Wednesday, April 15, 2020

मनी हाइस्ट का पहला सीन याद है आपको? डायरेक्टर ने पूरी सीरीज इसी में डिफाइन कर रखी है

मनी हीस्ट के पहले ही सीन में पूरी सीरीज डिफाइन कर दी जाती है
मनी हीस्ट पर उसका सबसे कमजोर सीजन देखने के बाद लिखना थोड़ा असहज कर रहा है लेकिन अच्छी बात यह है कि मैं चौथे सीजन का रिव्यू नहीं लिख रहा. सिर्फ उसमें दिखाए गए प्रतीकों पर बात कर रहा हूं. कुछ ऐसे प्रतीक जिनके बारे में समझना अपेक्षाकृत आसान है, जैसे लाल रंग का जंपसूट और सीरीज में कई जगह दिखाया गया लाल रंग. लेकिन इसके अलावा कुछ और प्रतीक हैं, जिनके बारे में मैं यहां बात कर रहा हूं-


बिग डायरेक्टोरियल सक्सेस: पहले सीन में ही डिफाइन कर दी गई थी पूरी सीरीज

मनी हीस्ट की शुरुआत याद करें, लाल रंग का बैकड्रॉप है. टोक्यो एक बुरे सपने से जागती है, बंदूक लिए हुए. यह सपना उसके भूतकाल के बारे में है. मैं पूरी सीरीज देखने के बाद अभिभूत हो गया कि सीरीज का निर्माण करने वालों की अपनी थीम पर इतनी अच्छी पकड़ थी कि उन्होंने ओपनिंग सीन में ही मनी हीस्ट की पूरी व्याख्या रख दी. इस पहले सीन को समझ लें तो मनी हीस्ट की प्रतीकात्मता काफी कुछ समझ आ जाएगी.


ओपनिंग सीन में टोक्यो ही क्यों?

आपने नाभिकीय विखंडन की प्रक्रिया के बारे में जरूर सुना होगा. जिसके आधार पर परमाणु बम काम करता है. परमाणु बम की तरह ही अनियंत्रित तरीके से काम करने वाला मनी हीस्ट का एकमात्र किरदार है टोक्यो. टोक्यो कब, किस चीज को लेकर अनियंत्रित हो जाए नहीं पता. मनी हीस्ट के कुछ किरदारों की तरह उसे भावुक या संवेदनशील नहीं कह सकते, उसे सिर्फ अनियंत्रित कह सकते हैं. और ध्यान दें तो मनी हीस्ट के प्लॉट में जो सबसे जरूरी तत्व है वह है परिस्थितियों को अनियंत्रित कर देना ताकि प्रोफेसर उनका अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर सके. ऐसी प्रक्रिया को मैं केऑस का दर्शन (Philosophy of Chaos) कहना पसंद करता हूं. आगे बढ़ूं, उससे पहले इस प्रक्रिया पर हिंदी के लेखक अनिल यादव के विचार पढ़ने चाहिए क्योंकि उन्होंने इसे बहुत अच्छे से सामने रखा है-

"जीवन में अनिश्चितता एक ग़ज़ब की चीज़ है, वह अक्सर वहां पहुंचाती है, जहां आप प्रयास और योजना के भरोसे नहीं जा सकते. आपको अपने भीतर की उस शक्ति का पता चलता है जो सुरक्षित माहौल में ऊबकर सोई रहती है."
इसी का फायदा प्रोफेसर उठाने की कोशिश करता है. यानि वह नाभिकीय विखंडन की प्रक्रिया को नियंत्रित कर परमाणु बम के बजाए परमाणु रिएक्टर में तब्दील करना चाहता है. भले ही सीरीज में प्रोफेसर की ओर से सबकुछ प्लान्ड लगता हो लेकिन वह प्लानिंग केऑस यानि गड़बड़ी फैलाने की ही है.

टोक्यो मनी हीस्ट के किरदारों के लिए सोचा गया पहला नाम था

टोक्यो के किरदार से ही शुरु हुआ सब, यह उसके प्रति समर्पण भी

इसके अलावा ओपनिंग सीन में टोक्यो के होने के पीछे एक वजह यह भी है कि मनी हीस्ट के किरदारों में सबसे पहले उसी का नामकरण हुआ था. सबसे पहले उसी के बारे में सोचा गया था. शो डेवलपर्स में से एक पहले दिन ही एक ऐसी टीशर्ट पहनकर आया था, जिस पर टोक्यो लिखा था. वहीं से यह नाम आया. जिसके बाद बाकी किरदार आए. टोक्यो से सीरीज की शुरुआत एक तरह से डायरेक्टर का इस क्रोनोलॉजी के प्रति समर्पण भी है.

लेकिन पहले सीन में तीन बातें और हैं, जिनका जिक्र मैंने किया है, लाल रंग का बैकड्रॉप, भूतकाल के बुरे सपने से जागना और बंदूक. आप जानते ही हैं कि पहले सीन का लाल रंग आगे चलकर लाल रंग के कपड़ों में बदल जाता है. लाल रंग का ऐसे ही सीरीज में बार-बार प्रयोग होता है. लाल रंग, दुनिया में तीन भावों का प्रतीक होता है- प्यार, मौत (खून-खराबा) और प्रतिरोध. ये तीनों ही तत्व सीरीज में अच्छे से गुंथे देखे जा सकते हैं.


लाल जंपसूट, सल्वाडोर डाली का मास्क और लाल रंग का हर जगह प्रयोग

दुनिया की कई क्रांतियों में लाल रंग की प्रतीकात्मकता का प्रयोग हो चुका है. 18वीं शताब्दी में हुई फ्रांस की क्रांति हो या 1950 के दशक में हुई क्यूबा की क्रांति- लाल रंग को नई स्वतंत्रता और आजादी के प्रतीक के तौर पर पेश किया गया. आखिर 'बेला चाओ' का बार-बार सीरीज में दोहराया जाना भी तो ऐसा ही स्टेटमेंट है.

लाल रंग के सीरीज में प्रयोग का एक अच्छा उदाहरण यह भी है कि मनी हीस्ट के प्रमुख किरदार ही लाल जंपसूट नहीं पहनते. बैंक पर कब्जे के बाद ये लाल रंग के जंपसूट वे बंधकों को भी पहनने को देते हैं. हालांकि इसे ऐसे पेश किया जाता है कि इससे बैंक के बाहर सुरक्षा में तैनात पुलिस और सेना के लोग भ्रमित होंगे और किसी बंधक को मार देने के डर से गोलियां नहीं चलाएंगे. लेकिन सबका एक तरह के कपड़े पहनना समानता का प्रतीक भी है. जो कि न सिर्फ बंधकों और चोरी के प्रमुख किरदारों के बीच संबंध स्थापित करता है बल्कि हाल ही में उनकी बदली निष्ठा को भी दिखाता है.

थोड़ा विषयांतर जरूर लग सकता है लेकिन लगे हाथ डाडा कला आंदोलन के मशहूर कलाकार सल्वाडोर डाली के मास्क की बात भी कर लेते हैं. यह इस स्पेनिश कलाकार के विचारों को एक समर्पण है, जिनके विचार बार-बार सीरीज में प्रतिबिंबित होते रहते हैं. ज्यूरिख के इस डाडा आंदोलन में आधुनिक पूंजीवादी समाज को नकारने की बात की गई थी. खुद प्रोफेसर के शब्दों में इन किरदारों के कपड़ों का मतलब प्रतिरोध, आक्रोश, और संदेह है.

