Friday, May 1, 2020

Benedict Anderson की किताब Imagined Communities का संक्षिप्त अनुवाद: काल्पनिक समुदाय 'राष्ट्र' के निर्माण में अखबारों का योगदान

अखबार 'आधुनिक व्यक्ति' के लिए सुबह की प्रार्थना का एक विकल्प थे- हीगल

स्थानीय भाषा के अखबारों ने साझा हित वाले लोगों को एक सामूहिकता में बांधा


लैटिन और अरबी जैसी पवित्र भाषाओं के जरिए धार्मिक समुदायों की कल्पना की गई थी. इन्होंने (भाषाओं ने) लाखों आस्तिकों को ईश्वर से उनके एक से संबंध के जरिए एक-दूसरे से जुड़ा महसूस करवाया. जैसी हम चर्चा भी कर चुके हैं, छपाई ने राष्ट्रीय भाषाओं के मानकीकरण में मदद की, और इससे पाठकों ने खुद के बारे में एक धर्मनिरपेक्ष समुदाय के सदस्य के तौर पर कल्पना करने करने की शुरुआत की.

लेकिन यह सामान्य तौर पर सिर्फ छपाई नहीं थी, जिसने इस प्रक्रिया को चलाया- यह एक विशेष प्रक्रिया के तहत हुआ.

यहां यह प्रमुख संदेश है- स्थानीय भाषा के अखबारों ने साझा हित वाले लोगों को एक सामूहिकता में बांधा.

उन्नीसवीं सदी के जर्मन दार्शनिक हीगल ने एक बार टिप्पणी की थी कि अखबार 'आधुनिक व्यक्ति' के लिए सुबह की प्रार्थना का एक विकल्प थे. ठीक है, नीचे इसकी व्याख्या करते हैं.

प्रार्थना एक निजी कार्य है, जिसे मान्यता प्राप्त तरीके से अंजाम दिया जाता है. जब धर्म विशेष के लोग प्रार्थना करते हैं, तो वे जानते हैं कि जिस समारोह में वे प्रदर्शन कर रहे हैं, उसे लाखों आस्तिकों द्वारा साथ-साथ दोहराया जा रहा है. अभी, उन्हें इस बात का जरा भी पता नहीं है कि ये दूसरे लोग कौन हैं, लेकिन वे अपने अस्तित्व के बारे में बिल्कुल निश्चित होते हैं.

एक अख़बार पढ़ना भी इसी तरह का एक 'समारोह' है. प्रत्येक सुबह, पाठक एक साथ अपने अख़बार खोलते हैं. प्रार्थना कर रहे आस्तिकों की तरह, वे जानते हैं कि हजारों या लाखों लोग उसी समय बिल्कुल ऐसा ही कर रहे हैं. यह एक तथ्य है कि ये पाठक मेट्रो में यात्रा के दौरान और नाई के यहां अपने बाल कटाते हुए देखते हैं कि अन्य लोग भी उनकी ही तरह अख़बार अपने हाथों में खोले हुए हैं, वे इस तरह से इस बात को पक्का कर लेते हैं कि उनकी काल्पनिक दुनिया केवल एक गल्प नहीं है.

इस साथ-साथ किए जा रहे काम का मतलब है कि पाठक एक साझा राष्ट्रीय लेंस के जरिए घटनाओं के गवाह बन रहे हैं. उदाहरण के लिए मैक्सिको के लोगों को अर्जेंटीना में हुए एक तख्तापलट के बारे में पता चलता है लेकिन ऐसा उन्हें यह जानकारी मैक्सिको के समाचार पत्रों के माध्यम से होती है न कि अर्जेंटीना में रहने वाले साथी नागरिकों के जरिए. अगर ये अखबार ब्यूनस आयर्स की घटनाओं पर रिपोर्ट नहीं करते, तो ऐसा नहीं होता कि पाठकों के लिए अर्जेंटीना की किसी तरह की मौजूदगी खत्म हो जाती. इसके बजाए, वे यह मानते कि, किसी उपन्यास के उस चरित्र की तरह, जो एक-दो अध्यायों में बिल्कुल नदारद रहता है, उसी तरह यह दक्षिणी अमेरिकी देश, फिर से उभरकर सामने आएगा, जब यह घटनाक्रम में आगे कोई जरूरी पड़ाव आएगा.

इसे अलग तरह से कहें, तो अखबार जिस तरह से किसी सूचना के खबर होने को परिभाषित करते हैं, वह एक राष्ट्रीय हित की भावना पैदा करता है. अगर अभी मैक्सिको के लोग अर्जेंटीना के बारे में नहीं पढ़ रहे हैं क्योंकि फिलहाल अर्जेंटीना मैक्सिको के लिए अप्रासंगिक है.

एक ही समाचार के अज्ञात पाठकों द्वारा एक ही भाषा में, साझे सामूहिक हितों की यह भावना पनपना ही राष्ट्र के कल्पित समुदाय के केंद्र में है. यह वही है जो एक अमेरिकी, जो अपने 32 करोड़ हमवतनों में से मुट्ठीभर से ज्यादा से कभी नहीं मिलेगा, को यह निश्चितता देता है कि 31 करोड़, 99 लाख, 99 हजार, 999 अन्य अमेरिकी, जो उसी की तरह हैं, किसी 'संयुक्त राज्य अमेरिका' नाम की किसी चीज के हिस्से हैं.

किताब के बारे में-

काल्पनिक समुदाय की अवधारणा को बेनेडिक्ट एंडरसन ने 1983 मे आई अपनी किताब 'काल्पनिक समुदाय' (Imagined Communities) में राष्ट्रवाद का विश्लेषण करने के लिए विकसित किया था. एंडरसन ने राष्ट्र को सामाजिक रूप से बने एक समुदाय के तौर पर दिखाया है, जिसकी कल्पना लोग उस समुदाय का हिस्सा होकर करते हैं. एंडरसन कहते हैं गांव से बड़ी कोई भी संरचना अपने आप में एक काल्पनिक समुदाय ही है क्योंकि ज्यादातर लोग, उस बड़े समुदाय में रहने वाले ज्यादातर लोगों को नहीं जानते फिर भी उनमें एकजुटता और समभाव होता है.

अनुवाद के बारे में- 

बेनेडिक्ट एंडरसन के विचारों में मेरी रुचि ग्रेजुएशन के दिनों से थी. बाद के दिनों में इस किताब को और उनके अन्य विचारों को पढ़ते हुए यह और गहरी हुई. इस किताब को अनुवाद करने के पीछे मकसद यह है कि हिंदी माध्यम के समाज विज्ञान के छात्र और अन्य रुचि रखने वाले इसके जरिए एंडरसन के कुछ प्रमुख विचारों को जानें और इससे लाभ ले सकें. इसलिए आप उनके साथ इसे शेयर कर सकते हैं, जिन्हें इसकी जरूरत है.

(नोट: किताब का एक अंक रोज़ अनुवाद कर रहा हूं. आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Thursday, April 30, 2020

क्या इरफान साब, इतना भी खुद्दार क्या होना कि हमारी दुआएं लेने से भी इंकार कर गए...

