जा सके जो किसी काम में निरंतरता के लिए निर्णायक होती है. फिलहाल चैलेंज यह है कि कैसे लेखन की प्रक्रिया को जीवन-शैली में ढालने जितना सहज बनाया जाए. दिन के 24 घंटों में वो समय क्या हो, जब लिखने के सिवाए कुछ सूझे ही न.


अगले 21 दिनों का लक्ष्य है- लिखना

ऐसे में तमाम बिंदुओं का आकलन कर कहा यही जा सकता है कि वह ऐसे ही सवेरे का समय हो क्योंकि पिछली बार लेखन को इसीलिए रात में करने से बचा गया था क्योंकि पाया गया कि रात में दिमाग अपनी पूरी क्षमता से साथ नहीं दे रहा. बाकी यह पूरी तरह से पारदर्शी प्रक्रिया होने जा रही है. क्योंकि यह मामला अगर जमा तो अगले 21 दिन यानी 30 अप्रैल तक मेरे 21 ब्लॉग आपके सामने होंगे. अब जो भी होगा आपकी नज़रों के सामने होगा.

वैसे पिछले कुछ दिनों में किताबों को पढ़े जाने में बेहतरीन निरंतरता आई है लेकिन मेरे लिए यह कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है क्योंकि मैं पिछले लंबे समय से निरंतर किताबें पढ़ता आ रहा हूं. इसलिए उनके प्रति किसी चैलेंज और स्ट्रीक का कोई मसला नहीं है.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Monday, March 23, 2020

कोरोना के चलते लॉकडाउन में जी रहे हैं तो कर डालिए ये जरूरी काम

आप भी पिछले दिनों में घर में बैठे-बैठे बोर हो गए होंगे और सोच रहे होंगे क्या करें?
निश्चित है कि भारत के ज्यादातर हिस्सों की तरह आप भी इस समय कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के दौर में जी रहे होंगे और सोच रहे होंगे कि ऐसे दौर में क्या किया जा सकता है?

तो यहां पर जरूरी कामों की एक लिस्ट है, जिन्हें आप घर में ऊब से बचने के लिए कर सकते हैं-

  1. घर का कोना-कोना साफ कर डालिए. किचन की छोटी से छोटी चीज को साफ कर डालिए. पूरी तसल्ली से सफाई कीजिए, घर का कोई कोना बचना नहीं चाहिए.
  2. जो सामान कचरा हो गया हो, उसे छांट दीजिए. सभी तरह के पुराने सामान और कपड़ों को एक जगह इकट्ठा कर लीजिए और जब स्थिति सामान्य हो जाए तबके लिए उसे जरूरतमंदों में बांटने के लिए रख दें.
  3. रोज सवेरे 10 मिनट सूरज की धूप लें. दरअसल लगातार घर में रहने से आपमें विटामिन डी की कमी हो सकती है इसलिए रोज दस मिनट धूप में खड़े हों. सवेरे 9 से पहले ऐसा करेंगे तो ज्यादा अच्छा रहेगा.
  4. रोज 15 मिनट के लिए मेडिटेशन यानी ध्यान करें. इसके साथ ही आप अपनी इम्युनिटी बनाए रखने के लिए एक्सरसाइज भी करें तो और अच्छा रहेगा.
  5. चूंकि हम ज्यादातर घर पर ही रह रहे हैं. ऐसे में या तो हमारे पास ज्यादा काम नहीं है या बहुत कम काम है. ऐसे में ज्यादा खाने से परहेज करें. आप एक दिन के लिए व्रत भी रख सकते हैं ताकि आपके शरीर से पूरी तरह बुरे तत्व खत्म हो जाएं.
  6. दिन में केवल तीन बार समाचार देखें. नकारात्मक विचार और ज्यादा नकारात्मक परिस्थितियां बनाते हैं. सकारात्मक बने रहें, आप पूरी तरह से जिंदादिल हैं.
  7. शतरंज, कैरम, लूडो, ताश और व्यापार जैसे खेल अपने मम्मी, पापा, साथियों या बच्चों के साथ खेलें.
  8. घर के सारे जरूरी कागजों को सही से फाइल में रख दें. इसमें से अपने प्रॉपर्टी के पेपर्स, सर्टिफिकेट, बैंक के कागज, दूसरे जरूरी कागजात और बिजली आदि की बिल को अलग-अलग फाइल में सहेज कर रख दें.
  9. अपने फोन/ लैपटॉप/ मेलबॉक्स आदि की भी सफाई कर दें. अपने सभी डिजिटल डेटा का बैकअप बना दें यानी जो तस्वीरें, वीडियो, मेल आप हमेशा के लिए सेव करना चाहते हों उन्हें गूगल ड्राइव आदि पर सेव कर लें.
  10. अपने परिवार से मिलें, जो हमेशा आपसे यह शिकायत करते रहते हैं कि आप उन्हें समय नहीं देते. घर से बैठे-बैठे काम करते हुए यह जरूर करें. उनसे उनके दोस्तों की कहानियां सुनें, अपनी सुनाएं.