बंदूकें आतंक का प्रतीक, खुद प्रोफेसर भी इस आतंक से नहीं बचा

इसके अलावा अगला प्रतीक है बंदूक. जो कि आतंक और हिंसा का प्रतीक है. जाहिर है मनी हीस्ट में यह प्रतीक जमकर भुनाया जाता है. सभी बंदूके लिए घूमते दिखते हैं. प्रमुख किरदारों के अलावा बंधकों के पास भी नकली बंदूकें दिखती हैं. एकबारगी तो सबसे स्मार्ट किरदार प्रोफेसर खुद भी बंदूकों के इस आतंक के झांसे में आ जाता है. जब वह बंदूक की गोलियों से अपनी प्रेमिका लिस्बन को मरा मान बैठता है.


भूतकाल हर तरह से रहा है मनी हाइस्ट की नींव

आखिरी है भूतकाल के बुरे सपने से जागना. भूतकाल इस सीरीज में कभी पीछा नहीं छोड़ता. चाहे वह किरदारों का भूत में जाकर बार-बार प्लान को दोहराना हो. बार-बार दिखाए जाने वाले फ्लैशबैक हों या भूतकाल में मार दिए गए लोगों की याद में ही रचा गया पूरा महान चोरियों का खेल हो. यहां तक कि जब प्रोफेसर के पास रकेल के सामने कहने को कुछ नहीं रह जाता तो वह भूतकाल के एक वाकये यूरोपीय देशों के 'लिक्विडिटी इंजेक्शन' की घटना का हवाला देकर खुद को बचाता है. फिर चाहे नैरोबी के बच्चे की कहानी हो या पलेर्मो-बर्लिन के प्यार की भूतकाल पूरी तरह से सीरीज पर हावी है.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.) 

Tuesday, April 14, 2020

किताबें क्यों पढ़ें, कब पढ़ें, कहां पढ़ें और कैसे पढ़ें?

पूरी किताब एक बार में पढ़ने के बजाए, रोज़ थोड़ी-थोड़ी पढ़ें
एक रिसर्च में पाया गया कि रोज 30 मिनट किताब पढ़ने वालों की उम्र में करीब 2 साल की बढ़ोत्तरी हो जाती है. यह भी पाया गया कि ऐसे लोगों की नौकरी में तरक्की की संभावना अपने सहकर्मियों की अपेक्षा ज्यादा होती है. तो सवाल यह उठता है कि आखिर किताबों में ऐसा भी क्या है, जो ये इतनी जादुई साबित हुई जा रही हैं. दरअसल किताबों में एक ही विषय पर लंबे समय तक टिकाए रहने का गुर, तसल्ली और सुकून है, बाकी जानकारी जो है, सो तो है ही.

अक्सर किताबें पढ़ने के लिए लोग सुझाव देते दिखते हैं. अक्सर इसके फायदे गिनाए जाते हैं. लेकिन किताब पढ़ना इतना आसान काम नहीं. अगर आप कोई ठीक-ठाक किताब पढ़ने के लिए उठा रहें हैं तो यह है कि उसे पढ़ने में आपको 10 से 20 घंटे का समय लगेगा. ऐसे में किताब पूरी कर पाना. उसमें अपना इंट्रेस्ट बनाए रख पाना आसान बात नहीं होती. इसलिए आज क्रमवार अपने अनुभव रख रहा हूं कि किताब क्यों पढ़ें, कब पढ़ें, कहां पढ़ें और कैसे पढ़ें?

पहला सवाल- किताब क्यों पढ़ें?

यह इस प्रक्रिया का सबसे अहम सवाल है. अगर आप स्टूडेंट हैं और रोज़ ज्यादा से ज्यादा नई चीजें जानने-समझने के लिए ही आपके पास सारा समय है तो आपसे किताबों के महत्व के बारे में बात करना बेईमानी है. लेकिन फिर भी बात इसलिए की जानी चाहिए क्योंकि आजकल इंटरनेट के चलते स्टूडेंट्स भी किताबों को छोड़कर इंटरनेट भरोसे हो चुके हैं. लेकिन मैं यहां यह साफ कर देना चाहता हूं कि इंटरनेट पर जानकारियां जुटाकर एक बार को किसी विषय या घटना के बारे में जाना जरूर जा सकता है लेकिन उसकी प्रक्रिया को लेकर एकदम निश्चित नहीं हुआ जा सकता. उसके लिए या तो आपको उस पर डॉक्यूमेंट्री देखनी होगी या किताब पढ़नी होगी. हर विषय पर एक्सप्लेंड वीडियो डॉक्यूमेंटेशन मिल पाना अब भी संभव नहीं हो सका है. साथ ही अगर यह मिल भी जाता है तो कई बार इसमें सभी जरूरी तत्व शामिल नहीं किए जा पाते इसलिए अच्छा यही होता है कि सब्सटीट्यूड तलाशने के बजाए किताबों से ही विषय को कवर किया जाए. किताब से किसी विषय को कवर करते हुए आपको उस विषय के साथ भी लंबा समय गुजारने का मौका मिलता है. ऐसे में उस विषय से न सिर्फ आपकी पहचान और जानकारी में बढ़ोत्तरी होती है बल्कि आपका उस विषय के प्रति लगाव और प्रेम भी बढ़ जाता है.

लेकिन अगर आप स्टूडेंट नहीं हैं और आपके पास नौकरी या व्यापार करते हुए अन्य कामों के लिए सिर्फ सीमित समय ही बचता है तो क्या आपको किताबें ही पढ़नी चाहिए. जी बिल्कुल, जैसा कि ऊपर बताया गया कि नौकरी में तरक्की की आपकी संभावना इससे बढ़ सकती है. मैं सिर्फ अनुमान लगा रहा हूं कि ऐसा क्यों होता होगा? दरअसल किताबें पढ़ते हुए हमारी एक ही विषय पर देर तक ध्यान लगा पाने की क्षमता का अनजाने ही विकास हो जाता है. ऐसे में न सिर्फ ऑफिस के काम हम अच्छे से कर पाते हैं बल्कि हमारे पास उन्हें करने के लिए अच्छे सुझाव भी होते हैं. इतना ही नहीं हम जल्दीबाजी में निर्णय लेने से, कोई बात कहने से भी खुद को रोक पाते हैं. सीधे तौर पर कहें तो किताबें आपकी व्यक्तिगत कूटनीतिक क्षमता का विकास करती हैं. लेकिन नौकरी-पेशा लोगों को इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि अक्सर वे किसी न किसी दबाव में रहते हैं और किताबें उस दबाव को कम करने में या परेशानियों के बेहतर उत्तर ढूंढने में बहुत मदद करती हैं. ऐसे में किताबें पढ़ना दबाव में काम करने वाले इन लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में भी मदद करती है.
अगली बार जब सोशल मीडिया स्क्रॉल करने का मन करे तो किताब लेकर बैठ जाएं

अगला सवाल- किताबें कब पढ़ें?