फिल्म 'लंचबॉक्स' के एक दृश्य में इरफान खान
इरफान खान की मौत पर भरोसा नहीं है. अंतिम खबर आने से पहले 2 साल तक हमेशा लगा, 'वो वापस आएंगे, फिर से फिल्में करेंगे' लेकिन जैसा वरुण ग्रोवर ने कहा कि इरफान ने "एकतरफा हमें दिया, हमसे लिया कुछ नहीं". वैसे ही पिछले दो सालों में दिल से कई बार निकली दुआ कि 'वो जल्दी से ठीक हो जाएं और फिर से एक के बाद एक फिल्म करें' को भी इरफान खान ने लेने से इंकार कर दिया. मैं ऐसे पेशे में हूं जिसके चलते उनके एक दिन पहले हॉस्पिटल में भर्ती होने की खबर मिल गई थी और यह भी सोचा था कि कोरोना के प्रसार के खतरनाक समय में कैसे तबीयत बिगड़ गई, फिर सोचा, 'कोई बात नहीं, वो इरफान खान हैं, सही होकर वापस आ जाएंगे.'

वापस आने की बात पर इतना विश्वास था कि अगले दिन सवेरे 11 बजे के बाद जब मेरे मित्र अजय ने मुझसे पूछा कि इरफान पर कुछ लिखा है क्या तुमने? तो मैंने उन्हें पलट कर जवाब दिया, "याद तो नहीं लेकिन क्यों लिखना है, वो तो ठीक हो जाएंगे न!" मुझे विश्वास ही नहीं था कि उन्हें कुछ हो सकता है. अंतिम खबर पा जाने के बाद भी इरफान के बारे में लिखना कई वजहों से टालता रहा. लेकिन अजय ने कई बार कहा तो मैंने तय किया लिखूंगा. हालांकि अब भी मुझे खुद पर विश्वास नहीं है. ऐसा लग रहा है कि सूरज को टॉर्च की रौशनी दिखाने जा रहा हूं. फिर भी अपनी बात रखता हूं.

पहली बात मुझे अब भी विश्वास नहीं कि वो नहीं रहे. लिखना इसलिए भी टाला कि लग रहा था जब लिखूंगा तो स्वीकारना पड़ेगा, वो नहीं रहे. दूसरी बात, इरफान खान को जब-जब एक्टिंग करते देखा तो लगा कि जैसे यही तो सहजता है, कोई प्रयास ही नहीं. कोई परफॉर्मेंस प्रेशर नहीं. ये आदमी यही तो कर रहा है, हमेशा से. इसके लिए क्या तारीफ करूं. मेरे लिए इरफान की एक्टिंग सूरज की तरह थी, जो आती-जाती रहती है. उसकी कमी तब महसूस हो रही है, जब धीरे-धीरे एहसास हो रहा है कि अब वह नहीं होगी, कभी नहीं होगी. हमें पता होता था, इरफान खान फिल्म में हैं तो बिना ज्यादा सोचे फिल्म देख लेनी है, फिल्म से कुछ मिले न मिले, इरफान निराश नहीं करेंगे. मैंने कभी एक लेख में लिखा था कि रवि किशन जिस फिल्म में झांककर चले जाते हैं, उसमें भी उनका रोल याद रह जाता है. क्या यह इरफान पर लागू नहीं होता. कुछ सेकेंड का सीन 'सलाम बॉम्बे' का मुझे आज भी याद है. एक 'डॉक्टर की मौत' का रिपोर्टर, कोई भूल सकता है उसे क्या?

उनके न रहने पर मेरी शुरुआती प्रतिक्रिया इस खबर को नकारने वाली थी. मैंने इस पर न सोचने, इसे न मानने का निश्चय किया था. वैसे मेरे लिए एक बात चौंकाने वाली रही. मैंने देखा लोग उनकी अंतिम खबर पर रो रहे थे. मैंने दसियों लोगों से इस पर रोते देखा और सुना. मैंने इंस्टा चेक किया, हर एक पोस्ट इरफान पर थी. मैंने वॉट्सएप स्टोरी चेक की, हर स्टोरी इरफान पर थी. मैंने सोचा ऐसा क्या था इस बंदे में कि सिनेमा-विनेमा से कोई लगाव न रखने वाले लोग भी इस तरह से महसूस कर रहे हैं. मैंने अपनी भावनाओं में इसका उत्तर ढूंढने की कोशिश की. मुझे समझ आया कि ये सारे ही लोग अभी इरफान से बहुत कुछ चाहते थे, मेरी ही तरह ये रोज सूरज को दिन लेकर आते देखना चाहते थे. उन्हें एहसास हो रहा है कि अब उनकी एक्टिंग और देखने को नहीं मिलेगी और वो रो रहे हैं, मातम कर रहे हैं. यह सोचकर मेरा दिल बैठने लगा. तबसे से जब-जब कभी न देख पाने का एहसास हो रहा है. बहुत बुरा लग रहा है. मैं अब भी स्वीकारना नहीं चाहता ऐसा हुआ है.

एक और बात बता दूं कि मैं इरफान खान का फैन नहीं रहा हूं. मैंने अपने आपको जिनके फैन के तौर पर हमेशा स्वीकारा है, वे हैं केके मेनन और विजयराज. इन दोनों के पास लोगों को चौंकाने के लिए पर्याप्त उपकरण होते हैं. लेकिन यह मानूंगा कि इरफान इनसे कहीं ज्यादा वास्तविक और सहज थे. केके मेनन और विजयराज के बीच कहीं. वह इंटेंसिटी भी और अपना मजाक बनाकर सारी महफिल खींच लेने का माद्दा भी. फिर भी इरफान इतने सहज थे कि उनपर अलग से नोटिस की जरूरत नहीं पड़ती थी, मुझे हमेशा लगा कि यह इरफान नहीं, फिल्म का वह किरदार ही तो है. एक और बात जिसके चलते मैंने लोगों को दुख करते देखा शायद वह यह था कि अभी उन्होंने किया ही क्या था, कितना सब तो अपने साथ लेकर चले गए. अरे आखिर पिछले दशक तक इरफान फिल्मों के केंद्र में कहां थे? वो कहानी में कहीं साइड पर खड़े पूरी फिल्म का ताना-बाना सुलझा रहे होते थे. लेकिन जबसे 'सात खून माफ' और 'लाइफ ऑफ पाई' जैसी फिल्में आईं तब तय हुआ कि इरफान वापस टीवी में खर्च होने नहीं जाएंगे. उनका एक मुकाम है, वे यहीं रहेंगे, सिल्वर स्क्रीन पर प्रमुखता के साथ.

इस घोषणा के बाद हमें वे 'हैदर', 'साहब बीवी और...' फिर अपने सबसे ऊंचे मकाम 'पान सिंह तोमर', 'लंचबॉक्स' और 'पीकू' में दिखे. तय हो गया कि वो इंडस्ट्री को अब तक मिले सबसे बेहतरीन एक्टर्स में से एक हैं. अखबार, मैग्जीन के कॉलम उनकी तारीफों से पटे रहने लगे. लेकिन तबसे उन्होंने फिल्में ही कितनी कीं. बहुत ज्यादा तो 10. दरअसल हम अभी उनसे बहुत चाहते थे, बहुत कुछ. लेकिन एक बंदा जो समाज से ले कुछ नहीं रहा, कब तक एक तरफा देने की प्रक्रिया चलाए रखता, उस खुद्दार शख्स ने तो ईश्वर को हमारी दुआएँ तक कुबूल करने से मना कर दिया था...