सबसे ज्यादा जरूरी काम-


  1. चेक करें कि आपने अपने कहां-कहां सेविंग कर रखी है. उनके सभी कागजात जुटा लें. चेक करें कि आपने अपने इंवेस्टमेंट, इंश्योरेंस पॉलिसी, बैंक अकाउंट, प्रॉपर्टी, लॉकर आदि में किसे नॉमिनी बनाया हुआ है.
  2. अगर आपने अपने और अपने पति/ पत्नी के लिए वसीयतनामा नहीं बनाया है तो उसका एक ड्राफ्ट तैयार कर लें. अगर आप पहले ही बना चुके हैं तो उसे फिर से पढ़ लें.
  3. अगर आप हर साल के खर्चे आदि की बैलेंस शीट बनाते हैं तो यह आपको वसीयतनामा बनाने में मदद करेगी. नहीं तो अपनी पूरी संपत्ति और देनदारियों की लिस्ट बना लें.

इससे भी ज्यादा जरूरी- 


जो सीखा है, उसमें कुछ और जोड़ें, कुछ नया सीखें.


प्लीज इसे उन सभी लोगों तक पहुंचाएं जो खाली बैठना पसंद नहीं करते इसलिए यह माहौल उन्हें पसंद नहीं आ रहा है.

Sunday, March 22, 2020

गिटार भी सीखना हो और स्विमिंग भी तो पहले क्या सीखें? कौन सा हुनर सीखना सही रहेगा, यूं करें तय

कई बार हम यह नहीं तय कर पाते कि कौन सा हुनर सीखना है और समय निकल जाता है...
जैसा कि पिछले ब्लॉग में मैंने लिखा था कि आज इस पर बात होगी कि कैसे तय करें कि कौन सा हुनर सीखना है. तो किसी आदत को डालते हुए या किसी नई चीज को सीखते हुए बड़ी परेशानी तब भी सामने आती है, जब यह समझ नहीं आता कि किस चीज की आदत सबसे पहले डालें और किसकी बाद में? जैसे समझ नहीं आता गिटार सीखें, गाना सीखें, स्विमिंग सीखें या कोई लैंग्वेज. मन सबकुछ सीखने का करता है लेकिन समझ नहीं आता कि पहले क्या किया जाए और ऐसे ही सोचते-सोचते समय निकल जाता है और इन सारी चीजों में से कुछ भी नहीं सीख पाते. फिर जब खुद के बारे में सोचते हैं तो परेशान होते हैं और खुद पर बेहद औसत होने का आरोप लगाते हुए चिंता करते हैं.

लेकिन इसमें चिंता की बात नहीं है. थोड़े धैर्य के साथ आपको परिस्थितियों के बारे में बैठकर सोचना होगा और तय हो जाएगा कि आपको नई गतिविधि के तौर पर क्या करना चाहिए या नई स्किल के तौर पर क्या सीखना चाहिए. इसकी प्रक्रिया बहुत आसान है. सबसे पहले बैठकर याद कीजिए कि क्या करने के लिए आपकी तारीफ होती रही है. क्या स्कूल के दिनों तक आपकी तारीफ किसी गाने को लेकर हुई, डांस को लेकर हुई, पेंटिंग को लेकर हुई या पढ़ाई को लेकर हुई?


समय लेकर सोचिए वो एक हुनर क्या था जिसे लेकर आपको कई लोगों से मिला कॉम्पिमेंट

आपको दोस्तों ने, आपके टीचर्स ने किन बातों को लेकर आपको कॉम्प्लिमेंट किया. हो सकता है कि आज मेरे ऐसा कहते समय आपको लग रहा हो कि अब तक आपको ये बातें कहां ही याद रही होंगीं. लेकिन मेरी बात मानिए, आपको सब याद है. इंसान कभी कुछ नहीं भूलता. खासकर ऐसी चीजें. याद करने की कोशिश कीजिए, कब-कब, किस-किस बात पर लोगों ने आपकी तारीफ की. मान लीजिए आपको समझ आता है कि आपकी तारीफ अच्छी अंग्रेजी होने के चलते की गई तो अब म्यूजिक सीखने और फ्रेंच सीखने में सोचने के बजाए तुरंत फ्रेंच क्लासेज ज्वाइन करने का मन बना लीजिए.