किताबें तब पढ़ें जब आप सोशल मीडिया स्क्रॉल करना चाहते हों. आज के कुछ समय पहले शायद मैं इस जवाब को अलग तरीके से दे रहा होता. लेकिन अनुभव से यह सीखा हूं कि अगर आप सोशल मीडिया स्क्रॉल करना चाहते हैं तो इसका मतलब है कि आप फिलहाल खाली हैं और आपके समय काटना चाहते हैं तो सोशल मीडिया पर तस्वीरें और व्यक्तिगत विचार पढ़ने के बजाए वही 20 मिनट-आधे घंटे का समय किताबों को दीजिए. इस तरह महीने भर में एक अच्छी किताब खत्म कर देंगे और किसी किताब को रोज थोड़ा-थोड़ा पढ़ने से आपके अंदर निरंतरता की आदत स्वत: पैदा हो जाएगी, जो जिंदगी के दूसरे काम करने में भी आपके बहुत काम आएगी. निरंतरता के जरिए आप रोज़ थोड़ा-थोड़ा अभ्यास करके कोई भाषा सीख सकते हैं. कोई कलाकृति बना सकते हैं और अपनी बुरी आदतों में सुधार भी ला सकते हैं. ऐसे में हम कह सकते हैं कि किताब के जितने फायदे दिखते हैं, हैं उससे कहीं ज्यादा.

इसके अलावा अगर आप नियमित और संतुलित जीवन पहले से ही जीने के हामी हैं तो कोशिश करें कि सवेरे किताब पढ़ सकें. नियमित व्यायाम वगैरह कर, अखबार वगैरह देखने के बजाए, थोड़ी देर किताब भी पढ़ लें फिर अपने काम-धाम में जुटें. ऐसा करने से आपके दिमाग के पास सोचने के लिए फर्जी की चिंताओं और डर से इतर कोई किस्सा-कहानी या कोई जानकारी होगी और आप हल्का महसूस करेंगे. रात को भी सोने से पहले थोड़ी देर पढ़ा जा सकता है. पढ़ते हुए भी सोया जा सकता है लेकिन अगर आप ऐसा कर रहे हैं तो सोते हुए कोई फिक्शन-थ्रिलर वगैरह पढ़ने के बजाए कोई गरिष्ठ विषय वाली किताब पढ़ें, जिससे जल्दी नींद आ जाए. एक और बात यह कि जब तरोताजा महसूस कर रहे हों, उस समय किताब पढ़ने से सबसे अधिक फायदा होगा.

अगला सवाल- किताबें कहां पढ़ें?

सीधे किताब पढ़ने का कोई विकल्प नहीं है लेकिन धीरे-धीरे तकनीकी की मदद से किताबें पढ़ने के कई विकल्प सामने आ चुके हैं. इसमें सबसे अच्छा और कई लोगों को भा चुका विकल्प है किंडल. शुरुआती दौर में तो किंडल पर किताबें सस्ते में उपलब्ध थीं लेकिन अब उसके प्रमोशन का दौर खत्म होने के बाद ऐसा नहीं रह गया है. ऐसे में पहले से ही किताब पढ़ने का मंहगा विकल्प किंडल खरीद, उसमें भी मंहगी किताबें खरीदने से आपकी जेब पर वजन पड़ना तय है. ऐसे में यह किया जा सकता है कि किंडल खरीदकर उसमें किताबों को जुगाड़ अपने किसी ऐसे दोस्त से करवाया जाए, जो किंडल के लिए किताबें जुटाने के खेल को समझता हो. अंग्रेजी में किंडल पर किताबें जुटाना कोई मुश्किल काम नहीं हैं. हालांकि हिंदी के लिए किंडल पर सीमित किताबें भी हैं. लेकिन ये लगातार बढ़ रही हैं और किंडल पर किताबें पढ़कर आराम से उसका पैसा वसूल किया जा सकता है.

कई मोबाइल ऐप भी पढ़ने में मदद कर सकती हैं लेकिन मोबाइल की स्क्रीन पढ़ने के लिए मुफीद नहीं होती और पाठक की आंखों पर अनावश्यक जोर पड़ता है इसलिए मोबाइल पर पढ़ने से बचें. हालांकि मोबाइल पर किताबों के ऑडियो टेप जरूर सुने जा सकते हैं. हालांकि किताबें सुनने और पढ़ने का एक्सपीरियंस काफी अलग है लेकिन आखिरकार आपको किताबों से तुरंत क्या ही मिलता है, आनंद और जानकारी. दोनों ही चीजें आपको ऑडियो टेप से भी मिल जाएंगीं. किताबें पढ़ें, जरूरी नहीं कि किताबें खरीदकर ही पढ़ें. किताबें मांगकर भी पढ़ सकते हैं. मांगकर पढ़ने से लौटाने की बात दिमाग में होने से किताबें एक तय समयसीमा के भीतर ही पढ़ ली जाती हैं.

एक बार में एक किताब पढ़ने के बजाए दो या दो से ज्यादा किताबें पढ़ने की कोशिश करें

अगला सवाल- किताबें कैसे पढ़ें?

बहुत से लोग एक ही बैठक में किताब खत्म करने का दंभ भरते हैं. मुझे यह तरीका बिल्कुल पसंद नहीं है, खासकर तब जब किताब में 50-60 पन्नों से अधिक हों. किताब को एक बैठक में पढ़ने से आप उसके कुछ सबसे जरूरी बिंदुओं को नजरअंदाज कर सकते हैं. जिससे किताब पढ़ने का बहुत काम फायदा होता है. इसलिए किसी किताब को खत्म होने तक रोज़ थोड़ा-थोड़ा पढ़ा जाना चाहिए. सिर्फ उतना ही जितना एक बार में समझा जा सके. मैं इसी विधि से पढ़ता हूं. डिजिटली आप किताब पढ़ते हैं तब तो किताब सीधे उसी जगह से खुल जाती है लेकिन अगर आप किताब भी पढ़ रहे हैं तो बुकमार्क वगैरह के चक्कर में मत पढ़िए, रोज़ पढ़िए. रोज पढ़ेंगे तो कभी नहीं भूलेंगे कि कहां पर थे, इससे पहले.

इसके अलावा कोशिश करें कि एक साथ दो या उससे भी ज्यादा किताबें पढ़ें. अलग-अलग भाषाओं की किताबें भी पढ़ सकते हैं. ऐसे में न सिर्फ लेखन की बारीकियों, व्याख्या की बारीकियों को समझेंगे बल्कि बातें रखने का हुनर भी सीख जाएंगे. बाकी कभी इस पर विस्तार से लिखूंगा कि नो नॉनसेंस रीडर कैसे बना जाए? आज के लिए इतना ही.

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Monday, April 13, 2020

ये 5 तरीके अपनाकर नींद के लिए इस्तेमाल होने के बजाए नींद को खुद के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं आप

नींद को लेकर अक्सर डांट लगाई जाती है, हिदायतें दी जाती हैं लेकिन इसे समझने की कोशिशें कम ही होती हैं...
सोने को लेकर अक्सर बहुत बातें होती हैं. बहुत से लोगों का इस पर कोई अधिकार नहीं होता. कई लोग ऐसे होते हैं जो पढ़ने की कोशिश करते हुए अक्सर सो जाते हैं. कई बार लोग परेशान दिखते हैं कि उन्होंने क्या-क्या चीजें अगले दिन करने को सोच रखी थीं लेकिन अपनी नींद के चलते नहीं कर सके. इसलिए सोने पर मेरे अनुभवों की बात बताता हूं.