PS: बहुत दुख के साथ आज लगातार 21वें दिन (किसी काम की आदत डालने के लिए इतने दिन वह काम करना जरूरी होता है) के ब्लॉग को लिखते हुए मुझे 'द इमैजिंड कम्युनिटीज' के अगले अंक की जगह इरफान खान की मौत के बारे में लिखना पड़ रहा है. अब भी चाहता हूं काश ये बुरा सपना टूटे और मेरी आंख खुल जाए.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Tuesday, April 28, 2020

Benedict Anderson की किताब Imagined Communities का संक्षिप्त अनुवाद: प्रिंट पूंजीवाद ने राष्ट्रीय भाषाओं को मजबूती दी, रखी राष्ट्रवाद की नींव

1500-1600 के बीच यूरोपीय भाषाओं को मानकीकृत किया जाना शुरू हुआ

प्रिंट पूंजीवाद ने विशिष्ट राष्ट्रीय भाषाओं को मजबूती दी और रखी राष्ट्रवाद की नींव


पंद्रहवीं शताब्दी में प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार ने संचार में क्रांति ला दी. पहले किताबों की बेहद मेहनत के साथ हाथ से नकल की जाती थी, और पुस्तकालय खुद को एक दर्जन संस्करणों के साथ भाग्यशाली माना करते थे. फिर किताबें बड़े पैमाने पर व्यापार की एक वस्तु बन गईं. 1500 तक, करीब 2 करोड़ किताबें छप चुकी थीं. 1500 से 1600 के बीच लगभग 20 करोड़ और किताबों का उत्पादन हुआ. जैसा कि अंग्रेजी दार्शनिक फ्रांसिस बेकन ने इस अद्भुत सदी के अंत में लिखा था, "छपाई ने दुनिया का रूप और अवस्था" बदल दी थी.

वह सही थे. जल्द ही, यहां तक कि भाषाओं को भी (मानकीकरण के जरिए) बदला गया.

तो ये सारी किताबें कौन छाप रहा था? जाहिर है, व्यवसायी. पुस्तक की छपाई यूरोप में उभरने वाले पूंजीवादी उद्यमों के शुरुआती रूपों में से एक था और पूंजीवादी के हर रूप की तरह, व्यापार का यह प्रभाव हुआ कि नए बाजारों की बेचैनी से खोज की जाने लगी.

इससे शायद ही कोई आश्चर्य हो. जब पहली बार छपाई हुई, तो प्रकाशकों ने मुख्यत: महाद्वीप के छोटे से लैटिन पाठक समूह को ही आकर्षित किया. यह बाजार जल्द ही संतृप्त हो गया, हालांकि, अभी जनसंख्या की एक भाषा भाषी बहुसंख्यक जनता बची रही. उनको आकर्षित करने के लिए, आपको उन भाषाओं में किताबों की छपाई करनी थी, जिसे वे समझते थे. और यही प्रकाशकों ने करना शुरू कर दिया.

यह काम पर लग चुका प्रिंट पूंजीवाद था, जो स्थानीय भाषाओं में छपाई की ओर ले गया. इसके साथ ही साथ धर्म सुधार और सोलहवीं शताब्दी का कैथोलिक चर्च में सुधार का आंदोलन भी चल रहा था. छपाई से पहले, रोम ने चुनौती पेश करने वाले विधर्मियों को सहजता से कुचल दिया था. यह ऐसा करने में कैसे सक्षम था? आसान सी बात है- यह सारे संचार को नियंत्रित करता था.

लेकिन जब लूथर ने 1517 में जर्मन में अपना शोध पूरा किया, यह बदल चुका था. किताबों के व्यापार की बदौलत, अब जर्मन भाषा के ग्रंथों के लिए बड़े पैमाने पर बाजार था. 15 दिनों के भीतर, देश के हर भाग में लूथर की बातें पहुंच गईं. यह दो चीजों का सबूत था, जो पहले कभी मौजूद नहीं थीं- एक छपी हुई स्थानीय भाषा और पूरी तरह अनपढ़ जनता और द्विभाषी लैटिन के पाठक वर्ग के बीच के स्थित एक पढ़ सकने वाली वाला वर्ग. जैसे-जैसे यह प्रक्रिया पूरे यूरोपीय महाद्वीप में दोहराई गई, स्थानीय भाषाओं को मानकीकृत किया गया. बड़ी संख्या में अपने अलग अंदाज में फ्रांसीसी, अंग्रेजी और स्पेनिश भाषा बोलने वाले, जो शायद एक-दूसरे को बातचीत के दौरान नहीं समझ पाते, अब छपे हुए में एक-दूसरे से संवाद करते थे.

उसी समय पाठकों को धीरे-धीरे उन लाखों लोगों के बारे में पता चला जो उन्हीं की भाषा बोलते थे, साथ ही उन लोगों के बारे में भी जो उनकी भाषा हीं बोलते थे. राष्ट्रीय विशेषताओं के आधार पर किसी समुदाय की कल्पना करने का यह पहला कदम था.

ये सह-पाठक, जिनके साथ लोग छपाई के जरिए जुड़े थे, इन्होंने मिलकर राष्ट्रीय स्तर के काल्पनिक समुदाय का भ्रूण तैयार किया.

किताब के बारे में-

काल्पनिक समुदाय की अवधारणा को बेनेडिक्ट एंडरसन ने 1983 मे आई अपनी किताब 'काल्पनिक समुदाय' (Imagined Communities) में राष्ट्रवाद का विश्लेषण करने के लिए विकसित किया था. एंडरसन ने राष्ट्र को सामाजिक रूप से बने एक समुदाय के तौर पर दिखाया है, जिसकी कल्पना लोग उस समुदाय का हिस्सा होकर करते हैं. एंडरसन कहते हैं गांव से बड़ी कोई भी संरचना अपने आप में एक काल्पनिक समुदाय ही है क्योंकि ज्यादातर लोग, उस बड़े समुदाय में रहने वाले ज्यादातर लोगों को नहीं जानते फिर भी उनमें एकजुटता और समभाव होता है.

अनुवाद के बारे में- 

बेनेडिक्ट एंडरसन के विचारों में मेरी रुचि ग्रेजुएशन के दिनों से थी. बाद के दिनों में इस किताब को और उनके अन्य विचारों को पढ़ते हुए यह और गहरी हुई. इस किताब को अनुवाद करने के पीछे मकसद यह है कि हिंदी माध्यम के समाज विज्ञान के छात्र और अन्य रुचि रखने वाले इसके जरिए एंडरसन के कुछ प्रमुख विचारों को जानें और इससे लाभ ले सकें. इसलिए आप उनके साथ इसे शेयर कर सकते हैं, जिन्हें इसकी जरूरत है.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Monday, April 27, 2020

Benedict Anderson की किताब Imagined Communities का संक्षिप्त अनुवाद: पवित्र भाषाओं, बड़े साम्राज्यों और धार्मिक समुदायों की सांठ-गांठ

यहूदी, ईसाई और मुस्लिम तीनों ही धर्मों में पवित्र माने जाने वाले शहर जेरूसलम की तस्वीर (फोटो क्रेडिट- Getty Images)

पवित्र भाषाओं ने बड़े साम्राज्यों और धार्मिक समुदायों को जोड़े रखा


इस चित्र की कल्पना कीजिए. यह सत्रहवीं शताब्दी है और हम इस्लाम के सबसे पवित्र शहर मक्का में हैं, जहां हमारी मुलाकात दो तीर्थयात्रियों से होती है. एक फिलीपींस की एक सल्तनत मगिंडनाओ से है, और दूसरा मोरक्को की पहाड़ियों से आया नाई है. ये दोनों अजनबी कभी नहीं मिले, एक-दूसरे की मातृभाषाओं को नहीं समझते, और विभिन्न संस्कृतियों के रीति-रिवाज मानते हैं, फिर भी वे एक दूसरे को 'भाई' मानते हैं. क्यों? बहरहाल, क्योंकि वहां एक चीज ऐसी है जिसे वे दोनों साझा करते हैं- अरबी, कुरान और सभी मुसलमानों की पवित्र भाषा.

