Thursday, April 23, 2020

Good Economics for Hard Times: अभिजीत बनर्जी-एस्थर डुफ्लो की किताब का हिंदी में संक्षिप्त अनुवाद- पर्यावरण के लिए कीमत चुकाएं अमीर देश

अभिजीत बनर्जी और एस्थर डुफ्लो की यह किताब दुनिया की तमाम परेशानियों का हल अर्थशास्त्र में ढूंढती है

Likes, Wants and Needs
जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई को आर्थिक असमानता के खिलाफ लड़ाई से अलग नहीं किया जा सकता है

2018 के अंत में 'पीली जर्सी' (येलो वेस्ट) प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने गैसोलीन/पेट्रोल पर प्रस्तावित एक टैक्स का बुरी तरह से विरोध करते हुए पेरिस की सड़कों पर जमकर हंगामा किया. उनका तर्क था कि यह अभिजात वर्ग की रक्षा करते हुए गरीबों को चोट पहुंचाने के लिए उठाया गया एक कदम था. पेरिस के अमीर निवासी काम पर जाने के लिए मेट्रो ले सकते थे लेकिन उपनगरों या ग्रामीण इलाकों में रहने वाले गरीब लोग जो अगर गाड़ी चलाकर काम पर जाएं तो ही आजीविका चला सकते हैं, वे मेट्रो नहीं ले सकेंगे.

यह बहुत सामान्य बात है कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने वाला तर्क एक लक्जरी है, जो गरीबों की सामर्थ्य से बाहर है. इस तरह सोचा जाता है कि या तो हम भविष्य के लिए धरती को बचा सकते हैं या हम वर्तमान के लिए अर्थव्यवस्था को बचा सकते हैं.

लेकिन यह गरीबों के लिए भी परेशान करने वाला है जो तुरंत जलवायु परिवर्तन की कीमत चुका रहे हैं, खासकर भूमध्य रेखा के पास मौजूद विकासशील देश. यदि तापमान स्कैंडेनेविया में कुछ डिग्री बढ़ जाता है, तो यहां सुखद गर्मी का अहसास हो सकता है. यदि दूसरी ओर भारत में तापमान बढ़ता है तो यह असहनीय रूप से तपती गर्मी होगी.

इससे भी अधिक, भारत में अधिकांश लोगों के हालात 'लू' से बचने के लिए अनुपयुक्त हैं- सिर्फ 5% घरों में ही एसी है, जबकि इसके विपरीत अमेरिका में 87% लोगों के पास एसी है.

व्यापक विश्वास है कि आर्थिक विकास ही अंतिम अच्छा साधन है. हम ऊर्जा की खपत में कटौती के विचार से डरे हुए हैं कि यह अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है. लेकिन कोई और रास्ता नहीं है. जलवायु परिवर्तन को धीमा करने के लिए, हमें ऊर्जा खपत में कटौती करनी ही होगी. क्या इसे ऐसे करना संभव है कि यह आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को नुकसान न पहुंचाए.
अमीर देशों में उत्सर्जन को कम करने के उपायों के साथ-साथ, हमें जलवायु परिवर्तन का खामियाजा भुगत रहे विकासशील देशों को सहारा देने के लिए धन के अधिक से अधिक पुनर्वितरण की आवश्यकता है. भारत में एसी का उदाहरण लें. भारत के परिवारों के लिए, स्वच्छ ऊर्जा वाले एयर कंडीशनर, जो HFC गैसों का उत्पादन नहीं करते, के लिए धन देने में दुनिया के सबसे अमीर देशों की GDP का एक छोटा सा हिस्सा खर्च होगा.
हमें धरती को बचाने के लिए गरीबों का बलिदान नहीं करना है, लेकिन अमीर देशों को कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए.

The End of Growth?
AI अधिक जटिल मानवीय कार्य करने के लिए तैयार हो रहा है, नौकरी के बाजार को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है

आपने विज्ञान फंतासी (साइंस फिक्शन) फिल्मों में यह पटकथा सुनी होगी- इंसानों की जगह चमचमाते रोबोट ने ली है, जो हमारी दुनिया को संभालने से पहले हमारे काम संभाल रहे थे.

यह थोड़ी दूर की कौड़ी लग सकती है, लेकिन क्या यह वास्तव में है? आज रोबोट बर्गर तैयार कर सकता है, फर्श साफ कर सकता है और यहां तक कि जटिल सामान/रसद का भी ध्यान रख सकता है.

उन इंसानों का क्या हुआ, जिनके पास वे नौकरियां थीं? कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence- AI) और लगातार बढ़ते मशीनीकरण के साथ उनका क्या होगा? इस प्रश्न का जवाब देना जटिल होगा क्योंकि टेक्नोलॉजी इतनी तेज गति से आगे बढ़ रही है.

हालांकि हम आगे के लिए भविष्यवाणी नहीं कर सकते, हम अतीत में मशीनीकरण के प्रभावों को देख सकते हैं. शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि रोबोटों के आने से नौकरियों के बाजार पर एक नकारात्मक प्रभाव पड़ा है. किसी शहरी इलाके में सिर्फ एक औद्योगिक रोबोट की उपस्थिति 6.2 नौकरियों को खत्म कर देती है और मजदूरी को नीचे ले आती है.

हालांकि अभी तक मुख्यत: शारीरिक श्रम वाली नौकरियों का मशीनीकरण हुआ है, AI का मतलब है कि अधिक जटिल कार्यों जैसे बहीखाते रखना, खेल पत्रकारिता और इसके जैसे अन्य काम भी रोबोट से लिए जा सकते हैं. ऐसे में सिर्फ उच्च कौशल वाली कंप्यूटर साइंस की नौकरियां और बहुत कम कौशल वाली कुत्ता टहलाने जैसी नौकरियां ही बाकी रह जाएंगीं. जिन लोगों के पास कॉलेज की डिग्री नहीं है, निश्चय ही वे नकारात्मक तौर पर सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे.
वर्तमान में, किसी अमेरिकी कंपनी के लिए इंसान की तुलना में रोबोट का इस्तेमाल पैसों के मामले में फायदेमंद हो सकता है, चाहे रोबोट काम में अधिक कुशल न भी हो. नौकरी पर रखने वाले को रोबोट को मातृत्व अवकाश या वेतन निधि का (अलग से) भुगतान नहीं करना होगा. कंपनियों को ऐसे रोबोट बनाने के लिए प्रोत्साहित करके, जो इंसानी नौकरियों को छीनने के बजाए बढ़ाने का काम करते हैं, (साथ ही) हम एक टैक्स पेनाल्टी (कर दंड) भी लगा सकते हैं, जो एक इंसान को काम पर रखने को (रोबोट को रखने के मुकाबले) ज्यादा लाभदायक बना देता है.
एक समस्या यह है कि यह निर्धारित करना कठिन हो जाएगा कि कहां पर रोबोट की सीमा खत्म होती है और इंसानों की शुरू होती है. सभी रोबोट चमकदार चांदी के आवरण वाले और पहियों पर घूमने वाले नहीं होते हैं; अक्सर मशीनों में लगे होते हैं, जिन्हें मानव ऑपरेटर चलाते हैं. वास्तव में 'रोबोट' क्या हो सकता है, यह तय करना बहुत कठिन है.
लेकिन आर्थिक असमानता रोबोट के साथ शुरू और खत्म नहीं होती. जैसा कि आप अगले चैप्टर में पाएंगे कि इस असमानता का तकनीकी (टेक्नोलॉजी) की अपेक्षा सामाजिक नीति से ज्यादा लेना-देना है.

किताब के बारे में-

इस किताब में दोनों लेखक तर्क करते हैं कि अर्थशास्त्र कई समस्याओं को लेकर नया दृष्टिकोण पेश कर उन्हें सुलझाने में हमारी मदद सकता है. चाहे वह जलवायु परिवर्तन का हल बिना गरीबों को नुकसान पहुंचाए हो, या बढ़ती हुए असमानता के चलते उभरने वाली सामाजिक समस्याओं से निपटना हो, या वैश्विक व्यापार, और प्रवासियों को लेकर फैलाया गया डर जैसे मुद्दे.