अब सोचिए कि सीखी हुई इंग्लिश की स्किल्स का इस्तेमाल आप कैसे कर रहे हैं. क्या इसने आपके करियर को कोई सहारा या मजबूती दी? क्या इसने आपके जीवनस्तर और जानकारी में कोई इजाफा किया. अगर आपको लगता है कि ऐसा हुआ है तो फ्रेंच क्लासेज खोजनी शुरू कर दीजिए. अब सोचिए कि क्या आज भी आप नए अंग्रेजी शब्द सीखने और ग्रामर के सही इस्तेमाल को लेकर नई चीजें सीखते रहते हैं, अगर हां तो फीस भर दीजिए और जल्द से जल्द फ्रेंच की क्लासेज शुरू कर दीजिए.

दो हुनर के बीच कौन सा पहले सीखें, ये तय करने के लिए आपको थोड़ी देर बैठकर सोचने की जरूरत होगी...

इमारत के सबसे ऊपर भारी से भारी कंगूरे तभी बन सकेंगे, जब नींव पहले से मजबूत हो

ये मत सोचिएगा कि आप म्यूजिक सीख नहीं पाएंगे इसलिए मैंने आपको फ्रेंच सीखने को कहा. सीख तो आप कुछ भी लेंगे लेकिन उस सीखे हुए की क्या क्वालिटी होगी और वह आपकी जिंदगी में कितना काम आएगा यह आपके दिमाग पर निर्भर करता है. जब आपने अंग्रेजी के प्रति अपना मन बनाया और तेजी से उसे सीखना शुरू कर दिया, तभी साफ हो गया कि देवनागरी से अलग लिपि वाली भाषा को सीखने के लिए भी आपका दिमाग आसानी से तैयार है. ऐसे में बहुत मेहनत के साथ म्यूजिक सीखने से अच्छा है कि कम मेहनत और ज्यादा मज़े के साथ फ्रेंच सीखी जाए.

यानी अगर आप स्कूल की उम्र पार कर चुके हैं तो कंगूरे उसी इमारत के शानदार बनाने की कोशिश करें, जिस इमारत की नींव भी गहरी डाली गई हो. वरना किसी भी मुश्किल परिस्थिति यानी भूकंप आदि में वह इमारत ढह जाएगी.

ऐसे ही अगर आपकी तारीफ डांस को लेकर, पढ़ाई को लेकर और गाने को लेकर होती रही हो तो कोशिश करें कि उसी से जुड़े हुए हुनर सीखने की कोशिश करें.


इस तरह से करेंगे तय करने पर दिमाग न सिर्फ सीखने को तैयार रहेगा बल्कि इंज्वाए भी करेगा

अब आप यह पूछ सकते हैं कि तब क्या जब तारीफ तो लोगों ने बच्चा समझ कर की हो और आज हम उसे सीरियस लेते हुए डांस क्लास में एडमिशन ले लें. ऐसी स्थिति में मैं यही कहूंगा कि आप भूल जाइए एक बार तय करने के बाद कि आपकी तारीफ डांस को लेकर हुआ करती थी. दरअसल आपके दिमाग ने आपको यही याद दिलाया है कि आपकी तारीफ डांस को लेकर हुआ करती थी और लोग आपको देखना पसंद करते थे.

दिमाग ने जानबूझकर याद दिलाया है क्योंकि वह आपको एक डांसर के तौर पर पसंद करता है और उसी के तौर पर जानना चाहता है. इसलिए डांस सीखना शुरू कर दीजिए.

इसी तरह जो आपका दिमाग आपको बताए, जरूरी नहीं कि वह सच ही हो लेकिन यह जरूर होगा कि आपका दिमाग उस हुनर को पसंद करता होगा. और उसे न सिर्फ तेजी से सीखेगा बल्कि उसे सीखने के लिए धैर्य बनाने में भी आपकी बहुत मदद करेगा. तो बस यही है सिंपल सी ट्रिक की कैसे समझें कि आदत के तौर पर किस चीज को विकसित करना है और बुरी आदत के तौर पर किस चीज को छोड़ना है.


मेरे रेज्योल्यूशन अभी जिंदा, लग रहा है छोड़ दूंगा नाखून चबाना

अब आ जाते हैं मेरी नई आदतों पर. जिनके लिए मैंने रेजोल्यूशन ले रखा है. तो मैं बता हूं कि आज भी मैंने कल की तरह ही 15 मिनट की वॉकिंग एक्सरसाइज की. साथ ही मैंने नाखून भी नहीं चबाए. हां ऐसा जरूर हुआ कि मैंने एक बार मुंह में हाथ डाल लिया और दांतों से त्वचा का कुछ भाग काटा लेकिन याद आते ही मैंने उंगलियां मुंह से बाहर निकाल लीं. मुझे लगता है कि मेरा व्रत नहीं टूटा.