यहां हमें यह महत्वपूर्ण संदेश मिलता है कि
पवित्र भाषाएं बड़े साम्राज्यों और धार्मिक समुदायों को साथ रखने वाली गोंद थीं.
धार्मिक और साम्राज्यों की भाषाएं जैसे कुरान की अरबी, चीनी और लैटिन की व्याख्या तीन विशेषताओं के आधार पर की गई. सबसे पहली बात, उन्हें बोलने से बजाए पहले लिखा और पढ़ा गया. अलग तरह से कहें तो उन्होंने ध्वनियों के समुदाय बनाने के बजाए संकेतों के समुदाय बनाए. अगर आप गणितीय संकेतों की ओर देखें तो आप समझ सकते हैं कि यह कैसे काम करता है. उदाहरण के तौर पर थाई और रोमानियन भाषाओं में "प्लस" चिन्ह के लिए अलग-अलग नाम हैं लेकिन दोनों 'क्रॉस' प्रतीक को एक ही तरह से पहचानते हैं.

दूसरी बात, ये भाषाएँ सत्य की भाषाएँ थीं. उन्हें सीखने की तुलना फ्रेंच (जैसी भाषाएँ) सीखने से नहीं की जा सकती है. ऐसा इसलिए क्योंकि देशी भाषाएँ और सामान्य भाषाएँ दैविक तरह से प्रेरित नहीं थीं, जिस तरह से लैटिन या कुरान की अरबी थी. वे चीजों की वास्तविक प्रकृति तक पहुँच नहीं करा सकती थीं, यही वजह है कि शिक्षित यूरोपीय लोगों ने शलजम की खेती के बारे में जर्मन या स्वीडिश में बात की लेकिन दर्शन और धर्मशास्त्र पर चर्चा के लिए उन्होंने लैटिन को चुना.

इसी के चलते कई कैथोलिक लूथर के इस विचार से भयभीत हो गए थे कि बाइबिल का देशी भाषाओं में अनुवाद किया जा सकता है. जबकि वे मानते थे, धार्मिक सत्य सिर्फ विशेषाधिकार प्राप्त भाषाओं में बोले-लिखे-पढ़े जा सकते थे.

कुछ भाषाओं की पवित्रता की इस बात और उनकी सत्य तक पहुंच प्रदान करने की क्षमता ने साम्राज्यों और धार्मिक समुदायों की काल्पनिक सदस्यता को के लिए रास्ता खोला. उदाहरण के लिए चीनी साम्राज्य के शासक वर्ग ने, 'बर्बरों' को मान्यता दी, जो धीरे-धीरे मध्य साम्राज्य के प्रतीकों को चित्रित करना सीख रहे थे- इसका मतलब यह माना गया कि वे सभ्य हो रहे थे. यह इन सत्य की भाषाओं पर महारथ ही थी, जिसने मंगोलों को चीनी बनने और तुर्की खानाबदोशों को मुस्लिम बनने की अनुमति दी.

अगर किसी को इन धार्मिक समुदायों और साम्राज्यों में शामिल किया जा सकता था, तो इसका कोई कारण नहीं था कि ये समूह अनंत काल तक न बढ़ते रहें. तब क्यों, मध्य युग के अंत में धर्म में गिरावट आई? एक शब्द में कहें तो 'देशीकरण' के चलते- जो कि सत्य की भाषाओं का विखंडन है और उनका स्थानीय भाषाओं से प्रतिस्थापन है. जैसा हम अगले अंक में पढ़ेंगे, यह प्रक्रिया बड़े पैमाने पर पूंजीवाद और प्रिंटिंग प्रेस द्वारा चलाई गई.

किताब के बारे में-

काल्पनिक समुदाय की अवधारणा को बेनेडिक्ट एंडरसन ने 1983 मे आई अपनी किताब 'काल्पनिक समुदाय' (Imagined Communities) में राष्ट्रवाद का विश्लेषण करने के लिए विकसित किया था. एंडरसन ने राष्ट्र को सामाजिक रूप से बने एक समुदाय के तौर पर दिखाया है, जिसकी कल्पना लोग उस समुदाय का हिस्सा होकर करते हैं. एंडरसन कहते हैं गांव से बड़ी कोई भी संरचना अपने आप में एक काल्पनिक समुदाय ही है क्योंकि ज्यादातर लोग, उस बड़े समुदाय में रहने वाले ज्यादातर लोगों को नहीं जानते फिर भी उनमें एकजुटता और समभाव होता है.

अनुवाद के बारे में- 

बेनेडिक्ट एंडरसन के विचारों में मेरी रुचि ग्रेजुएशन के दिनों से थी. बाद के दिनों में इस किताब को और उनके अन्य विचारों को पढ़ते हुए यह और गहरी हुई. इस किताब को अनुवाद करने के पीछे मकसद यह है कि हिंदी माध्यम के समाज विज्ञान के छात्र और अन्य रुचि रखने वाले इसके जरिए एंडरसन के कुछ प्रमुख विचारों को जानें और इससे लाभ ले सकें. इसलिए आप उनके साथ इसे शेयर कर सकते हैं, जिन्हें इसकी जरूरत है.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Benedict Anderson की किताब Imagined Communities का संक्षिप्त अनुवाद: राष्ट्रवाद, धर्म नहीं लेकिन धर्म जैसा ही विचार

गांव से बड़े सभी समुदाय किसी न किसी तरह से काल्पनिक हैं (फोटो क्रेडिट- Verso Books)
इतिहास में ज्यादातर, मानवता का बड़ा भाग साम्राज्यों में रहा है. आधुनिक राष्ट्र-राज्यों से अलग, साम्राज्यों की दृढ़ सीमाएं नहीं होती थीं. शाही शादियां, अधीन बनाने के लिए किए गये युद्ध और धर्मांतरण साम्राज्यों के विस्तार के तरीके थे. इस तरह से जो आधुनिक स्पेन, ब्रिटेन और इटली का इलाका है, वह एक ही साम्राज्य- रोमन साम्राज्य; वहीं फारस, अफगानिस्तान; और भारत एक अन्य साम्राज्य, मुगल साम्राज्य हुआ करते थे.

फिर, अठारहवीं सदी के अंत में, एक नया विचार उभरा- राष्ट्रवाद. इससे यह स्थापित हुआ कि बुल्गारिया के लोगों, चेक लोगों और सर्बिया के लोगों को उस एक ही इलाके में नहीं रहना चाहिए, जिस पर ऑस्ट्रो-हंगेरियन राज परिवार का शासन हो बल्कि उनके पास अपने अलग-अलग राज्य होने चाहिए.

यह एक नए तरह का 'काल्पनिक समुदाय' था. एक गांव से बड़े सभी समुदाय किसी न किसी तरह से काल्पनिक हैं क्योंकि असली जीवन में उसके लोग अपने साथी निवासियों में से मुट्ठी भर से ज्यादा को नहीं जान पाते. साम्राज्यों की सदस्यता अक्सर धार्मिक या राजवंशीय हुआ करती थी. जबकि राज्य, इससे अलग हैं. समान समुदाय से होने का मतलब है, समान राष्ट्रीयता से संबंध रखना, फिर पहले उसे भी परिभाषित करना होता है.

तो स्पेन वाले कैसे स्पेनिश बने और अल्जीरिया वाले अल्जीरियन? आगे हम आपको बतायेंगे कि कैसे राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद का जन्म हुआ. इस किताब से आप सीखेंगे-

1. क्यों राष्ट्रवाद, राजनीतिक विचारधारा के बजाए धार्मिक तरह का विचार ज्यादा लगता है?