अभिजीत बनर्जी और एस्थर डुफ्लो ने 2019 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार डेलपलमेंट इकॉनमिक्स के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए पाया. उनकी इससे पहले आई किताब 'पुअर इकॉनमिक्स' (Poor Economics- गरीब अर्थशास्त्र) एक शुरुआती खोज थी कि गरीबी क्या होती है और कैसे सबसे इससे जूझते समुदायों को सबसे प्रभावशाली तरीके से मदद पहुंचाई जाए. ये दोनों ही MIT में प्रोफेसर हैं और बहुत से अकादमिक सम्मान और पुरस्कार पा चुके हैं.

अनुवाद के बारे में-

भारतीय मूल के अर्थशास्त्री अभिजीत वी. बनर्जी और उनकी साथी एस्थर डुफ्लो की 2019 में उन्हें नोबेल मिलने के तुरंत बाद आई किताब गुड इकॉनमिक्स फॉर हार्ड टाइम्स (Good Economics for Hard Times) बहुत चर्चित रही. मैं इस किताब के प्रत्येक चैप्टर का संक्षिप्त अनुवाद पेश करने की कोशिश कर रहा हूं. अभिजीत के लिखे हुए को अनुवाद करने की मेरी इच्छा इस किताब के पहले चैप्टर को पढ़ने के बाद ही हुई. बता दूं कि इसके संक्षिप्त मुझे ब्लिंकिस्ट (Blinkist) नाम की एक ऐप पर मिले. बर्लिन, जर्मनी से संचालित इस ऐप का इसे संक्षिप्त रूप में उपलब्ध कराने के लिए आभार जताता हूं. अंग्रेजी में जिन्हें समस्या न हो वे इस ऐप पर अच्छी किताबों के संक्षिप्त पढ़ सकते हैं और उनका ऑडियो भी सुन सकते हैं. एक छोटी सी टीम के साथ काम करने वाली इस ऐप का इस्तेमाल मैं पिछले 2 सालों से लगातार कर रहा हूं और मुझे इससे बहुत फायदा मिला है. वैश्विक क्वारंटाइन के चलते विशेष ऑफर के तहत 25 अप्रैल तक आप इस पर उपलब्ध किसी भी किताब को पढ़-सुन सकते हैं. जिसके बाद से यह प्रतिदिन एक किताब ही मुफ्त में पढ़ने-सुनने को देगी.

(नोट: कल इस किताब के अगले दो चैप्टर का हिंदी अनुवाद पेश करने की मेरी कोशिश होगी. आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Tuesday, April 21, 2020

Good Economics for Hard Times: अभिजीत बनर्जी-एस्थर डुफ्लो की किताब का हिंदी में संक्षिप्त अनुवाद- ट्रेड वॉर नहीं, ये है सही रास्ता

अभिजीत बनर्जी और एस्थर डुफ्लो की यह किताब दुनिया की तमाम परेशानियों का हल अर्थशास्त्र में ढूंढती है

The Pains from Trade

वैश्विक व्यापार समझौतों में सामान स्वतंत्र रूप से आ-जा सकता है, लोग और धन नहीं

अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों के पैरोकार इसका भविष्य उज्ज्वल ऐसे दिखाते हैं: प्रत्येक देश उन चीजों का निर्यात करेगा, जिनके उत्पादन में वह बेहतरीन होगा और उन चीजों का आयात करेगा, जो दूसरी जगहों से मंगाए जाने पर (खुद उत्पादित करने के बजाए) ज्यादा सस्ती पड़ेंगीं.

इसलिए, मिस्र अपने सस्ते घरेलू वर्कफोर्स को पूंजी बनाते हुए अधिक श्रम वाली चीजों जैसे हाथ से बुने कालीनों का निर्यात कर सकता है. चीन अपने जबरदस्त तकनीकी संसाधनों और कुशल कारखानों का उपयोग कर बड़े पैमाने पर उत्पादित कंप्यूटर पार्ट्स का निर्यात कर सकता है. फिर उन पार्ट्स को भारतीय कंपनियों द्वारा सस्ते में, स्थानीय तकनीकी उद्योग को मजबूती देने के लिए खरीदा जा सकता है.

हालांकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार कुछ उद्योगों और नौकरियों को नुकसान पहुंचाएगा, लेकिन हम ऐसे सोचते हैं कि इससे कारखानों में बिना मुनाफे वाली चीजें बनना बंद हो सकती हैं और नए सुधारों के साथ नई चीजों का निर्माण शुरू हो सकता है. और कामगार काम बदल ज्यादा मुनाफे वाले उद्योगों में लग सकते हैं.

इस विचार के साथ समस्या यह है कि यह उद्योग और कार्यबल (वर्कफोर्स) दोनों से ही तेजी से बदलने की उम्मीद रखता है, जो बात सच्चाई से मेल नहीं खाती.

जैसा कि हम पिछले अंक में देख चुके हैं, कामगार उतनी तेजी से बदलना नहीं जानते, जितना व्यापार सिद्धांत सुझाते है. उन्हें स्थानांतरित किया जाना बहुत कठिन होता है, भले ही उसके लिए आर्थिक प्रोत्साहन दिया जा रहा हो. यह उन्हें एक से दूसरे उद्योग में जाने से रोकता है, क्योंकि यह अक्सर एक नए जिले में जाने के लिए मजबूर करता है.

कंपनियां भी बहुत कम लचीलापन (बदलाव की संभावना) दिखा सकती हैं. जब अर्थशास्त्री पेटिया टोपालोवा MIT में PhD की छात्रा थीं, तब उन्होंने भारत में वैश्विक व्यापार के प्रभाव पर गहन शोध किया था. उन्होंने पाया कि एक कंपनी के लिए किसी उत्पाद को बनाने से बंद कर देना बेहद दुर्लभ था, भले ही उसके उत्पादन में कोई मुनाफा न बचा हो.

जबकि सिद्धांतों के हिसाब से नई कंपनियां ज्यादा नए उत्पाद बनाने के लिए उभर सकती हैं, व्यवहार में आमतौर पर उन्हें बैंकों से धन/लोन मिलना बहुत मुश्किल होता है. इससे उलट, पुरानी कंपनियां तब भी धन/लोन पाती रहती हैं, जब वे घिसट-घिसट कर चल रही होती हैं.
और यदि कोई नई कंपनी स्थानीय मार्केट में एक नए उत्पाद के साथ घुसने में सफल भी होती है, तो वैश्विक बाजार में उसके लिए प्रतिस्पर्धा इतनी आसान नहीं होती.

एक बात तो यह, कि एक विश्वसनीय प्रतिष्ठा बनाने में लंबा समय लगता है. वहीं एक नई कंपनी की ओर से आने वाले माल की समय पाबंद डिलिवरी या गुणवत्ता बनी रहने की गारंटी को लेकर विदेशी खरीददार सावधान रहते हैं. जैसे, विकासशील देशों की कंपनियों के साथ संदेहपूर्ण बर्ताव किया जाता है. यह एक दुष्चक्र बन सकता है. उदाहरण के लिए, यदि मिस्र के कालीन-उत्पादक समूह में कोई निवेश नहीं करता है, तो वह अपनी गुणवत्ता में सुधार नहीं कर पाएगा और (कुशल के बजाए) तेजी से बदले जा सकने वाले कामगारों को काम पर रखेगा.

व्यापार समझौते स्थानीय कामगारों को नुकसान पहुंचा सकते हैं, लेकिन संरक्षणवादी टैरिफ समस्या को हल नहीं करते हैं

आपने शायद 2018 में स्टील कामगारों से घिरे ट्रंप को यह घोषणा करते हुए तस्वीरों-वीडियो में देखा होगा कि अमेरिका, स्थानीय नौकरियों को बचाने के लिए चीन से आयातित एल्यूमिनियम और स्टील पर भारी दरें (टैरिफ) लगाएगा.

क्या यह युक्ति काम कर सकती है? खैर, स्टील कामगारों की नौकरियों को इस कदम के जरिए बचाए जाने की संभावना है. अधिक लोग स्थानीय स्टील खरीदेंगे, जिसका मतलब यह होगा कि उन कारखानों में मांग अधिक होगी, जिससे छंटनी कम होगी. अब तक सुनने में यह बहुत अच्छा लग रहा है, लेकिन यह इतना आसान नहीं है.