आप मुझे पढ़ें और बताएं कि किसी आदत को डालने और किसी हुनर को सीखने में मेरी ओर से क्या मदद हो सकती है. और हो सके तो मुझे भी इनके लिए सुझाव भेजें. बाकी कोरोना वायरस के प्रसार के दौर में आप सभी सुरक्षित रहें और जितने दिन घर में हैं एक अच्छी आदत डालने की कोशिश जरूर करें. जारी...

(नोट: आप मेरे लगातार नाखून न चबाने और एक्सरसाइज करने के दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर (सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ) दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Saturday, March 21, 2020

किसी अच्छी आदत को डालने और बुरी आदत को छोड़ने के लिए 21 दिन की प्रैक्टिस क्यों है जरूरी?

किसी आदत को डालने में 21 दिन लगने की बात करने के पीछे कई सारी वजहें हैं (फोटो साभार- विशाल भूटानी)
कल मैंने जोर देकर कहा था कि किसी आदत को डालने में 21 दिन का समय लगता है. वैसे अगर आप मुझसे पूछेंगे- किसने कहा तो मैं जवाब नहीं दे पाऊंगा. मैंने कभी इसके लिए पढ़ाई नहीं की. यह पढ़ाई करने वाली बात भी नहीं है, मेरे अनुभव की बात है. बचपन में कभी सुना कि 21 दिन लगते हैं और देखा कि जो चीजें लगातार 21 दिन कर लीं, वे आदत में आ गईं. बल्कि न सिर्फ 21 दिन में अच्छी आदतें बनीं बल्कि बुरी आदतें छूटीं.

जैसे मैं कानपुर से होने के नाते डिक्शनरी को डिक्शन...री बोला करता था. पूरा कानपुर बोलता है. लेकिन अपनी आदत को कुछ बार टोके जाने के बाद मैंने लगातार पढ़ने के दौरान डिक्शनरी बोलते हुए सुधार लिया. हालांकि मैंने 21 दिन गिने नहीं लेकिन रोज पढ़ाई करने के चलते यह ज्यादा आसान रहा. मैंने इसे 21 बार से ज्यादा ही सोचकर डिक्श...नरी कहा और अंतत: यह हो डिक्शनरी हो गई.

बोलने को छोड़ भी दें तो मेरी एक और आदत पढ़ते-पढ़ते सो जाने की थी. अब किताब चाहे कितनी बोरिंग क्यों न हो जाए, आप मुझे किताब लेकर सोता नहीं पाएँगे. कभी अपवाद हो सकता है, जब मैं बहुत थका होऊं लेकिन ज्यादातर ऐसा नहीं होगा. मोबाइल लेकर भी नहीं. हमेशा उसे सही जगह पर रखकर ही सो रहा होऊंगा.


तीन हफ्ते देखने में बेहद कम लेकिन आपकी जिंदगी में ला सकते हैं बड़े बदलाव

बहरहाल फिर से 21 दिन में आदत डालने और आदत छोड़ने की बात पर वापस आ जाते हैं. तो फिलहाल इसी 21 दिन के फॉर्मूले का यूज कर मैं अपनी नाखून चबाने और एक्सरसाइज करने की आदत क्रमश: छुड़ाने और बनाने पर काम कर रहा हूं. वैसे इनकी तरक्की कैसी है, यह बाद में बताऊंगा. पहले यह बताता हूं कि अच्छी आदत का 21 दिन लगातार प्रयास और बुरी आदत का 21 दिन लगातार निषेध क्यों?

ऐसे तो तीन हफ्ते बहुत ज्यादा नहीं लगते लेकिन यह आपकी जिंदगी में बड़े बदलाव के लिए काफी होते हैं.


21 दिन में या तो किसी प्रयास को आदत बना लेंगे या एक गलत आदत से बच जाएंगे

कई बार आप खुद को जिस चीज की आदत डालने के लिए तैयार कर रहे होते हैं. वह चीज आपके अंदाज, आपके व्यक्तित्व के मुताबिक नहीं होती है. जैसे अगर मैं कोशिश करूं कि आदत डालूंगा, प्राइमटाइम पर किसी भी न्यूज एंकर की डिबेट 21 दिन लगातार देखने की तो यह मेरे लिए बहुत मुश्किल होगा क्योंकि मैं भी इसी धंधे में लगा हूं और जानता हूं कि यह खेल कैसे चल रहा है. ऐसे में कुछ दिन जज करता रहूंगा और फिर इस काम को व्यर्थ मानकर छोड़ दूंगा. दरअसल यह काम मेरे लिए नहीं था और उसकी आदत डालकर मैं अपने उद्देश्यों को व्यर्थ कर रहा होता.