2. कैसे किताबों का कारोबार करने वाले राष्ट्रवाद के योगदान के जरिए नए बाजारों की तलाश करते हैं?

3. क्यों भाषाओं की शिक्षा साम्राज्यों के शासकों के लिए एक सिरदर्द बनकर रह गई?

राष्ट्रवाद धर्म नहीं लेकिन आधुनिक राजनीतिक विचारधारा होने के बजाए धार्मिक विश्वास के तरीकों के ज्यादा करीब


जब हम दुनिया में आते हैं तो सारी चीजें हमारी चुनाव की शक्तियों से परे होती है. हमारी आनुवांशिक विरासत, हमारे माता-पिता, हमारी शारीरिक शक्तियां सभी संयोग पर आधारित होती हैं. जीवन में एक मात्र निश्चित बात मृत्यु होती है. इन दो तथ्यों- हमारे अस्तित्व की आकस्मिकता और मृत्यु की अवश्यंभाविता पर इंसानों द्वारा हमेशा से बहुत जोर दिया गया है. ज्यादातर पारंपरिक आस्था वाले तंत्रों में इन्हें समझने के प्रयास केंद्र में होते हैं. इसके विपरीत विचारों की आधुनिक शैली उन सवालों के जवाब में खामोश रह जाती है, जिनका निपटारा विज्ञान के जरिए नहीं हो सकता है, जिसके चलते न ही उदारवादी और न ही मार्क्सवादियों के पास अमरता के बारे में बहुत कुछ कहने को है. जबकि राष्ट्रवादियों के पास है.

और यही इस पाठ का प्रमुख संदेश भी है- राष्ट्रवाद धर्म नहीं है, लेकिन यह आधुनिक राजनीतिक विचारधारा के बजाए धार्मिक विश्वास के तरीकों के ज्यादा करीब है.

इस तरह से हम सैनिकों की याद में बनाए गए स्मारकों को, राष्ट्रवाद के सबसे रोचक प्रतीकों में से एक मान लेते हैं. ये स्मारक अज्ञात सैनिकों को समर्पित होते हैं, और यह यही अज्ञातता होती है जो कि इन भूतिया गुंबदों को उनका अर्थ देती है. क्योंकि वे 'अज्ञात सैनिकों' का स्मरण करते हैं जिनकी कोई व्यक्तिगत पहचान नहीं है, लेकिन वे किसी बड़ी चीज के प्रतीक बन गए हैं. वे सबसे बड़े बलिदान को प्रदर्शित करते हैं- किसी के उसके देश के लिए मर जाने को. स्मारक यह सुझाते समझ आते हैं कि जिन्होंने किसी बड़ी चीज के लिए अपनी जिंदगी दी, वे खुद हमेशा के लिए जिंदा रहेंगे.

ऐसे में, राष्ट्रवाद धार्मिक दुनिया के विश्वासों जैसा नजर आता है. आस्थाएं जैसे बौद्ध, ईसाईयत, और इस्लाम, उदाहरण के लिए हजारों सालों तक दर्जनों अलग-अलग समाजों में इसलिए जिंदा रह सके क्योंकि वे इंसान के सहज बोध में घुस गए. ये आस्थाएं यह विश्वास लेकर आती हैं कि जीवन में जो बेतरतीब नुकसान हो रहे हैं और जिस तरह जिंदगी का प्रवाह चल रहा है, उसमें जरूर कोई गहरा मतलब छिपा होगा. चाहे वे इसे कर्म कहें या मौत के बाद की दुनिया, धर्म मरे हुओं, जीवितों और अभी पैदा होने वालों को मौत और फिर से जन्मने के एक अनन्त चक्र में जोड़कर इस अर्थ को पाते हैं.

राष्ट्रवाद और धार्मिक विचारों के बीच इस समानता को देखते हुए, यह आश्चर्यजनक नहीं है कि पहले वाला तुरंत उभरा जब बाद वाला कमजोर पड़ रहा था. हजारों सालों तक बिना प्रमाण के सही माने जाते रहने के बाद, अठारहवीं शताब्दी के यूरोप में धर्म अपनी स्वत: स्पष्ट रहने वाली स्थिति खो रहा था. यह प्रबोधन का युग था, एक ऐसा बौद्धिक आंदोलन जिसमें लोग धार्मिक परंपराओं के बजाए मानवीय तर्क पर जोर दे रहे थे. निश्चित रूप से धर्म का पतन नहीं हुआ, फिर भी इससे उस यातना का खात्मा हो गया, जो धर्म का अंग हुआ करती थी.

वास्तव में, इस पतन ने वर्तमान जीवन के दिल में एक खाली जगह छोड़ दी. बिना स्वर्ग के, अस्तित्व असहनीय रूप से मनमाना महूसस होने लगा. मोक्ष की संभावनाओं के बिना और उसके बाद की जिंदगी के ख्यालों के बिना, राष्ट्रों के काल्पनिक समुदाय और भी ज्यादा आकर्षक लगे. लेकिन इससे पहले कि हम राष्ट्रवाद का ही परीक्षण करें, उस सांस्कृतिक तंत्र पर एक नज़र डालते हैं, जो इसे लेकर आया.
राष्ट्रवाद को उसके पूर्ववर्ती सांस्कृतिक तंत्र के साथ जोड़कर, उनकी ही पंक्ति में खड़े विचार की तरह देखा जाना चाहिए, न कि सोच-समझकर स्वीकारी गई राजनीतिक विचारधाराओं की तरह.

किताब के बारे में-

काल्पनिक समुदाय की अवधारणा को बेनेडिक्ट एंडरसन ने 1983 मे आई अपनी किताब 'काल्पनिक समुदाय' (Imagined Communities) में राष्ट्रवाद का विश्लेषण करने के लिए विकसित किया था. एंडरसन ने राष्ट्र को सामाजिक रूप से बने एक समुदाय के तौर पर दिखाया है, जिसकी कल्पना लोग उस समुदाय का हिस्सा होकर करते हैं. एंडरसन कहते हैं गांव से बड़ी कोई भी संरचना अपने आप में एक काल्पनिक समुदाय ही है क्योंकि ज्यादातर लोग, उस बड़े समुदाय में रहने वाले ज्यादातर लोगों को नहीं जानते फिर भी उनमें एकजुटता और समभाव होता है.

अनुवाद के बारे में- 

बेनेडिक्ट एंडरसन के विचारों में मेरी रुचि ग्रेजुएशन के दिनों से थी. बाद के दिनों में इस किताब को और उनके अन्य विचारों को पढ़ते हुए यह और गहरी हुई. इस किताब को अनुवाद करने के पीछे मकसद यह है कि हिंदी माध्यम के समाज विज्ञान के छात्र और अन्य रुचि रखने वाले इसके जरिए एंडरसन के कुछ प्रमुख विचारों को जानें और इससे लाभ ले सकें. इसलिए आप उनके साथ इसे शेयर कर सकते हैं, जिन्हें इसकी जरूरत है.

(नोट: आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Saturday, April 25, 2020

Good Economics for Hard Times: अभिजीत बनर्जी-एस्थर डुफ्लो की किताब का हिंदी में संक्षिप्त अनुवाद- गरीबी का हल और लोकतंत्र

अभिजीत बनर्जी और एस्थर डुफ्लो की यह किताब दुनिया की तमाम परेशानियों का हल अर्थशास्त्र में ढूंढती है

CASH AND CARE

गरीबी कम करने के लिए हर स्थिति में काम आ जाने वाला कोई एक उपाय नहीं है लेकिन गरीबों की इज्जत को प्राथमिकता देना जरूरी है

कल्पना कीजिए एक बहीखाता देखने के वाले के तौर पर आपकी नौकरी एक रोबोट ने छीन ली है. या चीन के साथ चल रहे व्यापार युद्ध के प्रभाव के चलते  आपका एक जैविक खेत में रोज़ का काम खत्म हो चुका है. या भारतीय कपड़ों के कारखाने में आपका काम खत्म हो जाता है क्योंकि पश्चिम के लिए कोरियाई कपड़ा आयात करना ज्यादा किफायती है.