एक बात तय है कि नींद एक बायलॉजिकल प्रक्रिया है. जाहिर है इसकी बायलॉजी के बारे में मैं कोई सुझाव नहीं दे सकता. लेकिन असमय सोने, टूटी-टूटी नींद सोने और कम से कम सोकर ज्यादा से ज्यादा काम करने के बारे में सुझाव दे सकता हूं. लेकिन इन सुझावों से पहले मैं अपनी नींद की प्रैक्टिस के बारे में कुछ विचार साझा करना चाहूंगा.

नींद कोई बुरी चीज नहीं, ईश्वर की ओर से आपकी 'डेली फ्री सर्विसिंग' का तोहफा

मैं एक ऐसे परिवार का सदस्य रहा हूं जो आजीवन 5 से साढ़े 5 के बीच उठता आया है. ऐसे में बचपन से 16-17 साल की उम्र तक मुझे भी 6 बजे तक उठना ही पड़ता था. जिसके बाद मुझे पढ़ने के लिए बिठा दिया जाता और मैं फिर सो जाता. इस पूरे दौर में हम रात में 10 से 11 बजे सो जाते थे यानि इस दौरान मैं करीब 7 घंटे की नींद ले पाता था. मैं ज्यादातर साउंड स्लीपर था यानि एक बार सोया तो सीधे सवेरे उठा. लेकिन 18 साल की उम्र होने तक चीजें बदलीं और मैंने नींद को नियंत्रित करने के बारे में सोचा. ऐसा पढ़ाई और सीखने को ज्यादा समय देने के लिए किया गया था.

किशोरावस्था में 7-साढ़े 7 घंटे सोना मुझे बुरी बात नहीं लगती लेकिन 18 साल की उम्र के बाद भी अगर आप रोज़ इतना सोते हैं तो आप रोज़ के हिसाब से अपने एक से डेढ़ घंटे का नुकसान कर रहे होते हैं. आप 6 घंटे सोकर भी काम चला सकते हैं. अगर आप की उम्र 18 से 50 के बीच है और आप रोज़ 7-8 घंटे या उससे ज्यादा सो रहे हैं तो एक बात तय है कि या तो आप जानबूझकर इतनी देर बिस्तर में पड़े रहना चाहते हैं या कई बार उठकर फिर सो जा रहे हैं

आगे बढ़ने से पहले एक बात और समझ लें कि नींद कोई बुरी चीज नहीं है. यह आपके फायदे के लिए ही है. यह आपको तरोताजा करती है. आपके दिमाग में रोज़ भरने वाले कचरे की सफाई करती है. आपकी दिमागी और शारीरिक फंक्शनिंग सही करती है बल्कि सीधे तौर पर कहें तो यह ईश्वर की ओर से आपकी शारीरिक मशीन को दी गई 'डेली फ्री सर्विसिंग' है. लेकिन वर्तमान दौर में अगर आप ज्यादा से ज्यादा सोते हैं तो आप अपने को कई हुनर सीखने, कई बातें जानने या कई काम कर पाने से महरूम कर रहे होते हैं. इसलिए नींद का दुश्मन नहीं बल्कि दोस्त होते हुए भी मैं चाहता हूं कि कम से कम नींद में अपना काम चलाया जाए.


तो अगर आप की उम्र 18 से 50 साल के बीच है और आप 7 से 8 घंटे या उससे ज्यादा सो रहे हैं तो आप इस तरह से अपनी नींद को मैनेज कर सकते हैं. जो भी तरीके मैं यहां लिख रहा हूं वो सारे ही मैंने खुद पर आजमाए हैं-

1. जरूरी नहीं कि आपका 6 घंटे सोकर काम चल जाए. कम से कम सोना उतना सोना है, जितने में आपको सवेरे उठने के बाद नींद न आती रहे, उतना है आपके लिए कम से कम सोना. कम से कम कितना सोकर काम चलाया जा सकता है, इसके लिए मैंने 2011 में एक तरीका ईजाद किया था. मसलन आप रोज़ 8 घंटे सोते हैं और सीधे तौर पर कहें तो मसलन 12 बजे सोकर 8 बजे जागते हैं तो आप 8 बजे का अलार्म लगाने के बजाए 07:58 का अलार्म लगाइए और कोशिश करके दो मिनट पहले जाग जाइए. अगले दिन 07:56 का अलार्म लगाइए, उसके अगले दिन 07:54 का.

यकीन मानिए ऐसे रोज़ दो मिनट पहले उठने से न ही आपकी नींद पर कोई असर होगा और न ही आपके शरीर पर. इस तरह से आप चाहें तो अपनी नींद को 1 महीने में 8 से 6 घंटे पर ला सकते हैं. लेकिन अगर आपको 6 घंटे सोने से सवेरे भी नींद आ रही है तो आपको इसी क्रम में बढ़ाकर भी चेक कर लेना चाहिए कि इससे कितने मिनट ज्यादा सोऊँ कि सवेरे नींद न आए. नींद की क्वालिटी पर भी निर्भर करता है कि आप कितनी देर सोएं. ऐसे में पूरी कोशिश करें कि रात में कोई आपको डिस्टर्ब न करे, न उठाए. और अगर आपकी नींद रात में कई बार खुलती हो तो डॉक्टर से जरूर संपर्क करें.

2. ऊपर वाले क्रमिक तरीके से अलग है इंस्टेंट तरीका. आपको सीधे 8 घंटे की नींद से साढ़े 6 घंटे की नींद पर अलार्म लगाकर उठ जाना चाहिए. यह थोड़ी मुश्किल बात होगी. लेकिन अगर आप ऐसा लगातार 3-4 दिन करने में सफल हो जाते हैं तो आपकी आंख रोज उतने ही समय खुलनी शुरू हो जाएगी. इस कदम को उठाने में अधिक इच्छाशक्ति की जरूरत होती है और मैं इसे अपनाने पर बहुत जोर नहीं देता लेकिन मैंने जैसे ऊपर के तरीके को खुद पर आजमाया है, इसे भी आजमाया है और दोनों ही सफल रहे हैं.

3. तीसरा तरीका है दो नींद का तरीका. लेकिन इसे सिर्फ खुद का व्यापार करने वाले और स्टूडेंट्स ही अपना सकते हैं. यह तरीका हमारी सभ्यता में पुराने समय से मौजूद रहा है. इसके मुताबिक नींद को दो भागों में तोड़ दिया जाता है. एशियाई सभ्यताओं में जल्दी जागने का महत्व रहा है. बहुत सवेरे से ही लोग अपने काम-धंधे शुरू कर देते हैं. आप आज भी उत्तर भारत के गांवों में जाएंगे तो देखेंगे कि महिलाएं 12 बजे तक कुछ न कुछ काम में लगी रहती हैं और फिर सवेरे ही 5 बजे उठकर काम शुरू कर देती हैं. शहरों और कस्बों में भी छोटे दुकानदार दोपहर के दो-तीन घंटे दुकानें बंद कर नींद लेते हैं. चीन में तो कई ऑफिस में भी यह नीति लागू है.
आप भी ऐसे ही रात में 4.5 से 5 घंटे की नींद लेकर बाकी 1.5 से 2 घंटे की नींद दिन में ले सकते हैं लेकिन दोनों ही नीदों का समय नियत रखें वरना इसमें खलल पड़ेगा. यह बढ़िया तरीका है, मैंने कई दिन अपनाया और आदत पड़ जाने पर इसका अच्छा असर रहा. लेकिन ध्यान रखें कि नींद के दो से ज्यादा टुकड़े न करें और एक टुकड़ा कम से कम 5 घंटे के आसपास जरूर रहे.