ऊपर जो मैंने लिखा उसमें कुछ भी गलत नहीं है. यानि किसी आदत को डालने के लिए बहुत जरूरी है आपके पास एक जरूरी मकसद हो. और यह मकसद मात्र आपके दिमाग का फितूर न हो बल्कि अपने आसपास के लोगों से इस मकसद को लेकर जिक्र किया हो और उन्होंने भी इस मकसद को लेकर आपका उत्साहवर्धन किया हो. उत्साहवर्धन न सही लेकिन इसके आप पर सकारात्मक प्रभाव की आशा जताई हो.


सिर्फ मकसद काफी नहीं आदत के लिए गजब के धैर्य की भी जरूरत

लेकिन इस 21 दिन के कार्यक्रम में सिर्फ मकसद ही सबकुछ नहीं. आप 2-4 दिन में ही या तो बोर हो जाएंगे, या तो यह सोचने लगेंगे कि यह नई चीज क्यों ही कर रहा हूं और बहुत कम मामलों में इसे लेकर बहुत आशावान हो जाएंगें लेकिन किसी भी परिस्थिति में इसे छोड़िएगा मत. दरअसल इस 21 दिन के कार्यक्रम में जो चीज सबसे ज्यादा जरूरी है, वह है धैर्य. आपने अपने लिए जो चुन लिया है, उसे बिना उसके फायदे नुकसान सोचे 21 दिन करते रहें. हालांकि ऐसा नहीं कि गंभीर परिस्थितियों में या नुकसान के दौर में भी ऐसा करें लेकिन जब तक चीजें सामान्य हों अपनी नई प्रैक्टिस को 21 दिन लगातार धैर्य के साथ करें.

पढ़ते हुए सो जाने की समस्या कई सारे लोगों को होती है...    (फोटो क्रेडिट- विक्टोरिया, etsy.com)

21 दिनों बाद आप परिस्थितियों के प्रति तटस्थ होकर कर सकते हैं निर्णय

दरअसल 21 दिन ही इतना वृहत अनुभव आपको दे सकेगा कि आप सही-गलत आदत, उसके फायदे-नुकसान आदि का सही अनुमान लगा सकें. इस वृहत अनुभव से ही आप बिल्कुल तटस्थ हो सकेंगे और विचार कर सकेंगे कि 21 दिन आपने जो किया, उससे क्या पाया और क्या खोया? साथ ही आप समझ जाएंगे कि इसे जारी रखेंगे तो आगे के भविष्य पर कैसा असर होगा.

मसलन आप कोई भाषा सीख रहे हों तो आप 21 दिन में करीब 100 शब्द सीख जाएंगे. ऐसे में आप उसके मामूली वाक्यों को बोलने और समझने लगेंगे. अब निकट भविष्य में उस भाषा में अवसर और उसके फायदे आदि तय करेंगे कि आप उस भाषा को सीखना चाहते हैं या नहीं. ये और कुछ अन्य फैक्टर मिलकर 21 दिन में आपके दिमाग में यह बात साफ कर देंगे कि आपको यह काम कर लेना है या छोड़ देना है.


21 दिन में का आदत डालने का कार्यक्रम पूरा किया तो हमेशा आदत डालने में होगी आसानी

साथ ही 21 दिन का कार्यक्रम हमेशा अपने साथ अच्छी प्लानिंग और निरंतरता का तोहफा आपको देकर जाएगा. यानी की आप जरूरी चीजों के लिए न सिर्फ काम करना सीख जाएंगे बल्कि आप यह भी जान जाएंगे कि लगातार उनके लिए समय कैसे निकाला जाए. इससे आगे की आदतें डालने में भी मदद मिलेगी.

अब बात मेरी आदतों की करें तो मुंह के पास हाथ जाते ही जैसे दिमाग डांट देता है. अब मेरे नाखून बड़े हो रहे हैं. मैं इनके ठीक-ठाक बड़े हो जाने के बाद इनकी तस्वीर पोस्ट करूंगा. इसके अलावा मैंने आज भी एक्सरसाइज की और स्ट्रीक को टूटने नहीं दिया. आज मैंने 'वन माइल वॉक' नाम की एक्सरसाइज की. आप यूट्यूब पर इस नाम से ढूंढेंगे तो आसानी से आपको मिल जाएगी.