स्टील कामगारों से घिरे ट्रंप चीनी स्टील पर कर की घोषणा पर हस्ताक्षर करते हुए
ट्रंप के स्टील पर भारी कर के जवाब में, चीन ने घोषणा की कि वह अमेरिकी कृषि उत्पादों पर कर लगाएगा. यह देखते हुए कि चीन, अमेरिका से निर्यात होने वाली सभी फसलों और मांस का 16% खरीदता है, इसके अमेरिकी कृषि उद्योग पर गंभीर प्रभाव होंगे. हालांकि स्टील कामगारों की नौकरियां बच सकती हैं लेकिन यह खेतों में काम करने वाले कामगारों की नौकरियों की कीमत पर हो सकेगा, जो कि कृषि निर्यात के चीनी बाजारों में बहुत महंगे हो जाने से जाएंगी. इस प्रकार, ट्रंप का व्यापार युद्ध वास्तव में बहुत ही अदूरदर्शी है.

'चीन का झटका' कहे जाने वाले एक प्रभाव के तहत सस्ते चीनी आयातों से प्रतिस्पर्धा के चलते कई कारखाने, व्यवसाय से बाहर हो चुके हैं. टेनेसी का ब्रुस्टन शहर इसका एक भयावह उदाहरण पेश करता है.

ब्रुस्टन शहर को अपने 1700 लोगों को रोजगार देने वाली फैक्ट्री तब बंद करनी पड़ी, जब कपड़ों का उत्पादन मुनाफे वाला नहीं रह गया. 2000 में उसने अपने अंतिम 55 कर्मचारियों को भी खो दिया. निकाले गए कामगार अब शहर में पैसे नहीं खर्च कर सकते थे, जिसका मतलब था कि लगभग सभी स्थानीय व्यापार बंद हो गए. जो कभी एक संपन्न केंद्र था, एक भूतिया शहर में बदल गया. इस वीरानी ने, निवेशकों को वहां नए कारखाने लगाने के लिए भी हतोत्साहित किया. हमने पहले ही देखा है कि बेरोजगार कामगार नई नौकरी खोजने के लिए आसानी से दूसरे जिले में नहीं जा सकते हैं. लेकिन अगर वे यहीं रुकते हैं तो भी कोई संभावना नहीं रहती. ऐसे में वे कर ही क्या सकते हैं?

अमेरिका ने उनके लिए, जिन्होंने अपनी नौकरियां खोई हैं, व्यापार समायोजन सहायता (ट्रेड एडजस्टमेंट असिस्टेंस-TAA) कार्यक्रम नाम की एक पहल की. यह कार्यक्रम कामगारों को बेरोजगारी बीमा देता है और एक नए क्षेत्र में प्रवेश के लिए (आवश्यक) ट्रेनिंग और मदद देता है. यह कामगारों को दूसरे स्थान पर बसने के लिए वित्तीय सहायता भी देता है. कार्यक्रम में सभी सही तत्व शामिल हैं, लेकिन इसे जारी किया जाने वाला फंड बेहद कम है.
वैश्विक व्यापार के सताए लोगों को संरक्षण की जरूरत है, लेकिन साधारण ढंग से कर की दर (टैरिफ) बढ़ाने से कोई हल नहीं मिल सकता. इसके बजाए, हमें हाल ही में बेरोजगार हुए लोगों को खुद को झटके के अनुकूल बनाने और अपने पैरों पर वापस खड़ा के लिए पर्याप्त संसाधनों का निवेश करना होगा.

किताब के बारे में-

इस किताब में दोनों लेखक तर्क करते हैं कि अर्थशास्त्र कई समस्याओं को लेकर नया दृष्टिकोण पेश कर उन्हें सुलझाने में हमारी मदद सकता है. चाहे वह जलवायु परिवर्तन का हल बिना गरीबों को नुकसान पहुंचाए हो, या बढ़ती हुए असमानता के चलते उभरने वाली सामाजिक समस्याओं से निपटना हो, या वैश्विक व्यापार, और प्रवासियों को लेकर फैलाया गया डर जैसे मुद्दे.

अभिजीत बनर्जी और एस्थर डुफ्लो ने 2019 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार डेलपलमेंट इकॉनमिक्स के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए पाया. उनकी इससे पहले आई किताब 'पुअर इकॉनमिक्स' (Poor Economics- गरीब अर्थशास्त्र) एक शुरुआती खोज थी कि गरीबी क्या होती है और कैसे सबसे इससे जूझते समुदायों को सबसे प्रभावशाली तरीके से मदद पहुंचाई जाए. ये दोनों ही MIT में प्रोफेसर हैं और बहुत से अकादमिक सम्मान और पुरस्कार पा चुके हैं.

अनुवाद के बारे में-

भारतीय मूल के अर्थशास्त्री अभिजीत वी. बनर्जी और उनकी साथी एस्थर डुफ्लो की 2019 में उन्हें नोबेल मिलने के तुरंत बाद आई किताब गुड इकॉनमिक्स फॉर हार्ड टाइम्स (Good Economics for Hard Times) बहुत चर्चित रही. मैं इस किताब के प्रत्येक चैप्टर का संक्षिप्त अनुवाद पेश करने की कोशिश कर रहा हूं. अभिजीत के लिखे हुए को अनुवाद करने की मेरी इच्छा इस किताब के पहले चैप्टर को पढ़ने के बाद ही हुई. बता दूं कि इसके संक्षिप्त मुझे ब्लिंकिस्ट (Blinkist) नाम की एक ऐप पर मिले. बर्लिन, जर्मनी से संचालित इस ऐप का इसे संक्षिप्त रूप में उपलब्ध कराने के लिए आभार जताता हूं. अंग्रेजी में जिन्हें समस्या न हो वे इस ऐप पर अच्छी किताबों के संक्षिप्त पढ़ सकते हैं और उनका ऑडियो भी सुन सकते हैं. एक छोटी सी टीम के साथ काम करने वाली इस ऐप का इस्तेमाल मैं पिछले 2 सालों से लगातार कर रहा हूं और मुझे इससे बहुत फायदा मिला है. वैश्विक क्वारंटाइन के चलते विशेष ऑफर के तहत 25 अप्रैल तक आप इस पर उपलब्ध किसी भी किताब को पढ़-सुन सकते हैं. जिसके बाद से यह प्रतिदिन एक किताब ही मुफ्त में पढ़ने-सुनने को देगी.

(नोट: कल इस किताब के अगले दो चैप्टर का हिंदी अनुवाद पेश करने की मेरी कोशिश होगी. आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

गुड इकॉनमिक्स फॉर हार्ड टाइम्स: अभिजीत बनर्जी-एस्थर डुफ्लो की किताब का हिंदी में संक्षिप्त अनुवाद- माइग्रेशन क्या वाकई समस्या है?

अभिजीत बनर्जी और एस्थर डुफ्लो की यह किताब दुनिया की तमाम परेशानियों का हल अर्थशास्त्र में ढूंढती है

राजनेताओं ने प्रवासियों के बारे में झूठ बोलकर जनता को गुमराह किया है- FROM THE MOUTH OF THE SHARK

आज प्रवास (Migration)से अधिक विवादास्पद कोई मुद्दा नहीं है. डोनाल्ड ट्रंप जैसे राजनेताओं ने भूखे अप्रवासियों की भीड़ से घिरे हुए अपने देशों की तस्वीर पेश की है, जिसमें ये (अप्रवासी) संसाधनों को नष्ट कर देंगे और स्थानीय लोगों की पहचान को खतरे में डाल देंगे.

राजनेता आपूर्ति और मांग के सरल आर्थिक मॉडल का उपयोग यह समझाने के लिए करते हैं कि माइग्रेशन इतनी बड़ी समस्या क्यों है. ऐसा तर्क किया जाता है कि अप्रवासी अमेरिका जैसे प्रथम विश्व के देश की वित्तीय धन से आकर्षित होंगे, और इसलिए वहां बेहद बड़ी तादाद में वहां पहुंचने लगेंगे. जब वे वहां पहुंचेंगे तो सस्ते श्रम की अधिक आपूर्ति हो जाएगी, जिससे वेतन में कमी आएगी और स्थानीय श्रमिक अपनी नौकरी खो देंगे.

यह तर्क भले ही तर्कसंगत लगता हो लेकिन यह सबूतों के खिलाफ नहीं टिक सकता है.