4. नींद एक बायलॉजिकल प्रक्रिया है इसलिए हमारी बायलॉजिकल क्लॉक के साथ सिंक होती है. हम जिस समय उठते हैं, उसी समय हमारी आंखें रोज़ खुलनी शुरू हो जाती हैं जब तक सोने के समय में या नींद के दौरान कोई खास व्यवधान न खड़ा हो. ऐसे में कोशिश करें कि एक नियत समय सोएं भी. रात में मोबाइल न चलाकर अपने दिमाग और आंखों को कम से कम स्ट्रेस दें ताकि कम से कम नींद से आपकी सर्विसिंग हो सके. मेरे लिए सोने जाते हुए कोई हल्का पॉडकास्ट या म्यूजिक सुनना अक्सर फायदेमंद रहा है, आप भी इसे ट्राई कर सकते हैं.

5. सोने से पहले आप घर या किसी खास के नंबरों के लिए अलग कॉलरट्यून लगाकर, अपने फोन को साइलेंट पर भी कर सकते हैं. ताकि घर जरूरी फोन के अलावा कोई और आपको डिस्टर्ब न करे. आप भी किसी को देर रात फोन न करें. सोने से पहले यह जरूर सोच लें कि कल करने के लिए आपके पास क्या-क्या जरूरी काम हैं और दिमाग में उनके लिए एक खाका बना दें कि किस समय, क्या काम करना है, इससे भी आपको जल्दी और एक बार अलार्म बजते ही उठने में मदद मिलेगी. लेकिन कितने भी जरूरी काम हों, उतनी नींद जरूर लें, जितनी आपको जरूरी लगती है.

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द प्लेटफॉर्म: हर स्थापित सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था की सीमाएं दिखाने वाली फिल्म

स्पेनिश डायस्टोपियन फिल्म एल होयो (द प्लेटफॉर्म) का एक दृश्य
द प्लेटफॉर्म (The Platform- El Hoyo) पिछले दिनों खासी चर्चित रही. मुझे फिल्म अच्छी लगी लेकिन एक बार फिर अजय कुमार को फिल्म अच्छी नहीं लगी. अच्छा-बुरा लगना अक्सर हमारी समझ, हमारे वैचारिक दायरे और हमारे मूल्यों पर निर्भर करता है. मुझे लगता है कमोबेश एक जैसी ही मानसिकता वाले हम दोनों पर प्रभाव का ऐसा अंतर समझ न आने वाली बात है.

अजय ने मुझे विस्तार से तो नहीं बताया कि उनपर फिल्म के प्रभाव के पीछे क्या वजहें रहीं लेकिन मैं यहां अपने ऊपर पड़े इसके अच्छे प्रभाव की कुछ वजहें बता रहा हूं-


काफ्का के साहित्य जैसा है फिल्म का प्रभाव

फिल्म द प्लेटफॉर्म की सबसे अच्छी बात है कि उसमें डायस्टोपिक तरीके से सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था चलाने के सभी हालिया तरीकों पर एक साथ व्यंग्य करती है. इसके 'काफाएस्क' जैसी बात भी दिखती है. मतलब काफ्का के साहित्य जैसी. एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें लोग उलझे हुए हैं और उस प्रक्रिया का कोई मतलब नहीं है. इस प्रक्रिया में सफलता जैसी बातें ही निरर्थक हो जाती हैं. यह भी प्रभावित करने वाली बात रही कि दुनिया में आधुनिक दौर में राजनीतिक व्यवस्था पर हावी रही दो विचारधाराओं पूंजीवाद और समाजवाद दोनों पर ही फिल्म एक साथ तंज करती है.

फिल्म की बारीकियों पर फिर कभी विस्तार से लिखूंगा लेकिन मात्र मेरे अनुभव में ही नहीं बल्कि फिल्म बनाते हुए डायरेक्टर के दिमाग में भी व्यवस्थाओं पर व्यंग्य वाली बात हावी थी. इसके लिए मैं इसके डायरेक्टर गज़्तेलु उरुतिया के एक इंटरव्यू का अनुवादित अंश पेश कर रहा हूं, जिसकी बातों से मेरी भी सहमति है.

फिल्म में पूंजीवाद और समाजवाद दोनों की ही आलोचना

प्लेटफॉर्म के डायरेक्टर गज़्तेलु उरुतिया (Gaztelu-Urrutia) ने एक बार फिल्म के अंत को लेकर बात की थी. जिसके बारे में बताने से पहले फिल्म के स्क्रिप्ट राइटर के नाम बता देता हूं- डेविड डेसोरा और पेद्रो रिवेरो. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, "जिस तरह से प्लेटफॉर्म खत्म होती है. यह सीधे तौर पर दिखाता है कि शुरुआत में द प्लेटफॉर्म पूंजीवाद की आलोचना करती है लेकिन फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, इसका ध्यान और संदेश दोनों ही बदलते हैं."

गज़्तेलु उरुतिया ने समझाया,

"हम यह बिल्कुल मानते हैं कि पूंजी का बेहतर तरीके से बंटवारा होना चाहिए लेकिन फिल्म पूरी तरह से पूंजीवाद के बारे में नहीं है. भले ही शुरुआत में पूंजीवाद की आलोचना हो लेकिन हम यह भी देखते हैं कि जैसे ही गोरंग और बहारत समाजवाद के जरिए इसके हल की कोशिश करते हैं कि सभी अपनी इच्छा से अपना खाना शेयर करें. अंत आते-आते वे जिनकी मदद के लिए निकले होते हैं, उनमें से आधे को मारकर अपनी प्रक्रिया को भी खत्म कर देते हैं."


डायरेक्टर ने कहा- हमने अंत को दर्शकों की व्याख्या के लिए छोड़ दिया है

उन्होंने यह भी कहा, "समस्या तब सामने आती है, जब वे सभी के सहयोग के लिए प्रयास करते हैं और आप अंत में देखते हैं कि वे कोई बड़ी उपलब्धि नहीं प्राप्त करते. भले ही गोरंग आखिरी स्तर तक 'पना कोटा' को ले आता हो और बच्ची को ढूंढ लेता हो लेकिन वह खाना शेयर करने के लिए किसी का ह्रदय परिवर्तन कर पाने में  असफल रहता है. मेरे लिए इसका आखिरी स्तर, कहीं है ही नहीं. गोरंग यहां आने से पहले ही मर चुका है. और यह (आखिरी स्तर) केवल उस अहसास को व्यक्त करता है, जिसके मुताबिक गोरंग को महसूस होता है कि उसे क्या करना है."