इन नौकरियों के नुकसान का आपके और आपके परिवार पर गहरा आर्थिक प्रभाव पड़ेगा. लेकिन पैसा वह एकमात्र चीज नहीं होगा, जिसे आप खोएंगे. आप अपना कार्य समुदाय, कार्यस्थल में अपनी पहचान और शायद अपनी इज्जत का अहसास भी खो देंगे.

एक सामाजिक सुरक्षा के जाल (सोशल सेफ्टी नेट) के बिना लोग बहुत तेजी से गरीब हो सकते हैं. एक छंटनी एक पूरे परिवार को गरीबी में डुबा सकती है. ऐसे में सहायता के किसी भी प्रयास को न सिर्फ परिवार की वित्तीय जरूरतों को ध्यान में रखना चाहिए बल्कि बहुत ही मानवीय जरूरत- 'सम्मान के व्यवहार' को भी ध्यान रखना चाहिए.

दुर्भाग्यपूर्ण रूप से कई सहायता कार्यक्रम इसके बजाए गरीबों को बदनाम करते हैं.

नीति निर्माता मानते हैं कि गरीबों पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए कि वे भोजन और शिक्षा जैसी उपयोगी चीजों पर अपना पैसा खर्च करेंगे और इसलिए उन्हें नकद पैसे नहीं दिए जाने चाहिए. जरूरतमंदों को पैसा देने के प्रस्ताव के आलोचकों का तर्क होता है कि अगर लोगों को इस तरह से समर्थन दिया जाता है, तो उनके पास काम करने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं होगा; इसके बजाए, वे लक्ष्यहीन होकर बाकी दिन इधर-उधर पड़े रहेंगे.

लेकिन ये आशंकाएं निराधार हैं. 119 विकासशील देशों में किए गए गरीबों को प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता (यूनिवर्सल बेसिक इनकम) देने के प्रयोगों से मिला डेटा दिखाता है कि इससे लाभार्थियों के पोषण और स्वास्थ्य के स्तर में काफी हद तक सुधार होता है. वे इसे शराब और तंबाकू पर खर्च नहीं करते.

बेसिक इनकम पाने के बावजूद लोग काम करने से नहीं बचते. लेखकों में से एक के घाना में किए प्रयोग में, प्रतिभागियों को बैग बनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जिसे एक अच्छी राशि देकर खरीदा जाना था. कुछ प्रतिभागियों को बकरियां भी दी गईं, जिनका उपयोग आगे की आय पैदा करने के लिए किया जा सकता था. प्रयोग से सामने आया कि न केवल बकरियों के मालिक लाभार्थियों ने उन लोगों की तुलना में अधिक बैग का उत्पादन किया, जिन्हें बकरियां नहीं मिली थीं बल्कि उन्होंने अच्छी क्वालिटी वाले बैग भी बनाए.

गरीब लोगों को हतोत्साहित करने के बजाए, वित्तीय सहायता लाभार्थियों को रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े बीमार कर देने वाले तनाव से बचा सकती है, और उन्हें कड़ी मेहनत करने, कुछ नया करने या स्थानांतरित होने के लिए स्वतंत्र कर सकती है.

गरीबी मिटाने के लिए हर स्थिति में काम आ जाने वाला कोई उपाय नहीं है. एक समाधान जो घाना में काम करता है, हो सकता है अमेरिका में काम न करे. जरूरी यह है कि सामाजिक संदर्भों को ध्यान में रखा जाए और लाभार्थियों के इसे कर सकने की क्षमता और उनकी इज्जत को प्राथमिकता दी जाए.

लोकतंत्र को खत्म करने वाले राजनीतिक ध्रुवीकरण और पूर्वाग्रह को ठीक करने के लिए हमें एक-दूसरे की बात सुननी होगी


एफबीआई (FBI) के मुताबिक, 2017 में अमेरिका में घृणा अपराधों (हेट क्राइम्स) की संख्या में 17% की बढ़ोत्तरी हुई है. यह लगातार तीसरा साल था, जब ऐसे अपराधों में बढ़ोत्तरी हुई. 2015 से पहले एक लंबे समय तक या तो हेट क्राइम्स की संख्या सपाट थी या घट रही थी.

हम इन बढ़ते आंकड़ों को कैसे समझ सकते हैं? क्यों कोई अश्वेत लोगों, या अप्रवासियों, या अलग सामाजिक वर्ग के लोगों से नफरत करने लगता है? क्या ऐसा है कि कुछ लोग पैदा ही पूर्वाग्रहों के साथ होते हैं और उसी तरह बड़े होते हैं? या यह मीडिया का प्रभाव है और डोनाल्ड ट्रंप जैसे एक अप्रवासी विरोधी राष्ट्रपति की बयानबाजी का?

ये सवाल अर्थशास्त्रियों और अन्य समाज विज्ञानियों को परेशान करते हैं. यह कहना अजीब है कि लोगों का नस्लवाद और पूर्वाग्रहों के प्रति स्वाभाविक झुकाव होता है, क्योंकि यह (बात) उनके इतिहास और सामाजिक संदर्भों की अनदेखी करना है. लेकिन यह कहना कि मीडिया ने लोगों का ब्रेनवॉश कर दिया है, उनकी बुद्धिमत्ता और कुछ कर सकने की क्षमता को कम आंकना होगा. उत्तर (इससे) ज्यादा जटिल है.

हालांकि लोगों की व्यक्तिगत प्राथमिकताएं होती हैं, ये ज्यादातर उन सामाजिक समूहों और उन परिस्थिति विशेष से निर्मित होती हैं, जिसमें वे खुद को पाते हैं. लोग अपने जैसे ही अन्य लोगों की ओर खिंचते हैं. इस तरह से एक समुदाय एक विचार विशेष के लिए एक तरह के प्रतिध्विन कक्ष (इको चैंबर- जिसमें एक ही ध्वनि गूंजती रहे) बन जाते हैं, जिसमें लोग बाहरी विचारों के संपर्क में आए बिना एक-दूसरे के विश्वासों को मजबूत बनाते रहते हैं.

इसका मतलब यह है कि ग्लोबल वॉर्मिंग जैसे वैज्ञानिक तथ्यों पर भी, लोगों की बेहद अलग-अलग राय होती है. जबकि 41% अमेरिकी कहते हैं कि ग्लोबल वॉर्मिंग मानव प्रदूषण के चलते होती है, इतने ही प्रतिशत लोग या तो यह नहीं मानते कि यह हो रही है या सोचते हैं कि यह एक प्राकृतिक घटना है. इन मान्यताओं को राजनीतिक धाराओं में विभाजित किया गया है: डेमोक्रेट्स ग्लोबल वॉर्मिंग में विश्वास की ओर झुकाव रखते हैं, जबकि रिपब्लिकन ऐसा नहीं करते.

यह इको चेम्बर में फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए शोर और बढ़ जाता है. जहां हम नेटवर्क के अन्य सदस्यों द्वारा शेयर की गई सामग्री को देखते हैं, जिससे हमारे पहले से ही माने जा रहे विचारों को और मजबूती मिलती है.