दूसरे दिन भी आसानी से आदतें बनाने की तरफ बढ़ता रहा

मैंने एक्सरसाइज आज नहाने से पहले ही की. हालांकि दोपहर के 2 बज रहे थे. मुझे आज दिन में हरारत और जुकाम महसूस हुआ. क्योंकि मैं जर्मन एंबेसी के चक्कर 5 दिन पहले मार रहा था तो थोड़ा डरा भी रहा लेकिन सभी चीजें सही से पूरी कीं और देखिए भले ही दो घंटे लेट रहा होऊं, पर ब्लॉग भी लिख ही दिया है.

कल हम बात इस बारे में करेंगे कि कैसे तय करें कि हमें क्या आदत डालनी चाहिए और उसके लिए कैसे प्रयास करें?
(नोट: आप मेरे लगातार नाखून न चबाने और एक्सरसाइज करने के दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर (सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ) दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.) 

Friday, March 20, 2020

सिर्फ Motivation से नहीं पड़ेगी अच्छी आदत, इन 3 बातों का रखना होगा ध्यान

कोई आदत डालने के लिए आपको 3 बातें ध्यान रखनी होंगीं- पहली- मोटिवेशन (प्रेरणा), दूसरी- वायाबिलिटी (व्यवहार्यता) और तीसरी- पेशेंश (धैर्य)
कल हमने बात इस पर खत्म की थी कि अच्छी आदतें डालने के लिए सिर्फ जोश की जरूरत नहीं होती है. हालांकि अगर मैं कहूं कि आदत डालने के लिए प्लानिंग की जरूरत होती है तो आपको लगेगा, मोटिवेशनल स्पीकर जैसी बात कर रहा हूं. तो मैं साफ कर देना चाहता हूं कि मैं यहां किसी काउंसलर या मोटिवेशनल स्पीकर जैसी बातें नहीं करना चाहता. मेरे पास सिर्फ एक स्ट्रैटजी है, जो मैंने अपने अनुभवों से पाई है, सिर्फ उसे आपके साथ शेयर करना चाहता हूं.

ऐसे में अगर आप मानते हैं कि कई बार आपने भी जोश में आकर कोई कदम उठाया है और मुश्किल से चार दिन भी पूरा न करके जल्द ही उसे छोड़ दिया है लेकिन चाहते हैं, आगे से ऐसा न हो तो-

इसके लिए आपको ये तीन बातें ध्यान रखनी होंगीं- पहली- मोटिवेशन (प्रेरणा), दूसरी- वायाबिलिटी (व्यवहार्यता) और तीसरी- पेशेंश (धैर्य).

मोटिवेशन या जोश का कोई काम पूरा करने में 10% से ज्यादा रोल नहीं होता

वैसे इनमें से आपके-मेरे पास कुछ भी नहीं होता है. आप चाहे जो भी हों, ये चीजें लेकर पैदा नहीं होते, इसी दुनिया में देखते-सुनते दिमाग में ये चीजें पैदा होती हैं (हालांकि कुछ रोल जेनेटिक्स का भी होता है). तो ये तीनों ही बातें स्टेट ऑफ माइंड जैसी हैं. ये तीनों ही आपको दिखेंगीं नहीं लेकिन इनकी प्रैक्टिस से आप अपने जीवन में जो बदलाव लाएंगे वह आपको दिखेगा. चाहे वह किसी म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट पर बजाई गई कोई धुन हो, या आपके पेट में एब्स. सीधी बात अब अपने ऊपर लिखे तीनों औजारों पर आते हैं-

तो मोटिवेशन यानी प्रेरणा वही है जिसकी बात तमाम मोटिवेशनल स्पीकर करते हैं. "अपने जीवन को बदलने के लिए उठ बैठिए, जुट जाइए. आप ही खुद को बदल सकते हैं," जैसी चीजें. ये बातें आपके दिमाग में भी उठती रहती हैं, इसलिए आप मोटिवेशनल स्पीकर जैसे लोगों की बातों से रिलेट कर पाते हैं. लेकिन यकीन मानिए कि यह प्रेरणा और मोटिवेशन पानी में तैरते ग्लेशियर के ऊपरी हिस्से की तरह होते हैं. जो पानी से ऊपर सिर्फ जरा सा दिखते हैं और उनका 90% भाग नीचे पानी में तैरता रहता है. वैसे ही आपके जोश-ओ-जुनून का पानी के ऊपर तैरते आइसबर्ग जितना ही मतलब है. बाकी दो बातें ही वह 90% भाग बनाती हैं, जो तय करता है कि आप किसी काम को पूरा कर पाएंगे/ किसी हुनर को सीख पाएंगे या नहीं.