अंतत: गज़्तेलु उरुतिया का 'द प्लेटफॉर्म' में फिल्म के अंतिम दृश्य का मकसद इसे तमाम कयासों के लिए खुला रखना है. वे चाहते हैं कि लोग खुद समझें कि क्या यह प्लान काम करता है और क्या ऊपर बैठे लोगों को नीचे वालों की फिक्र होती है. उन्होंने यह भी बताया है कि फिल्म का बिना लड़की के सीन के भी एक अंत फिल्माया गया था लेकिन वह हमारे सामने नहीं आया. गज़्तेलु उरुतिया कहते हैं,

"मैंने आपकी कल्पना पर छोड़ दिया है कि इससे क्या होता है."
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P.S.: यह सारी बातें 'द प्लेटफॉर्म' फिल्म पर कुछ विचारों के जैसी हैं. इन्हें किसी रिव्यू से कन्फ्यूज न किया जाए.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.) 

Saturday, April 11, 2020

इन वजहों के चलते पैरासाइट को ऑस्कर मिलना भारतीयों के लिए भी रहा खास

बॉन्ग जून हो की फिल्मपैरासाइट का एक दृश्य
यह लेख मेरे मित्र अजय कुमार की प्रेरणा से लिखा गया है. जिन्हें हाल ही में आई बॉन्ग जून हो की फिल्म पैरासाइट पसंद नहीं आई. मैंने ऑस्कर मिलते-मिलते पैरासाइट देख ली थी. हालांकि उसके बहुत बाद यह अमेजन प्राइम पर उपलब्ध हुई और भारत में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंची. अपनी दक्षिण एशियाई पहचान और महानगरीय जीवन के प्रति सचेत होने के चलते मुझे पैरासाइट अपने बेहद करीब की फिल्म लगी. इसलिए मैं इसके पक्ष में कुछ तर्क रख रहा हूं.

ऑस्कर की बात करें तो इसे ऑस्कर दिया जाना मुझे इसलिए भाया कि इसने अंग्रेजी का दबाव ऑस्कर दिए जाने के लिए हटाया और यह विश्वास भी दिलाया कि हम एशियाई लोगों की कहानियां और शायद अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकियों की भी अगर सिनेमा के जादू से भरी हुई हो तो उन्हें ऑस्कर में डिस्क्रिमिनेशन नहीं झेलना होगा. हम अपने टच के साथ ऑस्कर जीत सकते हैं.


हॉलीवुड की कहानियों से अलग पैरासाइट में है एशियाई समाज की चेतना

सीधे कहानी पर आते हैं. कहानी एक व्यंग्य है. ऐसा भी नहीं कि ऐसा व्यंग्य पहले कभी न हुआ हो. बॉन्ग जोन हू ने कई सारे अनुभवों को इस फिल्म में दिखाने की बात की है. साउथ कोरिया की राजधानी सियोल के बेसमेंट में बने घर में रहने वाले एक परिवार की कहानी है- पैरासाइट. यह बेसमेंट में रहने वाला परिवार छोटे-छोटे काम करके अपना जीवनयापन करता है, जैसे पिज्जा के डिब्बे बनाना आदि. लेकिन बेसमेंट में रह रहे और किसी भी तरह से राजधानी के उच्चवर्गीय लोगों के संपर्क से कटे इन लोगों को देखकर आपको भारत के महानगरों में एक-दो कमरे के घरों में रहने वाले उन लोगों की याद आ जाएगी, जिनके बच्चे पढ़ाई में तेज होने के बाद भी ऐसे स्कूलों से नहीं पढ़ पाते और ऐसी डिग्रियां नहीं जुटा पाते कि उनका जीवन अपने माता-पिता से अच्छा हो सके या वे बुढ़ापे में उनका सहारा बन सकें.

मुझे पैरासाइट से पर्टिकुलर्ली एक महिला याद आई, जो अंडरवियर के फैक्ट्री से बनकर निकलने के बाद उनकी फिनिशिंग करती थी और हर अंडरवियर के उसे 25 पैसे मिलते थे. यह सब कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि मैंने अपने महानगरीय समाज में उस कहानी के तत्व पाए और महसूस किए जबकि हॉलीवुड की फिल्में जिन्हें लंबे समय से हम सेलिब्रेट करते आए हैं, हमारे लिए सिर्फ एक सपना होती है. न उनमें दिखाई जगहें, हमारे जैसी होती हैं, न उनकी सोच और न उनकी संस्कृति. हॉलीवुड फिल्मों में परिवार संस्था का महत्व और उसकी चेतना एशियाई विचारों से कहीं अलग होती है. पैरासाइट में ऐसा नहीं है.


गैरबराबरी दिखाने के लिए बेहतर तरीकों का किया गया है इस्तेमाल

कहीं मैंने पढ़ा कि कहानी लिखते हुए बॉग जून हो के दिमाग में लगातार यह बात बनी हुई थी कि रोजगार वह एकमात्र जरिया है, जिसके जरिए दो वर्गों को आस-पास दिखाया जा सकता है. और यहीं से उन्होंने इस डार्क सटायर में सबको अमीर परिवार के घर नौकरी दिलाने की बात सोची. आप खुद भी सोच सकते हैं कि किसी अमीर व्यक्ति से कोई गरीब अपने रोजगार के अलावा कहां मिलता है? समाज का बंटवारा इस हद तक हो चुका है कि उनके स्कूल अलग हैं. उनकी दुकानें अलग हैं. उनके मोहल्ले अलग हैं. उनके पार्क अलग हैं. उनके खेल के मैदान अलग हैं. ऐसे में कोई साहब जब घर से निकलते हैं तो उनके ड्राइवर और दफ्तर पहुंचने पर दरबान और चपरासी मात्र ऐसे होते हैं, जिन गरीब लोगों से उनका सामना होता है.

पैरासाइट में दुनिया में अच्छे साहित्य में गैरबराबरी दिखाने के लिए इस्तेमाल हुए तत्वों का बहुत समझदारी से इस्तेमाल हुआ है. जैसे बड़े घर के बेसमेंट में रहने वाले पहली केयरटेकर के पति को भूत के तौर पर पेश किया जाना. उसका चोरी करके फ्रीज़ से खाना. उसका अंधेरे बंद बेसमेंट में रहना. यह एचजी वेल्स की 'द टाइम मशीन' में दिखाए गए समाज का फिल्मी निरूपण है. इसके अलावा पैरासाइट की भावना आप पर लगातार हावी रहती है. यही फिल्म की सफलता है. इतना ही नहीं कई बार आपकी संवेदना भी पक्ष बदलती है. जब आप उन्हें अमीर परिवार को लूटते देखते हैं तो आपको पैरासाइट का व्यंग्य सार्थक लगने लगता है.

फिल्म पैरासाइट का एक दृश्य

जो समाज के अमीर वर्ग में नहीं, परिस्थितियां तय करती हैं उनका भविष्य

लेकिन जरा रिवर्स गियर लगाइए और देखिए जिस समाज में वे रह रहे हैं, उनके लिए बड़े विश्वविद्यालयों की डिग्री का क्या मोल है. और फिर सोचिए कि भारत का बहुतायत अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र और विज्ञान के विशेषज्ञों के बजाए क्यों किसी नेता पर विश्वास कर लेता है. यहीं वो गुप्त रहस्य है, जो आज तक पकड़ा नहीं जा पा रहा है. समाज में पैरासाइट के गरीब परिवार की स्थिति में जी रहे 50% से ज्यादा लोग फिर से किसी पार्टी को 60-70% वोट शेयर देते रहें तो माथा पकड़कर मत बैठ जाइएगा.