एक बात तो यह, कि यह सच नहीं है कि अधिक धन मिलने का वादा प्रवासियों को उनके गृह देश को छोड़ने के लिए प्रेरित करने के लिए काफी होता है. अगर यह सच होता तो 2013 में जब ग्रीक अर्थव्यवस्था बुरी हालत में थी तब ग्रीस की आबादी का एक बड़ा हिस्सा, धनी यूरोपीय देशों में चला गया होता. उन्हें कोई नहीं रोकता, ग्रीस के यूरोपियन यूनियन का सदस्य होने के चलते, नागरिकों के लिए पास के अमीर देशों में चले जाना पूरी तरह से कानूनी होता. लेकिन केवल 3 लाख 50 हजार लोग यानि लगभग कुल जनसंख्या का 3% ही दूसरी जगहों पर जाकर बसे.

बल्कि अध्ययनों से पता चला है कि आमतौर पर लोग अपने ही देश में दूसरी जगह जाकर बसने के लिए अनिच्छुक होते हैं. उदाहरण के तौर पर, एक अध्ययन में पाया गया कि बिहार और उत्तर प्रदेश में रहने वाले भारतीय अगर किसी शहर में चले जाते हैं तो उनकी आय दोगुनी हो जाएगी. लेकिन इन इलाकों में 10 करोड़ सबसे गरीब लोगों का केवल 1% का छोटा सा हिस्सा ही वास्तव में ऐसा करता है.

ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों को अपने घर में रखने की बहुत सी आकर्षक वजहें होती हैं- परिवार के संबंध, सपोर्ट नेटवर्क और अज्ञात का डर, उनमें से सिर्फ कुछ वजहें हैं.

कागजों पर इसे, बिना प्रमाण सही मान लिया जाता है कि केवल पैसा ही एक अच्छा प्रेरक होगा. कौन अपनी कमाई को दोगुना नहीं करना चाहेगा? लेकिन ऐसा सरलीकृत मॉडल, मानव स्वभाव की बारीक प्रकृति का विवरण नहीं देता है. आप बदलाव के डर को कैसे नापते हैं? या आपको अपने बीमार माता-पिता की देखभाल करने के लिए घर पर रहने की जरूरत है? या आप अपने बच्चों को ग्रामीण इलाके में ताजी हवा के साथ बढ़ने देने की इच्छा रखते हैं?
जब प्रवास की बात आती है तो राजनेता इसे पूरी तरह से गलत समझते हैं. हमें लोगों को एक से दूसरी जगह स्थानांतरित होने से रोकने की जरूरत नहीं है. बल्कि हमें उन्हें पलायन करने के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत है. क्योंकि जैसा कि हम अगले अंक में देखेंगे, माइग्रेशन अकुशल स्थानीय श्रमिकों के लिए अच्छी चीज है.

अप्रवासन (Immigration) स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में मदद करता है और देशी श्रमिकों को नए अवसर प्रदान करता है

एक पल के लिए कल्पना कीजिए कि आप एक वेटर हैं और आपका शहर अप्रवासियों की आबादी से भर गया है, जैसा कि कुछ राजनेता चेतावनी देते हैं कि ऐसा होगा. ऐसी कल्पना करते हुए आप थोड़ा चिंतित होंगे कि आपके पड़ोसी आपकी नौकरी से प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं लेकिन फिर आप यह भी ध्यान देंगे कि उनके आने के बाद से आपका रेस्टोरेंट कितना व्यस्त हो चुका है.

अप्रवासी अपने साथ केवल श्रम की आपूर्ति लेकर नहीं आते. वे सेवाओं के लिए मांग भी लेकर आते हैं. वे कैफे और दुकानों जैसे व्यवसायों में पैसे लगाते हैं, जहां कम-कुशल श्रमिक कर्मचारी रखे जाते हैं.

सबसे उद्यमी प्रवासी अपने स्वयं के व्यवसाय स्थापित करते हैं, जो आगे चलकर रोजगार के अवसर पैदा करते हैं. दरअसल, 2017 में शीर्ष फॉर्च्यून 500 कंपनियों के अध्ययन से पता चला कि अमेरिका में सबसे अधिक कमाने वाली 43% कंपनियों की स्थापना अप्रवासियों या उनके वंशजों ने की थी. स्टीव जॉब्स जैसे लोग, जिनके जैविक पिता सीरिया से आए थे. या हेनरी फोर्ड, जो एक आयरिश अप्रवासी का वंशज था.

इसलिए यह धारणा कि अप्रवासी स्थानीय कम-कुशल श्रमिकों के बाजार को नष्ट कर देते हैं, सच नहीं है. लेकिन यह केवल इसलिए नहीं है कि वे अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन देते हैं. इसका एक अन्य कारण यह यह भी है कि अप्रवासी स्थानीय श्रमिकों और सामाजिक नेटवर्क और स्थानीय ज्ञान से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते.

आपूर्ति और मांग मॉडल मानता है कि नियोक्ता हमेशा सबसे सस्ता कर्मचारी रखना चाहते हैं, इसलिए अगर अप्रवासी अपनी सेवाएं कम दाम में देता है तो स्थानीय लोग अपनी नौकरी खो देंगे. लेकिन एक कर्मी को नौकरी पर रखना एक तरबूज खरीदने जैसा नहीं है. एक नियोक्ता के पास सोचने के लिए मूल्य से अधिक गंभीर चीजें होती हैं. उन्हें यह जानने की जरूरत होती है कि कर्मी अच्छा प्रदर्शन करेगा और विश्वसनीय होगा. अन्यथा, उन्हें उसे निकालना पड़ेगा, जो मंहगा और अप्रिय हो सकता है.

इन वजहों से, इप्लॉयर हमेशा उन लोगों को काम पर रखना पसंद करते हैं, जिन्हें वे जानते हैं या जो किसी मजबूत सिफारिश के साथ आते हैं. स्थानीय, जिन्होंने क्षेत्र में पहले से ही काम किया हो, इप्लॉयर्स की निगाहों में बेहतर होते हैं, भले ही वे इसके लिए ज्यादा पैसे लें.

स्थानीय लोगों के पास अक्सर ऐसे कौशल होते हैं, जो हाल ही में आने वालों के पास नहीं होते, जैसे धाराप्रवाह उस भाषा में बोलना. एक डेनिश अध्ययन से पता चला है कि अप्रवासियों के उच्च प्रतिशत वाले इलाकों में, डेनिश कर्मचारियों के अधिक कुशल नौकरियों के लिए शारीरिक श्रम के कामों को छोड़ने की संभावना अधिक थी.

ऐसा इसलिए क्योंकि अप्रवासियों को अक्सर केवल वही काम करने को मिलते हैं, जिन्हें करने के लिए स्थानीय लोग तैयार नहीं होते, जैसे साफ-सफाई, घास काटना या बच्चों की देख-रेख करना. इन क्षेत्रों में आपूर्ति (की अधिकता) वाकई मजदूरी को कम कर सकती है लेकिन यह भी श्रमिकों के लिए लाभकारी ही है. उदाहरण के लिए यदि आप एक कम आय वाली स्थानीय मां हैं, तो सस्ते चाइल्ड केयर होने से आपके लिए बाहर जाना और पैसे कमाना आसान हो जाएगा.

किताब के बारे में-

इस किताब में दोनों लेखक तर्क करते हैं कि अर्थशास्त्र कई समस्याओं को लेकर नया दृष्टिकोण पेश कर उन्हें सुलझाने में हमारी मदद सकता है. चाहे वह जलवायु परिवर्तन का हल बिना गरीबों को नुकसान पहुंचाए हो, या बढ़ती हुए असमानता के चलते उभरने वाली सामाजिक समस्याओं से निपटना हो, या वैश्विक व्यापार, और प्रवासियों को लेकर फैलाया गया डर जैसे मुद्दे.

अभिजीत बनर्जी और एस्थर डुफ्लो ने 2019 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार डेलपलमेंट इकॉनमिक्स के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए पाया. उनकी इससे पहले आई किताब 'पुअर इकॉनमिक्स' (Poor Economics- गरीब अर्थशास्त्र) एक शुरुआती खोज थी कि गरीबी क्या होती है और कैसे सबसे इससे जूझते समुदायों को सबसे प्रभावशाली तरीके से मदद पहुंचाई जाए. ये दोनों ही MIT में प्रोफेसर हैं और बहुत से अकादमिक सम्मान और पुरस्कार पा चुके हैं.