यदि हम मायने रखने वाले मुद्दों पर एक-दूसरे के साथ संवाद नहीं करते हैं, लोकतंत्र टूटना शुरू हो जाता है. हम केवल जीतने के लिए वैचारिक युद्ध लड़ते हुए बिखरी हुई जनजातियों में टूट जाते हैं.

यहां तक कि सबसे प्रभावी पूर्वाग्रह को भी बदला जा सकता है. लेकिन ऐसा होने के लिए हमें विभिन्न विचारों वाले विभिन्न प्रकार के लोगों के संपर्क में आने की आवश्यकता है. स्कूल और विश्वविद्यालय ऐसी विविध सामाजिक बातचीत के लिए महत्वपूर्ण जगहें हैं, जैसे अमीरों और गरीबों के मिले-जुले पड़ोस होते हैं.

केवल खुली चर्चा के माध्यम से हम अपने समाजों में आ गई कई दरारों को भरना शुरू कर सकते हैं.

GOOD AND BAD ECONOMICS


अर्थशास्त्रियों की साख खराब हुई है, लेकिन वे हमारे सामने आने वाले सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रकाश डाल सकते हैं, जैसे कि आर्थिक असमानता और व्यापार के चलते होने वाले नौकरियों के नुकसान से कैसे निपटा जाए, जलवायु परिवर्तन से कैसे जूझें, और AI के विकास से प्रभावित कामगारों की मदद कैसे करें. इन मुद्दों के प्रभावी समाधान के लिए सरकारों की ओर से मजबूत हस्तक्षेप की जरूरत होगी. करों को बढ़ाकर और नए सामाजिक कार्यक्रम बनाकर जो कि गरीबों को वित्तीय सहायता और नौकरियों के अवसर दें, पूंजी को निष्पक्ष रूप से पुनर्वितरित किए जाने की जरूरत है. सबसे महत्वपूर्ण बात, हमें इस धारणा पर फिर से विचार करने की जरूरत है कि आर्थिक विकास से सभी को फायदा होगा, और धरती और इंसानों की सेहत के लिए चुकाई जा रही वास्तविक लागतों को भी देखना होगा.

किताब के बारे में-


इस किताब में दोनों लेखक तर्क करते हैं कि अर्थशास्त्र कई समस्याओं को लेकर नया दृष्टिकोण पेश कर उन्हें सुलझाने में हमारी मदद सकता है. चाहे वह जलवायु परिवर्तन का हल बिना गरीबों को नुकसान पहुंचाए हो, या बढ़ती हुए असमानता के चलते उभरने वाली सामाजिक समस्याओं से निपटना हो, या वैश्विक व्यापार, और प्रवासियों को लेकर फैलाया गया डर जैसे मुद्दे.

अभिजीत बनर्जी और एस्थर डुफ्लो ने 2019 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार डेलपलमेंट इकॉनमिक्स के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए पाया. उनकी इससे पहले आई किताब 'पुअर इकॉनमिक्स' (Poor Economics- गरीब अर्थशास्त्र) एक शुरुआती खोज थी कि गरीबी क्या होती है और कैसे सबसे इससे जूझते समुदायों को सबसे प्रभावशाली तरीके से मदद पहुंचाई जाए. ये दोनों ही MIT में प्रोफेसर हैं और बहुत से अकादमिक सम्मान और पुरस्कार पा चुके हैं.


अनुवाद के बारे में-


भारतीय मूल के अर्थशास्त्री अभिजीत वी. बनर्जी और उनकी साथी एस्थर डुफ्लो की 2019 में उन्हें नोबेल मिलने के तुरंत बाद आई किताब गुड इकॉनमिक्स फॉर हार्ड टाइम्स (Good Economics for Hard Times) बहुत चर्चित रही. मैं इस किताब के प्रत्येक चैप्टर का संक्षिप्त अनुवाद पेश करने की कोशिश कर रहा हूं. अभिजीत के लिखे हुए को अनुवाद करने की मेरी इच्छा इस किताब के पहले चैप्टर को पढ़ने के बाद ही हुई. बता दूं कि इसके संक्षिप्त मुझे ब्लिंकिस्ट (Blinkist) नाम की एक ऐप पर मिले. बर्लिन, जर्मनी से संचालित इस ऐप का इसे संक्षिप्त रूप में उपलब्ध कराने के लिए आभार जताता हूं. अंग्रेजी में जिन्हें समस्या न हो वे इस ऐप पर अच्छी किताबों के संक्षिप्त पढ़ सकते हैं और उनका ऑडियो भी सुन सकते हैं. एक छोटी सी टीम के साथ काम करने वाली इस ऐप का इस्तेमाल मैं पिछले 2 सालों से लगातार कर रहा हूं और मुझे इससे बहुत फायदा मिला है. वैश्विक क्वारंटाइन के चलते विशेष ऑफर के तहत 25 अप्रैल तक आप इस पर उपलब्ध किसी भी किताब को पढ़-सुन सकते हैं. जिसके बाद से यह प्रतिदिन एक किताब ही मुफ्त में पढ़ने-सुनने को देगी.

(नोट: अभिजीत वी. बनर्जी और उनकी साथी एस्थर डुफ्लो की 2019 में उन्हें नोबेल मिलने के तुरंत बाद आई किताब गुड इकॉनमिक्स फॉर हार्ड टाइम्स के संक्षिप्त अनुवाद का यह आखिरी अंश था, आगे मेरी कोशिश मशहूर पॉलीमाथ बेनेडिक्ट एंडरसन की किताब द इमैजिन्ड कम्युनिटीज को अनुवाद करने की रहेगी. आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)

Thursday, April 23, 2020

Good Economics for Hard Times: अभिजीत बनर्जी-एस्थर डुफ्लो की किताब का हिंदी में संक्षिप्त अनुवाद- उचित टैक्स, आर्थिक असमानता का इलाज

अभिजीत बनर्जी और एस्थर डुफ्लो की यह किताब दुनिया की तमाम परेशानियों का हल अर्थशास्त्र में ढूंढती है

बुद्धिमान रोबोटों के आने से बहुत पहले से है आर्थिक असमानता

रोबोटों पर आर्थिक असमानता का दोष मढ़ना आकर्षक हो सकता है. वे हमारे समाज में सबसे बड़े घुसपैठिए विदेशी हैं, और इसलिए वे एक बहुत ही सुविधाजनक बलि का बकरा भी हैं.

लेकिन स्वयं को स्कैन कर लेने सुपरमार्केट के बिल काउंटर से बहुत पहले ही असमानता बढ़ रही थी. वास्तव में, हम श्रम बाजार की बड़ी तस्वीर देखे बिना और समग्र रूप से समाज में कमाई का बंटवारा कैसे होता है (जाने बिना) AI के श्रम बाजार पर प्रभावों को नहीं समझ सकते.

1980 तक संयुक्त राज्य अमेरिका में सबसे धनी 1% लोगों की राष्ट्रीय आय का हिस्सा लगातार घर रहा था. यह 1928 के 28% से 1979 आते-आते लगभग एक-तिहाई कम हो चुका था. लेकिन ये ट्रेंड 1980 के बाद से तेजी से उलट गए, जिससे कि असमानता फिर से 1928 के स्तर पर पहुंच गई. 1980 के बाद से धन असमानता लगभग दोगुनी हो चुकी है.