अंतत: बेसमेंट में छिपे अपने पिता को लाइट जलाते-बुझाते देख गरीब परिवार के बेटे का शपथ लेना कि मैं यह घर खरीदूंगा किस स्तर पर ले जाता है फिल्म को. यह वैसा ही लगता है कि पूर्वांचल या बुंदेलखंड का कोई शख्स अपने पिता का बदला लेने के लिए मर्डर करने का संकल्प उठा लेता है और वही उसकी जिंदगी का असली मकसद बन जाता है. लेकिन इससे उसकी जिंदगी का असली मकसद खो जाता है. वो मकसद जिसके लिए उसने पिज्जा के डिब्बे पैक किए होते हैं. विनम्र रहकर दुनिया में अपना आगे का रास्ता बनाने की सोची होती है.

P.S.: यह सारी बातें पैरासाइट फिल्म पर कुछ विचारों के जैसी हैं. इन्हें किसी रिव्यू से कन्फ्यूज न किया जाए.

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Friday, April 10, 2020

इन 5 तरीकों को अपनाकर 1 दिन में निपटाया जा सकता है पूरे हफ्ते का काम!

इन पांच तरीकों को अपनाएंगे तो एक दिन में ही निपटा सकते हैं हफ्ते भर के काम (फोटो क्रेडिट- NYT)
मैं रोज़ अमूमन एक किताब के बीस पेज पढ़ता हूं. एक समय में मैं तीन किताबें औसतन पढ़ रहा होता हूं. यानि अख़बार से इतर 60 पन्ने मैं रोज पढ़ता हूं. लेकिन हमेशा ऐसा चलता रहे मुझे पसंद नहीं. जैसे लोगों को नहीं पसंद होता कि वे रोज़ घर पर एकसार खाना खाएं. वे रेस्टोरेंट जाना चाहते हैं. कुछ तला-भुना घर पर ही खाना चाहते हैं. वैसे ही 'फॉर अ चेंज' मैं अपने इस प्रॉसेस को एक्सिलरेट कर देता हूं.

हर किताब 20 पेज रोज़ पढ़कर उसका आनंद नहीं लिया जा सकता और न ही इस तरह उसकी तासीर का लुत्फ लिया जा सकता है. फिक्शन के मामले में यह बात ज्यादा लागू होती है. इसलिए कई बार एक दिन निकालकर पूरी किताब खत्म कर देता हूं. मसलन कल की बात करूं तो करीब आधी 'ब्रेव न्यू वर्ल्ड- ऐल्डस हक्सले' मैंने कल ही खत्म कर दी. इसके अलावा 'मेडागास्कर' नाम की एक एनिमेशन फिल्म भी देखी. दो चैप्टर 'प्राइड एंड प्रिज्यूडिस- जेन ऑस्टिन' के पढ़े. डुओलिंगो पर करीब 100 प्रैक्टिस प्वाइंट्स जुटाए. एक घंटे का पॉडकास्ट बीबीसी ग्लोबल का और एक घंटे का पॉडकास्ट डीडब्ल्यू इनसाइड यूरोप का सुना. एक्सरसाइज की. अगले 18 दिनों का शिड्यूल तय किया. 1 घंटे लिखा. इंटरनेट बैंकिंग से जुड़े महीने भर के काम निपटाए. अपने सारे कपड़े धो दिए-बर्तन भी धोए. नाखून काटे-शेव किया, जो 21 दिनों से ड्यू था.

ऐल्डस हक्सले की किताब ब्रेव न्यू वर्ल्ड के कुछ कवर..

रात के 12 बजने तक मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे मैंने 1 दिन नहीं एक हफ्ता गुजार लिया हो. हालांकि तथ्यात्मकता से कहूं तो इतना काम मैं 3-4 दिनों में करता हूं, एक हफ्ता थोड़ा ज्यादा कह रहा. बहरहाल बात करते हैं, उन चीजों की, जिनके चलते आप ऐसा कर पाते हैं-

1. विज़नरी रहिए-पैशनेट रहिए. यानी सोचकर रखिए कि कौन सी किताब, कौन सी टीवी सीरीज एक साथ खत्म की जानी चाहिए तभी पूरा आनंद आएगा. उसे बचाकर रखिए. और जब मौका मिले तो उसे पूरी तवज्जो दीजिए. उतनी देर मोबाइल आदि का त्याग करके.

2. हालांकि मैंने एक दिन में किए जा सकने वाले कामों के मुकाबले ज्यादा काम किए लेकिन दिन का केवल कुछ हिस्सा ही प्लान्ड था. यकीनन अगर आप पूरे हफ्ते में जरूरी कामों को जुटाकर रखेंगे और वीकेंड पर सारे एक साथ खत्म कर देंगे तो आपको मुझे होने वाली खुशी और संतुष्टि से दोगुनी खुशी-संतुष्टि होगी.

3. रिलैक्सेशन प्लान भी काम का रखिए. मसलन मैं किताब पढ़-पढ़ कर थक गया था. करीब 150 से ज्यादा पन्ने अंग्रेजी में पढ़ने के बाद आंखें और दिमाग दोनों में ही थकान थी. तो इस थकान को मिटाने के लिए मैंने फिल्म देखी- मेडागास्कर. एक हल्की-फुल्की कार्टून फिल्म. लेकिन अच्छा लगा क्योंकि फिल्म क्रिटिकली एक्लेम्ड थी.

4. ऐसे किसी दिन पर मानसिक श्रम वाले काम पहले कीजिए. मैंने कल सबसे पहले लिखा, किताबें पढ़ी, लैंग्वेज प्रैक्टिस की, फिल्म देखी, पॉडकास्ट सुना फिर शारीरिक श्रम वाले काम- कपड़े-बर्तन धोए. शारीरिक श्रम वाले काम के दौरान आप अपना पसंदीदा म्यूजिक इंज्वाय कर सकते हैं, जिससे मानसिक तौर पर थके होने का अहसास न हो.

5. ऐसे किसी दिन के लिए डाइट बहुत जरूरी होती है. यानि इस दिन डाइट ऐसी होनी चाहिए कि आपको खाकर तुरंत नींद न आए. मेरा जोर यह भी रहता है कि आप इस दिन जरूरत से थोड़ा कम खाएं. ताकि भूख लगी रहे जो आपको अपने लक्ष्य की याद दिलाती रहे. लेकिन कम खाते हुए यह जरूर याद रखें कि पोषण की कोई कमी न महसूस हो. ऐसा हुआ तो भी आप काम पूरा नहीं कर पाएंगे.