अनुवाद के बारे में-

भारतीय मूल के अर्थशास्त्री अभिजीत वी. बनर्जी और उनकी साथी एस्थर डुफ्लो की 2019 में उन्हें नोबेल मिलने के तुरंत बाद आई किताब गुड इकॉनमिक्स फॉर हार्ड टाइम्स (Good Economics for Hard Times) बहुत चर्चित रही. मैं इस किताब के प्रत्येक चैप्टर का संक्षिप्त अनुवाद पेश करने की कोशिश कर रहा हूं. अभिजीत के लिखे हुए को अनुवाद करने की मेरी इच्छा इस किताब के पहले चैप्टर को पढ़ने के बाद ही हुई. बता दूं कि इसके संक्षिप्त मुझे ब्लिंकिस्ट (Blinkist) नाम की एक ऐप पर मिले. बर्लिन, जर्मनी से संचालित इस ऐप का इसे संक्षिप्त रूप में उपलब्ध कराने के लिए आभार जताता हूं. अंग्रेजी में जिन्हें समस्या न हो वे इस ऐप पर अच्छी किताबों के संक्षिप्त पढ़ सकते हैं और उनका ऑडियो भी सुन सकते हैं. एक छोटी सी टीम के साथ काम करने वाली इस ऐप का इस्तेमाल मैं पिछले 2 सालों से लगातार कर रहा हूं और मुझे इससे बहुत फायदा मिला है. वैश्विक क्वारंटाइन के चलते विशेष ऑफर के तहत 25 अप्रैल तक आप इस पर उपलब्ध किसी भी किताब को पढ़-सुन सकते हैं. जिसके बाद से यह प्रतिदिन एक किताब ही मुफ्त में पढ़ने-सुनने को देगी.

(नोट: कल इस किताब के अगले दो चैप्टर का हिंदी अनुवाद पेश करने की मेरी कोशिश होगी. आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Monday, April 20, 2020

गुड इकॉनमिक्स फॉर हार्ड टाइम्स: अभिजीत बनर्जी-एस्थर डुफ्लो की किताब का हिंदी में संक्षिप्त अनुवाद- अर्थशास्त्रियों पर विश्वास

अभिजीत बनर्जी और एस्थर डुफ्लो की यह किताब दुनिया की तमाम परेशानियों का हल अर्थशास्त्र में ढूंढती है
भारतीय मूल के अर्थशास्त्री अभिजीत वी. बनर्जी और उनकी साथी एस्थर डुफ्लो की 2019 में उन्हें नोबेल मिलने के तुरंत बाद आई किताब गुड इकॉनमिक्स फॉर हार्ड टाइम्स (Good Economics for Hard Times) बहुत चर्चित रही. मैं इस किताब के प्रत्येक चैप्टर का संक्षिप्त अनुवाद पेश करने की कोशिश कर रहा हूं. अभिजीत के लिखे हुए को अनुवाद करने की मेरी इच्छा इस किताब के पहले चैप्टर को पढ़ने के बाद ही हुई. बता दूं कि इसके संक्षिप्त मुझे ब्लिंकिस्ट (Blinkist) नाम की एक ऐप पर मिले. बर्लिन, जर्मनी से संचालित इस ऐप का इसे संक्षिप्त रूप में उपलब्ध कराने के लिए आभार जताता हूं. अंग्रेजी में जिन्हें समस्या न हो वे इस ऐप पर अच्छी किताबों के संक्षिप्त पढ़ सकते हैं और उनका ऑडियो भी सुन सकते हैं. एक छोटी सी टीम के साथ काम करने वाली इस ऐप का इस्तेमाल मैं पिछले 2 सालों से लगातार कर रहा हूं और मुझे इससे बहुत फायदा मिला है. वैश्विक क्वारंटाइन के चलते विशेष ऑफर के तहत 25 अप्रैल तक आप इस पर उपलब्ध किसी भी किताब को पढ़-सुन सकते हैं. जिसके बाद से यह प्रतिदिन एक किताब ही मुफ्त में पढ़ने-सुनने को देगी.

अब किताब के बारे में-

इस किताब में दोनों लेखक तर्क करते हैं कि अर्थशास्त्र कई समस्याओं को लेकर नया दृष्टिकोण पेश कर उन्हें सुलझाने में हमारी मदद सकता है. चाहे वह जलवायु परिवर्तन का हल बिना गरीबों को नुकसान पहुंचाए हो, या बढ़ती हुए असमानता के चलते उभरने वाली सामाजिक समस्याओं से निपटना हो, या वैश्विक व्यापार, और प्रवासियों को लेकर फैलाया गया डर जैसे मुद्दे.

अभिजीत बनर्जी और एस्थर डुफ्लो ने 2019 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार डेलपलमेंट इकॉनमिक्स के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए पाया. उनकी इससे पहले आई किताब 'पुअर इकॉनमिक्स' (Poor Economics- गरीब अर्थशास्त्र) एक शुरुआती खोज थी कि गरीबी क्या होती है और कैसे सबसे इससे जूझते समुदायों को सबसे प्रभावशाली तरीके से मदद पहुंचाई जाए. ये दोनों ही MIT में प्रोफेसर हैं और बहुत से अकादमिक सम्मान और पुरस्कार पा चुके हैं.

प्रस्तावना: अर्थशास्त्र किस तरह दुनिया पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है?

दुनिया में इतनी ज्यादा चीजें गलत होती दिखती हैं कि आपको इन चीजों से अपना पल्ला झाड़ लेना ही बेहतर लगता है. हम सुनते रहते हैं कि प्रवासियों की समस्या नियंत्रण से बाहर है, कि सामान पर ऊंचे आयात कर लगाने से अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ेगा, कि अगर हमने पर्यावरण को बचाया तो इसका मतलब लोगों की नौकरियों का बलिदान देना होगा, लेकिन अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो हम खत्म हो जाएंगे.

यह कयामत के दिन की तस्वीरें पेश करने वाला डरावना शोरगुल है. और जो चीज इसे और बुरा बना देती है वह यह है कि हमें अक्सर पता नहीं होता कि हमें किस पर भरोसा करना है. किसी ठोस बहस में शामिल होने के बजाए राजनीतिज्ञ भी एक-दूसरे पर चीखते-चिल्लाते दिखते हैं.

इस शोरगुल के बीच, हम कभी-कभी अर्थशास्त्रियों को टीवी पर भयानक भविष्यवाणियां करते, या किसी न किसी राजनीतिक उम्मीदवार की नीतियों की आलोचना करते देखते हैं. सीधे तौर पर अर्थशास्त्री भेदभाव करते, किसी व्यापार या राजनीतिक विचारधारा से जुड़े नज़र आते हैं. हम सच में नहीं समझ पाते, वे क्या करते हैं, या अपने निष्कर्षों तक किस तरह पहुंचते हैं.

यहां आपके पास अर्थशास्त्र पर फिर से एक बार विश्वास कर पाने का मौका है. नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्रियों के व्यावहारिक दृष्टि के जरिए आप सीखेंगे कि राजनीतिज्ञों द्वारा जिन अर्थशास्त्र के सिद्धांतों की बहुत तारीफ की जाती है, वे कमियों से भरे हुए हैं और जिन सामाजिक समस्याओं को सबसे ज्यादा दुसाध्य माना जाता है, उनके सामान्य अर्थशास्त्रीय हल हो सकते हैं.

इस किताब से आप यह भी सीखेंगे कि-


  • क्यों चीनी स्टील पर टैरिफ लगाने के चलते अमेरिकी किसानों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी
  • कैसे रोबोट अकाउंटिंग की नौकरी तो छीन सकते हैं लेकिन कुत्तों को नहीं घुमा सकते; और
  • कैसे प्रवासियों की बड़ी तादाद स्थानीय लोगों के लिए नौकरी की संभावनाओं में सुधार कर सकती है

पहला अध्याय- MEGA: Make Economics Great Again

अर्थशास्त्री हमें दुनिया की सबसे गंभीर समस्याओं को हल करने में मदद कर सकते हैं लेकिन पहले उन्हें हमारा विश्वास हासिल करना होगा.

एक सर्वेक्षण में लोगों से पूछा गया कि वे अलग-अलग पेशे के लोगों की राय पर कितना भरोसा करते हैं. इसमें नर्सें सबसे आगे रहीं और बिना किसी आश्चर्य के राजनेता सबसे नीचे. आश्चर्य की बात यह है कि अर्थशास्त्रियों को राजनीतिज्ञों से केवल थोड़ा ऊपर रखा गया है. उनकी राय को बहुत अविश्वसनीय माना जाता है.