जोश में कोई फैसला करने से पहले उसकी व्यवहार्यता के बारे में जरूर सोचें

ऐसे में बिल्कुल जोश में जाइए और बेस्ट पॉसिबल प्लान लेकर जिम में पैसे देकर आइए, या बेहतरीन किताबों की लिस्ट चेक करके उसमें से अपनी पसंद के विषय की किताब खरीदिए, या किसी ऑनलाइन कोर्स में एडमिशन लीजिए, या कोई भाषा सीखनी शुरू कीजिए लेकिन उससे पहले अगले कदम पर विचार जरूर कर लीजिए.

भले ही इस अगले कदम के बारे में पहला कदम उठाने से पहले सोचने को मैंने कहा लेकिन इस दूसरे कदम को पहले कदम के बाद ही काम में लाना होता है. इसके बारे में सोच लेना ही दूरदर्शी होने की पहचान होता है. दूसरा कदम का नाम मैंने बताया है- वायाबिलिटी यानी व्यवहार्यता. जो आप कर रहे हैं, वह व्यवहार्य है या नहीं. जैसा मैंने कहा कि ये सारी ही चीजें पहले से कुछ भी नहीं होतीं, ये सिर्फ स्टेट ऑफ माइंड हैं. ऐसे में अगर कोई प्लान वायबल नहीं है तो आपको उसे आपको वायबल बनाना होगा.

क्रिएटिव तरीके से अपने रिजोल्यूशन को पूरा करने के लिए बनाएं रास्ते

अपनी पसंदीदा हरकत को अपनी नई बनाई जा रही आदत से जोड़ें

जैसे आपने सोच लिया कि आप किताब पढ़ेंगे या जिम करेंगे लेकिन 4 दिन से ज्यादा लगातार नहीं कर सके. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि आपने अपने प्लान को वायबल नहीं बनाया. दरअसल आपको जिम करने को पकड़ना ही नहीं था. आपको पकड़ना था अपने शौक को. जाहिर है अगर आपका बॉडी बिल्डिंग और डाइट का शौक होता तो आपको जिम जाने के तरीके मुझे बताने ही नहीं पड़ते. तो आप देख लो आपको क्या शौक है?

क्या आपको कोई किताब पढ़ने का शौक है, कोई खास म्यूजिक सुनने का शौक है, कोई न्यूज बुलेटिन सुनने-देखने की आदत है (जैसे बहुत से लोग रवीश को रोज जरूर देखते हैं. वहीं बहुत से लोग अर्णब को जरूर देखते हैं) तो इसके आधार पर अपनी नई आदतों को वायबल बनाने की कोशिश करें. ये सोच लें कि इन कामों को मुझे घर पर पड़े हुए करने के बजाए जिम में करना है. बल्कि जिम को भी ऐसे समय रखें, जब आपके ऑफिस जाने या वहां से लौटने का समय हो उसके एक घंटे पहले या ऑफिस के तुरंत बाद. साथ ही घर से ऑफिस के रास्ते में जिम खोज सकें तो और अच्छा. अपने कान में पॉडकास्ट या म्यूज़िक लगाकर जिम में कुछ-कुछ करते रहें. यकीन मानिए धीरे-धीरे आपकी जानकारी वहां की चीजों को लेकर जैसे-जैसे बढ़ेगी, न सिर्फ आप अवेयर होंगे बल्कि आपको इंट्रेस्ट भी आने लगेगा.

अपने हिसाब से आदतों में व्यवहार्यता लाने की करें कोशिश

अब एक्स्ट्रीम तरीका बताता हूं. ऊपर दी चीजें करने पर भी अगर आपको लगता है कि अब भी आपसे जिम नहीं हो पा रहा है. तो सिर्फ ज्यादा पानी पीना शुरू कर दीजिए. जितनी देर घर पर रहें. उतनी देर ज्यादा से ज्यादा पानी पिएं. इससे आपको ज्यादा से ज्यादा पेशाब आएगी. पेशाब करने के बाद आप जब हाथ धोने जाएं तो उसके साथ ही सिर्फ दो पुशअप दीवार के सहारे कर लें. इस तरह से अगर आप ज्यादा पानी पीने से 7-8 बार भी पेशाब जाते हैं तो आप 14 से 16 पुशअप दिन में कर रहे होंगे. ऐसा नहीं कह रहा कि मैं आपको यही करना है लेकिन यह मेरा आजमाया एक तरीका है, जिसे आधार बनाकर आप भी ऐसा ही कुछ प्लान कर सकते हैं. मेरा सिर्फ इतना ही कहना है कि अपनी पसंदीदा चीजों को या कह लें कि जिन चीजों को आप आदत की तरह करते हैं, उनसे आप किसी मुश्किल आदत को जोड़ दें. इससे मुश्किलें आसान हो जाएंगीं.