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Thursday, April 9, 2020

लगातार 21 दिन एक्सरसाइज़ करने और नाखून न चबाने से मिले ये सबक

एक्सरसाइज़ की आदत डालने के लिए अपने हिसाब से इसका चयन बहुत जरूरी है...
21 दिन पूरे हो गए. जो संकल्प लिया था. वह पूरा कर दिखाया. रोज़ एक्सरसाइज की. और नाखून नहीं खाया. अगर इसे मैं सही से रोज दर्ज कर पाता तो शायद आप ज्यादा बेहतर समझते कि कैसे किसी बुरी आदत का निषेध कर अच्छी आदत डाली जाती है और कैसे किसी अच्छी आदत को नए सिरे से डेवलप किया जाता है. चूंकि रोज़ की बात दर्ज नहीं है इसलिए मैं एक ही बार में आपको पूरी प्रक्रिया बताने की कोशिश करता हूं.


एक्सरसाइज की अच्छी आदत कैसे डाली?

पहले बात करते हैं रोज एक्सरसाइज़ की. निस्संदेह मैंने बहुत टाइमटेकिंग प्रक्रिया वाली और बहुत ज्यादा शारीरिक थकान देने वाली एक्सरसाइज उठाई होतीं तो लगातार इतने दिन तक कर पाना नामुमकिन होता. इसलिए मैंने 20-25 मिनट में हो जाने वाली हाथों-पैरों की एक्सरसाइज़ की. इसे आप यूट्यूब पर '1 माइल हैप्पी वॉक' (One Mile Happy Walk) के नाम से सर्च कर पा जाएंगे. यह बहुत मजेदार है और किसी भी समय आसानी से की जा सकती है. इसलिए कई दिन तो मैंने इसे नाश्ते या खाने के बाद भी किया. इतना समय मैं वर्क फ्रॉम होम (Work From Home) के बीच भी निकाल लेता था. इसलिए यह मेरे लिए बहुत कठिन नहीं रही. हालांकि आज से मैं एक्सरसाइज का समय कुछ बढ़ा रहा हूं. साथ ही थोड़े कठिन मूव्स भी आज से ऐड कर रहा हूं.

एक्सरसाइज़ की 21 दिन की स्ट्रीक बनाने या कह लें आदत डालने में मेरे काम ये तीन चीजें आईं-

पहली, खुद को कन्विंस करने वाली आदत का चुनाव (माने कोई ऐसी आदत चुनें जिससे किसी भी तरह का पर्सनल फायदा होने का विश्वास हो), दूसरी, आदत को अपनी दिनचर्या में घुसा पाने की सहजता (माने आप अपने टास्क को कभी भी कर सकें) और तीसरी, इंस्टेंट दिखने वाली प्रगति (माने ऐसा टास्क चुनें, जिसका फायदा आपको जल्द से जल्द दिखे. मसलन मुझे 9 से साढ़े 9 घंटे रोज वर्क फ्रॉम होम करना होता है. इस एक्सरसाइज़ के रुटीन से मेरा पीठदर्द बहुत कम हो गया है, यही इंस्टेंट फायदा है).
20 दिन लगातार नाखून न चबाने के बाद मेरे नाखून

नाखून चबाने की बुरी आदत कैसे छोड़ी?

अब बात करते हैं नाखून खाने की आदत छोड़ने की. यह आदत छोड़ने के लिए शुरुआत से ही मेरे पास जबरदस्त वजहें थीं. लेकिन मेरे पास सिर्फ वजहें थीं, कभी इतना समय नहीं रहा कि बैठकर-विचारकर इसे रणनीतिक तरह से छोड़ा जा सके. बहुत ही साधारण सी रणनीति अभी भी मैंने इसके लिए फॉलो की. मैंने सिर्फ अपने नाखूनों को बढ़ने के लिए छोड़ दिया. 21 दिन तक उन्हें बढ़ने दिया. शुरुआत में इन्हें दांतों से काटने से बचने के लिए प्रयास करना पड़ा. कई बार मुंह में जाते-जाते रोका. एक-आध बार दांत से नाखून दबा भी दिया पर याद आ गया काटना नहीं है. लेकिन जब नखून थोड़े बड़े हो गए तब हमेशा याद रहने लगा और पिछले एक सप्ताह में तो मेरे लिए नाखून चबाना बिल्कुल अजीब बात हो चुकी थी. फिर भी आगे भी इससे कुछ दिन तक बचने का फैसला मैंने किया है ताकि इसे पूरी तरह पुख्ता किया जा सके.

बहरहाल 21 दिन नाखून न चबाने में काम आई ये चीजें-

इच्छाशक्ति (कभी भी किसी बुरी आदत को छोड़ने के लिए यही आपका पहला कदम होगा, इससे अच्छा हो सकता है कि आप बुरी आदत छोड़ने को अच्छी आदत डालने की तरह ही लें और खुद को ये तर्क दें कि इससे आपको क्या पर्सनल फायदा होगा. अगर आपने खुद को इसके फायदों के लिए कन्विंस कर लिया तो इसके खिलाफ इच्छाशक्ति डेवलप करने में बहुत मदद मिलेगी), दूसरी रणनीति, जैसे मैंने नाखून 21 दिन तक बढ़ने दिए ताकि बढ़े नाखून देख याद रहे कि इन्हें नहीं चबाना है. मैं इन्हें पेंट भी कर सकता था लाल रंग से और तीसरी चीज इंस्टेंट प्रगति, यह दूसरे प्वाइंट से ही जुड़ा है. आखिर मैंने अपने इतने बड़े नाखून पिछले 15-16 साल में शायद ही देखे थे. ऐसे में यह सीधी तरक्की जैसा था, जिससे इच्छाशक्ति भी बढ़ी और मेरी रणनीति और आत्मविश्वास को भी मजबूती मिली. 

इन दोनों ही चीजों का मुझे उत्साह जरूर है. तभी कल से कई लोगों को यह बात बता चुका हूं. लेकिन आपसे लगातार साझा नहीं कर पाया. ऐसे में तय किया है कि अगली निरंतरता की आदत के तौर पर लिखने को ही रखा जाएगा. जिससे उस प्रक्रिया को दर्ज किया जा सके जो किसी काम में निरंतरता के लिए निर्णायक होती है. फिलहाल चैलेंज यह है कि कैसे लेखन की प्रक्रिया को जीवन-शैली में ढालने जितना सहज बनाया जाए. दिन के 24 घंटों में वो समय क्या हो, जब लिखने के सिवाए कुछ सूझे ही न.


अगले 21 दिनों का लक्ष्य है- लिखना

ऐसे में तमाम बिंदुओं का आकलन कर कहा यही जा सकता है कि वह ऐसे ही सवेरे का समय हो क्योंकि पिछली बार लेखन को इसीलिए रात में करने से बचा गया था क्योंकि पाया गया कि रात में दिमाग अपनी पूरी क्षमता से साथ नहीं दे रहा. बाकी यह पूरी तरह से पारदर्शी प्रक्रिया होने जा रही है. क्योंकि यह मामला अगर जमा तो अगले 21 दिन यानी 30 अप्रैल तक मेरे 21 ब्लॉग आपके सामने होंगे. अब जो भी होगा आपकी नज़रों के सामने होगा.

वैसे पिछले कुछ दिनों में किताबों को पढ़े जाने में बेहतरीन निरंतरता आई है लेकिन मेरे लिए यह कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है क्योंकि मैं पिछले लंबे समय से निरंतर किताबें पढ़ता आ रहा हूं. इसलिए उनके प्रति किसी चैलेंज और स्ट्रीक का कोई मसला नहीं है.

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