लेकिन क्यों? शायद इसलिए क्योंकि जिन मुखर अर्थशास्त्रियों को हम न्यूज में देखते हैं, वे सबसे भरोसेमंद नहीं हैं. अक्सर, वे एक कंपनी द्वारा नौकरी पर रखे गए होते हैं और बाजार के हितों की रक्षा के लिए उनके पास एक निश्चित एजेंडा होता है.

इससे इतर, वे एक्सट्रीम विचारों वाले अकादमिक अर्थशास्त्री भी हो सकते हैं. चाहे दक्षिणपंथी हो या वामपंथी, एक विचारधारा की कुल्हाड़ी से विषय को काटने वाले हमेशा सबसे बारीक, भरोसेमंद विश्लेषण नहीं देते. यहां तक कि अक्सर अच्छे अर्थशास्त्री भी तर्कों और सबूतों को इस तरह समझाने के लिए कि अन्य लोग भी समझ सकें, समय नहीं लगाते हैं. इससे भी बुरा तब होता है, जब अकादमिक अर्थशास्त्रियों की राय साधारण समझ से अलग और अतार्किक लगती है क्योंकि उनके विचार राजनेताओं द्वारा बताए गए तरीकों से मेल नहीं खाते हैं.

यह तथ्य कि लोग अर्थशास्त्रियों पर भरोसा नहीं करते, समस्या पैदा करने वाला है. क्यों? क्योंकि वे हमें दुनिया की कुछ सबसे महत्वपूर्ण समस्याओं को हल करने की जानकारी दे सकते हैं. ऐसे में अर्थशास्त्री कैसे हमारा विश्वास जीतना शुरू कर सकते हैं और मुद्दों पर किस तरह ऐसे बात कर सकते हैं, जो कि हमें समझ में आए?

शुरुआत के लिए उन्हें अपनी विचार प्रक्रिया और उसके निष्कर्षों को साझा करने के लिए तैयार रहना होगा. जिस डेटा का वे सबूत के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, उन तक हम पहुंच सकें और जान सकें कि वे इन सबूत के बारे में कैसे सोचते हैं, तो हमारी उन पर विश्वास करने की संभावना बढ़ जाती है.
इससे भी ज्यादा जरूरी बात यह है कि, उन्हें यह स्वीकार करने के लिए तैयार रहना होगा कि वे भी चूक सकते हैं. आज की राजनीतिक और आर्थिक बहस सिर्फ एक चिल्लाने का मुकाबला बन चुकी है, जहां दोनों तरफ के लोग अपने-अपने दृष्टिकोण से चिपके रहते हैं. अर्थशास्त्रियों को खुले दिमाग से सबूत देखने के लिए तैयार रहना होगा, और जहां जरूरी हो वहां अपनी राय में बदलाव करने के साथ जहां गलती हो उसे स्वीकार करना होगा.

(नोट: कल इस किताब के अगले दो चैप्टर का हिंदी अनुवाद पेश करने की मेरी कोशिश होगी. आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Saturday, April 18, 2020

वो टाइमटेबल जो कभी फेल नहीं होता, ऐसे बनाया जाता है

किसी भी टाइमटेबल में निरंतरता जरूर होनी चाहिए
12वीं के तुरंत बाद की बात है. उस दौर की, जो मेरे जीवन में अब तक सबसे निराशाजनक रहा. मैं 12वीं में साइंस को अपने साथ घसीट रहा था और कविताओं-गीतों-गज़लों आदि में रुचि ले रहा था. लेकिन 12वीं में बहुत कम मार्क्स आने के बाद मैंने तय किया कि अब अपने और साइंस दोने के साथ ही अधिक अन्याय नहीं किया जाएगा. इसके साथ ही मैंने ह्यूमैनिटीज को अपने मुक्ति देने वाले रास्ते के तौर पर पाया. लेकिन असल समस्या यह थी कि मैं कभी बहुत संगठित रहकर पढ़ा ही नहीं था. हमेशा मैंने पढ़ाई किसी न किसी दबाव या डर से की थी. और शायद जब 14-17 की अवस्था में पढ़ाई में स्वत: लग सकता था, तब मेरे पास फिजिक्स, केमेस्ट्री और मैथ्स जैसे सब्जेक्ट थे, जो मेरी रूह कंपा देते थे. मैं यहां स्वीकार करूंगा कि मुझे बहुत ही औसत टीचर भी मिले, जो किसी काम के नहीं थे.

खुद से संवाद कीजिए, अपनी कई कमियों को सुधारने में मिलेगी मदद

बहरहाल, जब 12वीं फेल नहीं हुआ और इतने कम नंबरों से पास हुआ कि बता नहीं सकता था, उसके बाद मैंने खुद से अपने पर काम करने के बारे में फैसला किया. मैंने अपने को यह सबसे पहले साफ किया कि देखो सुधरने का और कई चीजों को जीवन में बदलने का समय आ चुका है. कहीं सुना था कि पिछली शताब्दी में यूरोप के लोग प्रेम का अहसास पाने के लिए खुद को ही प्रेमपत्र लिख देते थे, जिसे यूं लिखा जाता था कि जैसे किसी प्रेमी/प्रेमिका ने उसे लिखा हो. फिर जब वह पत्र उनके पास लौटकर आता तो डाकिए से उसे ऐसे शर्माते हुए रिसीव करते जैसे वाकई उसे किसी प्रेमी/प्रेमिका ने लिखा हो. ऐसा ही कुछ प्रयोग मैंने अपने साथ किया और खुद को एक भ्रम में रखा. मैंने अपना एक आदर्श बनाया, जिससे सभी चीजें सकारात्मक और सही तरह से किया जाना अपेक्षित था और उससे अपने असली अहम का लिखित संवाद कराया. इसके लिए मैंने पत्र पोस्ट नहीं किए बल्कि अपने आदर्श के लिखे पत्र, अपनी वास्तविकता को सीधे तौर पर पढ़ाए.

मुझे लगता आया है कि संगति का खासा असर आपपर होता है. ऐसे में मैंने अपने तमाम दोस्तों की संगति छोड़, खुद को अपने आदर्श की संगति में डाला. और इसका मुझे फायदा भी हुआ. लेकिन इस बीच सबसे कठिन जो रहा, वो था पढ़ने की आदत डालना. जैसा मैंने बताया कि मैंने ग्रेजुएशन में साइंस को त्यागते हुए ह्यूमैनिटीज के विषय पढ़े. लेकिन यह जितना सोचा गया, उतना आसान नहीं रहा. पॉलिटिकल साइंस का मुझे P भी नहीं समझ आता था. फिर भी पूरे मनोयोग से इसके समझ आने के लिए रणनीतियां बनाता रहा. अभी तो ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन के स्तर पर कोचिंग भी दे सकता हूं. लेकिन सब्जेक्ट में घुसपैठ के लिए मैंने हर लाइन को लिख-लिख कर पढ़ना शुरू किया.

सारे ही प्रयासों में निरतरंता स्थापित करना पाना बहुत जरूरी बात

लेकिन सारे प्रयासों के बावजूद, एक चीज के बिना सारा पढ़ा-लिखा बर्बाद हो रहा था. और वह एक चीज थी, निरंतरता. मैं यह स्वीकार करना चाहूंगा कि यही मेरी अब तक कि सबसे बड़ी उपलब्धि रहा है. और यह निरंतरता पैदा हुई 'डेली डे डिजाइनर' नाम के एक टूल से. जिसे मैं शॉर्ट में 'डी3' कहा करता था. इसमें कुछ खास नहीं होता था. मैं लिखित में अपने अगले दिन की प्राथमिकताओं को सोने से पहले लिख लेता था. साथ ही उस दिन के बारे में एक टिप्पणी भी दर्ज करता चलता था ताकि खुद को स्पष्ट रहे कि मेरे प्रयास काम आ रहे हैं या नहीं.
उतार चढ़ाव दिनों के हिसाब से आते रहेंगे लेकिन आप इनका हिसाब रखने की कोशिश करें तो अच्छा
निरंतरता सिर्फ कई दिनों तक कुछ करते जाना नहीं है. बल्कि एक खास लक्ष्य के साथ और अपने प्रयासों का मूल्यांकन करते हुए कई दिनों तक एक ही विषय पर काम करना है. ऐसे में अब मेरा सालों-साल एक ही विषय पर जुटे रहना मुझे जल्दी सीखने में मदद करता है. इसके अलावा सबसे बड़ी बात की वह मुझे बहुत ज्यादा सुकून देता है. इसलिए मैं यहां पर कुछ बिंदुओं में इसके पीछे अपने कदमों का खुलासा कर रहा हूं-

1. आपको सबसे पहले अपनी प्राथमिकता के कामों की लिस्ट बनानी है. और बाकी कुछ भी करने से पहले उन्हें कर लेना है. जरूरी है कि यह लिस्ट बेहद सोच-समझकर बनाई जाए. ये लिस्ट क्या किया जाए वाले कामों की होने के बजाए, क्या किया जाना है की होनी चाहिए. वरना ये तय है कि आप वे काम नहीं कर पाएंगे.