21 दिन तक किसी नई आदत को दोहराते रहने में काम आएगा धैर्य

अब आती है बात अंतिम लेकिन सबसे जरूरी हथियार- पेशेंस यानी धैर्य की. यह पेशेंस ही आपकी आदत को 21 दिनों का इन्क्यूबेशन पीरियड पार कराएगा. (मैं पहले ब्लॉग में अपने 21 दिन के पीरियड के विश्वास के बारे में बता चुका हूं, उसे यहां पढ़ें) आपको लगे कि मैं क्यों ही कर रहा हूं. इससे मुझे परेशानी हो रही है फिर भी उस काम को तीन हफ्ते तक कीजिए. इन 21 दिनों में या तो आपको उस काम के फायदे दिखने लगेंगे या उसकी व्यर्थता समझ आ जाएगी. ऐसे में अगर आपको कोई काम व्यर्थ लगे तो उसे छोड़ दीजिएगा लेकिन 21 दिन बाद ही. या हो सकता है कि आपको यह लगने लगेगा कि काम तो सही है लेकिन मैं इसे गलत तरीके से कर रहा था, इसे इस तरह से करना चाहिए. जैसे 21 दिन किसी भाषा की ग्रामर सीखने के बाद आपको यह भी लग सकता है कि मुझे तो सीधे इसके गाने सीखकर, उसके अर्थ याद करने से तेजी से भाषा आ रही है. अगर आपके ऐसा लगे तो आप अपना तरीका बदल सकते हैं लेकिन हर तरीके को 21 दिन जरूर कीजिएगा.

इस 10 मिनट के वीडियो के जरिए कर रहा शुरुआती एक्सरसाइज

यहीं आपको अपने अंतिम हथियार पेशेंस का सहारा लेना पड़ेगा. आगे की चर्चा के दौरान कभी हम पेशेंस पर बहुत विस्तार से बात भी करेंगे. तब तक आप ऊपर बताए हथियारों को और धारदार बनाने पर काम करें. तब तक मैं कल से अब तक आपको पर्सनल लेवल पर अपनी जिंदगी में आए बदलावों के बारे में बता देता हूं.-

कल जैसा कि मैंने रेजोल्यूशन लिया था कि नाखून नहीं खाऊंगा और एक्सरसाइज यानि व्यायाम करूंगा तो बता दूं कि दोनों ही काम मैंने पहले दिन सफलतापूर्वक किए हैं. कई बार ऊंगलियां मुंह तक पहुंची लेकिन मैंने खुद को रोक लिया. आशा है जल्द ही उंगलियां मुंह तक जाना भी बंद हो जाएंगी. और अपनी वायाबिलिटी को देखते हुए कोरोना के प्रसार के दौर में मैंने  घर पर ही 10 मिनट की एक्सरसाइज नहाने के बाद ली. हालांकि कल से मेरा इसे नहाने से पहले करने का प्लान है. ये थी वह 10 मिनट की एक्सरसाइज-

10 MINUTE MORNING WORKOUT (NO EQUIPMENT)

अगर आप पढ़ रहें तो मुझसे सवाल पूछने और नई बातें सुझाने से न चूकें

किसी आदत को डालने का प्लान कर रहे हों तो मुझे बताएं, मेरी कोशिश रहेगी कि आपकी कुछ मदद कर सकूं. पढ़ाई करने वाले बच्चों या अपने ऐसे दोस्तों जो बहुत भटकते हों, इस ब्लॉग के बारे में बताएं. मैं रोज़ आदतें डालने के तरीके लिख रहा हूं और मेरी कोशिश है कि कोरोना से हमारी लड़ाई के दौरान ये तरीके न सिर्फ हमें इस लड़ाई से सफलतापूर्वक उबारेंगे बल्कि इस दौर को पार करते-करते हम कुछ अच्छी आदतें सीख चुके होंगे और अपनी जिंदगी में बेहतर महसूस कर रहे होंगे. कल मैं आपको विस्तार से बताऊंगा कि मैं किसी आदत को डालने के लिए किसी काम को 21 दिन लगातार करने पर इतना जोर क्यों देता हूं. कल मैं आपको यह भी बताऊंगा कि मेरे रिजोल्यूशन का क्या हुआ. फिलहाल जारी...

(नोट: आप मेरे लगातार नाखून न चबाने और एक्सरसाइज करने के दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर (सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ) दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)


अच्छी आदतों को लेकर पिछले ब्लॉग आप यहां पढ़, पढ़ा सकते हैं-


अच्छी आदत कैसे डाली जाए?