2. तय करें कि आपके मिजाज के हिसाब से किसी दिन के कामों में सबसे कठिन क्या है? करते समय क्या सबसे ज्यादा समय लेने वाला है. इसके जवाब में जो काम सामने आए, आप सबसे पहले उसे करें. जैसे फिलहाल लिखना मेरे लिए सबसे ज्यादा मुश्किल हो रहा था तो मैं सबसे पहले लिख रहा हूं और उसके बाद ही कोई काम करता हूं.

3. किसी खास दिन में करने को सीमित काम ही अपने पास रखें. बहुत ज्यादा काम किसी दिन के लिए तय कर लेने से आपको रोजमर्रा के काम करने में बहुत परेशानी होगी और कामों के हो जाने से मिलने वाली संतुष्टि के बजाए आपको असंतुष्टि ही होगी.

4. कोशिश करें कि अपनी सफलता और असफलता दर्ज करें. इससे आपको न सिर्फ अगले दिन और अच्छा करने का प्रोत्साहन मिलेगा बल्कि कुछ मुश्किल कर लेने पर खुशी भी होगी. मैं तो अपने आपको डेली 10 में से कुछ प्वाइंट्स दिया करता था.

5. उठने और सोने के समय को नियत रखिए, यह अगर गड़बड़ होता है तो पूरे दिन का ढांचा और प्लानिंग गड़बड़ा जाती है और आपको उसमें बदलाव करने पड़ते हैं.

6. दोस्तों और साथियों के साथ आगे की प्लानिंग को भी ज्यादातर तय रखने की कोशिश करें. या एक समय नियत कर लें और उन्हें भी इसके बारे में बता दें. अपनी इस प्रायोगिक जीवनशैली के बारे में सभी को जानने दें, छिपाएं नहीं. आपका विश्वास इससे खुद पर बढ़ेगा.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Friday, April 17, 2020

क्या हमउम्र लोग बिना किसी लालच, एक ही मकसद के लिए कर सकते हैं काम? हां, कठफोड़वा ने किया

उबंटू दक्षिणी अफ्रीकी देशों में प्रचलित एक विचार है
आपने यूं हंसी-मजाक के लिए, किसी ट्रिप पर जाने के लिए, पार्टी के लिए, ट्रेक पर जाने के लिए तो एक ही उम्र के लोगों को साथ आते देखा होगा लेकिन इस देश में विरले ही होता है कि बिना संस्थागत प्रयास के ऐसा संभव हो कि एक ही उम्र के लोग साथ आकर लिखने-पढ़ने के लिए कोई काम करें, वह भी तब जब वे दोस्त न हों (बाद में भले ही दोस्त बन जाएँ). मैंने अपने से अधिक उम्र वालों से अक्सर ऐसी बातें सुनी हैं कि मेरे जो दोस्त थे, वे मेरे साथ अब संपर्क में नहीं हैं. इसके साथ ही वे ऐसा होने के पीछे तल्ख वजहें भी बताते हैं. यह नॉर्मल भी लगता है. लेकिन अगर वे यह कहते हैं कि जो कभी उनके बहुत करीबी थे और आज उनके विरोधी हैं तो थोड़ा अजीब भी लगता है. ऐसे में दोनों ही ओर से कहीं न कहीं चूक हुई है. आज इन्हीं चूक पर बात करेंगे.

करीब तीन साल के मुक्त विचारों के लिए काम कर रहा समूह

इससे जुड़ी बातें मेरे पर्सनल एक्सपीरियंस पर आधारित हैं. मैंने 2017 के आखिरी 6 महीनों में एक ग्रुप बनाया. मैंने लगातार उन लोगों से बात की जो अच्छा लिख सकते थे और जिनमें मुझे नयापन लगता था और उनसे इस ग्रुप में शामिल होने को कहा. लेकिन इसमें खास बात यह थी कि व्यक्तिगत स्तर पर मैं उनमें से सिर्फ 1 को अच्छे से जानता था और हम दोनों की करीब-करीब रोज़ की बातचीत वाली दोस्ती थी. बाकी 3 के साथ मेरी चलते-फिरते की जान-पहचान थी. हम सभी पांच का एक ही मकसद था एक वेबसाइट चलाना, जिसका नाम कठफोड़वा है. शुरुआती दिनों में मैंने और उन सभी ने उसपर बहुत मेहनत की. हालांकि वेबसाइट चली नहीं लेकिन यह ग्रुप चला. इस कोर ग्रुप का एक आउटर ग्रुप भी था, जिसमें दसियों लोग शामिल थे, खास बात यह है कि वह आउटर ग्रुप भी काफी हद तक बाकी है. लेकिन असली सफलता कोर ग्रुप की गतिविधियां रही हैं. हम पांचों शुरुआती दौर से अब बहुत आगे निकल चुके हैं. हमारे बीच में जबरदस्त असहमतियां हैं लेकिन कभी लड़ाई नहीं हुई. हममें से अधिकतर लगातार जबरदस्त तरीके से पढ़ने और लिखने में लगे हुए हैं और बाकी लगातार उनके विचारों की, उनके पढ़े हुए के आयाम निकालने की कोशिश करते रहते हैं और सामूहिक तौर पर यह पूरी तरह से सफल प्रयोग है.

दक्षिणी अफ्रीकी देशों में बहुचर्चित है उबंटू का विचार

इसकी वजहें क्या हैं? इसकी वजह है 'उबंटू'. वैसे उबंटू का साधारण अर्थ बताया जाता है, 'मैं हूं क्योंकि हम हैं' लेकिन इसका वास्तविक मतलब इससे कहीं ज्यादा वृहद और कॉम्पलेक्स है. दक्षिणी अफ्रीकी देशों में इस विचारधारा का खासा चलन है. और यह 1980-90 के दौर में काफी चर्चित हुई. नेल्सन मंडेला के 1994 में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने के बाद इसे अफ्रीकी देशों के बाहर भी जाना गया. जिम्बाब्वे में पहले से राजनीतिक रूप से स्वीकार्य इस विचार को दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद-नस्लभेद विरोधी आंदोलन में राजनीतिक मान्यता मिली. जिसके बाद बने अंतरिम संविधान (1993) में इसे यूं शामिल किया गया, "एक-दूसरे को समझने की जरूरत है-प्रतिशोध की नहीं, प्रतिपूर्ति की जरूरत है-बदले की नहीं, उबंटू की जरूरत है-जुल्म की नहीं."

उबंटू का पालन करते हुए प्रतिस्पर्धा कहीं खो जाती है

तो हम सबने ही उबंटू का पालन किया है. हालांकि पालन हमने पहले कर लिया और इसके बारे में विस्तार से बाद में जाना. या यूं कह लें कि जिन तरीकों को हम प्रैक्टिस में ला रहे थे उन्हें बाद में हमने उबंटू के तौर पर पहचाना. पहले सिर्फ इसका नाम भर सुना था और इसकी अफ्रीकी जड़ों के बारे में जानते थे. हमने एक-दूसरे की स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार किया. हमने एक-दूसरे के अलग व्यक्तित्व और हुनर को सम्मान दिया. इस दौरान हमारे पक्ष में एक बात यह हुई कि लगभग हम सभी अलग-अलग रोजगार के क्षेत्र में हैं, इसलिए प्रतिस्पर्धा की कोई भावना ही नहीं है. वैसे असलियत तो यह है कि जब आपने सामने वाले की खासियतों को स्वीकार कर लेते हैं तो आप उसकी यूनिकनेस को भी समझते हैं. ऐसे में प्रतिस्पर्धा की कोई बात ही नहीं रह जाती. बल्कि आप चाहते हैं कि आपके बीच में ज्ञान का आदान-प्रदान होता रहे ताकि आप अपने-आप में ही कूप-मंडूक बनकर न रह जाएं बल्कि दूसरे स्वतंत्र तौर पर किसी विषय पर कैसा सोच रहे हैं, उससे भी लाभ ले सकें. हम रोज़ ही किसी न किसी विषय पर लड़ रहे होते हैं लेकिन इस लड़ाई के दौरान हम बहुत कुछ सीख भी रहे होते हैं. और कभी उबंटू के विचार से बाहर जाकर स्वतंत्र होने के बारे में नहीं सोचते.

आज भी बहुत आसानी से चलता है हमारा काम

जिस तरह वैचारिकता के स्तर पर कठफोड़वा सफल रहा है आशा है कि आप भी ऐसे छोटे-बड़े वैचारिक समूहों का निर्माण इस विचार के आधार पर कर सकेंगे. यूं तो कठफोड़वा की वेबसाइट नहीं चल सकी. लेकिन जिन दिनों में यह लगातार काम कर रही थी, इसके पांच एडिटर थे और फिर भी यह बिना किसी गतिरोध के चल रही थी. साथ ही इसे बनाने वाला मस्तिष्क समूह आज भी पूरी क्षमता के साथ काम कर रहा है. यह हमउम्रों के साथ काम करने के लिए आजमाने पर खरा पाया गया फॉर्मूला है. मुझे जानने वाले कई लोगों को आश्चर्य होता है कि चाहे वेबासाइट के लिए सभी से मांगा गया एक निश्चित रकम का सहयोग हो (वेबसाइट जिसके चलते आज भी फंक्शनिंग है) या किसी लेख पर सभी से मांगे गए विचार, हमेशा समय से सहयोग आ जाता है. साथ ही यहां किसी हायआर्की के अभाव में लोगों को अपने विचारों को पूरे एक्सपोजर के साथ पेश करने का मौका भी मिलता है. आशा है हमें भविष्य में इसके और प्रयोग देखने को मिलेंगे.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Thursday, April 16, 2020

Friends के चैंडलर बिंग-मोनिका गेलर का प्यार और आपके रिलेशन में कोई तीसरा?

एक्सट्राऑर्डिनरी की तलाश में रहने वाले ऑर्डिनरी मोनिका गेलर-चैंडलर बिंग का प्यार काफी कुछ सिखाता है
दुनिया की तमाम रोचक प्रेम कहानियों में से एक मुझे लगी चैंडलर बिंग और मोनिका गेलर की. शायद कम ही लोग हों जिन्हें मशहूर अमेरिकन टीवी सीरीज फ्रेंड्स (Friends) के बारे में न पता हो. हो सकता है आपमें से कुछ ने इसे देखा न हो लेकिन दुनिया में सबसे ज्यादा देखी गई अंग्रेजी भाषा की टीवी सीरीज में यह शुमार होती आई है. यह ऐसे छह दोस्तों की कहानी है जो 25-30 साल की उम्र के है. नौकरीपेशा हैं और दो अपार्टमेंट शेयर करते हैं (हालांकि एक दोस्त अलग रहता है, जिसकी शादी और तलाक दोनों ही हो चुके हैं).

बहरहाल इसके दो किरदारों के बीच पहले आकर्षण पनपता है फिर प्यार. इनके नाम हैं चैंडलर बिंग और मोनिका गेलर. चैंडलर एमेच्योर लेकिन अच्छे ह्यूमर वाला और जानकार है. मोनिका बेहद सफाई पसंद और समझदार बनने की कोशिश में उलझ जाने वाली है, कई मायनों में उसे बहुत सी चीजों से ऑब्सेस्ड कहा जा सकता है. सीरीज में कई सीजन बाद दोनों को प्यार हो जाता है. यह प्यार बिल्कुल प्यार जैसा है, कन्फ्यूजिंग और एक्साइटिंग. न कि स्क्रीन पर अक्सर दिखाया जाने वाला पहली नजर का प्यार टाईप.

प्यार के बहुत शुरुआती दौर में चैंडलर और मोनिका दोनों ही किसी तरह के प्यार को स्वीकारने से बचते हैं और इसे मात्र आकर्षण मानकर खत्म करना चाहते हैं. लेकिन कई बार फिजिकल होने के बाद, वे लगभग प्यार में होते हैं, जिसकी पहली स्वीकारोक्ति चैंडलर की ओर से आती है कि उसे सेक्स का ऐसा अनुभव सिर्फ मोनिका के साथ रहा और सिर्फ उसकी वजह से (अपनी एमेच्योरिश गढ़न के चलते वह इस बात को पूरी तरह नहीं कह पाता लेकिन उसका इशारा केयर और प्यार की ओर ही है). वह यह दावा भी करता है कि मोनिका इसकी ताकीद उसकी अन्य पार्ट्नर्स से कर सकती है. फिर धीरे-धीरे दोनों ओर से प्यार का भाव दिखने लगता है.

चैंडलर और मोनिका का एक दृश्य
इन किरदारों को लेकर लिखे एक सीन तक मेरी बात सीमित है. एक सीन में मोनिका की दोस्त रेचल उसे एक मेल नर्स के साथ डेट पर चलने को कहती है क्योंकि वह उसके साथी मेल नर्स के साथ खुद डेट पर जाने वाली है. इसी बीच चैंडलर की किसी बात से खफा मोनिका, उसे जलाने के लिए डेट की बात पर हामी भर देती है. हालांकि इसके बाद जब चैंडलर उससे माफी मांगता है और उसे अपने एमेच्योर होने के चलते बात को गलत तरीके से पेश कर देने का हवाला देता है तो मोनिका झट से उसके प्रति वफादार रहने की हामी भर देती है. दरअसल वह इस माफीनामे का ही इंतजार कर रही होती है.

हमेशा आपके रिश्ते में एक तीसरा बना रहता है, उसे इग्नोर किया तो रिलेशन गया

इस सीन में काफी कुछ ऐसा है, जो किसी रिलेशन में रह रहे लोग सीख सकते हैं. हमेशा एक्सट्राऑर्डिनरी की तलाश में रहने वाले चैंडलर और मोनिका दोनों को ही 'आर्डिनरी एक-दूसरे' में वह भाव-वह प्यार मिलता है. लेकिन इससे भी जरूरी एक सीख है. कि चाहे चैंडलर-मोनिका हों, आप हों या कोई अन्य. हमेशा आपके रिश्ते में एक तीसरा बना रहता है. आपका पार्टनर जो हमेशा आपके साथ है, वो जितना इस तीसरे के बारे में जानता है, उतना अच्छा है. जरूरी नहीं कि यह तीसरा कोई इंसान ही हो. हो सकता है यह तीसरा आपका करियर हो, यह तीसरा आपका कोई पैशन हो या इंसान भी हो सकता है, जिसके प्रति आपका खिंचाव हो.

इसलिए कभी इस तीसरे के बारे में अपने पार्टनर से बात करने से न बचें. जितना ज्यादा आपको अपने पार्टनर के इस तीसरे के बारे में पता होगा, उतने ज्यादा आप अपने रिश्ते में सुरक्षित होंगे और ईमानदार रह सकेंगे. जितना कम आप उसके बारे में जानेंगे, तीसरे के मजबूत होने के चांसेस उतने ज्यादा बढ़ जाएंगे. इसलिए हमेशा उस तीसरे को जानने की कोशिश करें ताकि आपका पार्टनर तीसरे पर आपको चुने, इसलिए नहीं कि इसका उसपर दबाव हो बल्कि इसलिए कि आप उस तीसरे से अच्छे हों.
क्या आपने अपने पार्टनर को बताया है कि आपने उसके साथ रहना ही क्यों चुना?
मसलन उस पल के बारे में सोचिए जब खुद आपका पार्टनर आपको इस बात की सूचना दे कि उसे देखा है, उसके साथ मेरी हल्की-फुल्की बात हुई, जिसके बाद उसने मुझे डिनर पर बुलाया लेकिन मैंने उसके डिनर के ऑफर को टाला क्योंकि आज मैं तुम्हारे साथ खाना खाना चाहता था. ऐसी छोटी-छोटी चीजें ही पार्टनर पर कॉन्फिडेंस बिल्डिंग की एक्सरसाइज के तौर पर काम करती हैं ताकि वह भी ईमानदारी से अपने तीसरे की बातें आपसे शेयर करने से झिझके नहीं. आखिरकार प्यार तब क्या ही प्यार रह जाएगा, जब आपने किसी को जबरदस्ती इमोशनल बंधक बनाकर रखा हो और वैसे भी कोई कितने दिन ऐसा कर सकता है!

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)