जबकि शीर्ष 1% लोगों की आय में तेज वृद्धि हुई है. श्रमिकों के लिए मजदूरी बढ़नी बंद हो गई है. दरअसल, 2014 में जब औसत मजदूरी को मुद्रास्फीति की के हिसाब से तुलना कर आंका गया तो यह 1979 से अधिक नहीं थी. कम से कम शिक्षित कामगारों के सामने एक कठिन समस्या और है- 2018 में पुरुष कामगारों का वास्तविक वेतन 1980 की तुलना में 10 से 20% कम था.

तो 1980 में ऐसा क्या हुआ जो असमानता में इस भारी वृद्धि की वजह बना. कई अर्थशास्त्री इसके लिए रोनाल्ड रीगन और मार्गरेट थैचर जैसे नेताओं की नीतियों की ओर इशारा करते हैं, जो बहुत अमीर लोगों के लिए करों को घटाने के लिए तैयार की गई आक्रामक नीतियों के साथ सत्ता में आए, जिसके पीछे तर्क था कि इनके कमाए वित्तीय लाभ 'ट्रिकल डाउन' (अमीरों के लाभ बढ़ने पर वे इसे गरीबों तक भी पहुंचाएंगे) होकर औसत कामगार तक पहुंचेंगे.

रीगन-थैचर काल के आर्थिक दर्शन ने इस विचार को भी वैध ठहराया कि कुछ लोग अत्यधिक वेतन के हकदार थे. इसके पीछे तर्क क्या था? कि वे बेहद प्रतिभाशाली थे और अच्छी कमाई से उन्हें और अधिक मेहनत से काम करने का प्रोत्साहन मिलेगा.

लेकिन यह (तर्क) इस तथ्य को झुठलाता है कि वित्तीय उद्योगों में CEO लोगों को अक्सर बिना कुछ किए मोटे बोनस की कमाई होती है. उनके वेतन के, कंपनी के बाजार मूल्य से जुड़े होने के चलते, उन्हें तब अधिक पैसा मिलता है, जब कंपनी अच्छा करती है. लेकिन उनके निम्न दर्जे के कर्मियों को अधिक पैसे मिलने का कोई प्रोत्साहन नहीं है. जो कि वास्तव में, इस तर्क के पूरी तरह से खिलाफ है.

सबसे अधिक कमाने वालों और बाकी सभी के बीच यह बड़ी असमानता ज्यादा समय नहीं चल सकती. इसे सुधारने के लिए अमेरिका जैसे देशों को क्या बदलने की जरूरत है? एक शब्द में उत्तर दें तो: टैक्स (कर).

उचित कर लगाने से आर्थिक असमानता को हल करने में मदद मिल सकती है

अत्यधिक कमाई करने वाले और अन्य कामगारों के बीच समान आधार बनाने का एक रास्ता है: टैक्स. अध्ययनों से पता चला है कि जब शीर्ष 1% लोगों के लिए टैक्स की दर 70% या उससे अधिक होती है तो वेतन अधिक समान होते हैं. ऐसे में कॉरपोरेशन ऐसे सनकी स्तर के वेतन देना बंद कर देते हैं, क्योंकि टैक्स ऑफिस को सैलरी का 70% देने का कोई मतलब नहीं है.

जर्मनी, स्पेन और डेनमार्क जैसे देख, जिन्होंने करों (टैक्स) की दर इतनी अधिक कर रखी है, उनके यहां सर्वाधिक वेतन वाले और औसत कमाई वाले लोगों के बीच का अंतर अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन के मुकाबले कम है, जिन देशों ने 1970 के दशक के बाद अधिक वेतन पर करों को कम कर दिया है.

हालांकि असमानता से निपटने के लिए सरकारों को और अधिक संसाधनों की आवश्यकता पड़ने वाली है. इसका मतलब यह है कि हमें शीर्ष कमाई वालों के वेतन पर अधिक कर लगाने से अधिक की जरूरत है.

एक विकल्प बेहद अमीर लोगों की संपत्ति पर एक धन कर का है. 50 मिलियन डॉलर यानि करीब 380 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति वाले लोगों पर 2% टैक्स और 1 बिलियन डॉलर यानि करीब 7500 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति वालों पर 3% कर संभावित तौर पर अगले दस सालों में 2.7 ट्रिलियन डॉलर या 2 लाख अरब रुपये से ज्यादा पैदा किए जा सकते हैं. अरबपतियों के लिए यह महासागर में एक बूंद है लेकिन अगर उस पैसे का इस्तेमाल वैश्विक व्यापार से आहत होने के चलते बेरोजगार हुए लोगों की मदद के लिए या आवास और शिक्षा जैसे अन्य सार्वजनिक कार्यक्रमों के फंड के तौर पर किया जाए तो यह लाखों लोगों की जिंदगी में यह एक बड़ा अंतर ला सकता है.

लेकिन धन टैक्स ही पर्याप्त नहीं हैं. दरअसल परिवर्तन लाने के लिए सभी को योगदान करना होगा.

डेनमार्क और फ्रांस, गरीबी और असमानता से निपटने के लिए महत्वाकांक्षी कार्यक्रम चलाने दोनों देशों में, उनके सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 46% टैक्स से आता है. इस टैक्स में से अधिकांश औसत कमाई वालों से आता है. इसके उलट, अमेरिकी सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का मात्र 27% ही टैक्स से आता है.

अधिक टैक्स देने का विचार अमेरिका में बेहद अलोकप्रिय है. आंशिक तौर पर ऐसा सरकार पर कम से कम विश्वास होने के चलते है. सरकारी कार्यक्रमों को अक्सर अक्षम और अधिकारियों को भ्रष्ट माना जाता है. लोगों को वैध चिताएं हैं कि उनका पैसा कहां जा रहा है.

टैक्स को अच्छे उपयोग में लाने के लिए सरकारों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए. लेकिन उनका काम जरूरी है. जैसा कि हम देख चुके हैं, जब इंसानों का ख्याल रखे जाने की बात आती है तो बाजार हमेशा इसमें कार्य-कुशल नहीं साबित होता. वैश्विक व्यापार, AI, जलवायु परिवर्तन और आने वाली अनगिनत चुनौतियों से प्रभावित कामगारों को सहायता देने के लिए मजबूत सार्वजनिक कार्यक्रमों की जरूरत है. उन कार्यक्रमों में पैसे देने के लिए हमें टैक्स से पैसे जुटाने की जरूरत है.

किताब के बारे में-

इस किताब में दोनों लेखक तर्क करते हैं कि अर्थशास्त्र कई समस्याओं को लेकर नया दृष्टिकोण पेश कर उन्हें सुलझाने में हमारी मदद सकता है. चाहे वह जलवायु परिवर्तन का हल बिना गरीबों को नुकसान पहुंचाए हो, या बढ़ती हुए असमानता के चलते उभरने वाली सामाजिक समस्याओं से निपटना हो, या वैश्विक व्यापार, और प्रवासियों को लेकर फैलाया गया डर जैसे मुद्दे.

अभिजीत बनर्जी और एस्थर डुफ्लो ने 2019 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार डेलपलमेंट इकॉनमिक्स के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए पाया. उनकी इससे पहले आई किताब 'पुअर इकॉनमिक्स' (Poor Economics- गरीब अर्थशास्त्र) एक शुरुआती खोज थी कि गरीबी क्या होती है और कैसे सबसे इससे जूझते समुदायों को सबसे प्रभावशाली तरीके से मदद पहुंचाई जाए. ये दोनों ही MIT में प्रोफेसर हैं और बहुत से अकादमिक सम्मान और पुरस्कार पा चुके हैं.

अनुवाद के बारे में-

भारतीय मूल के अर्थशास्त्री अभिजीत वी. बनर्जी और उनकी साथी एस्थर डुफ्लो की 2019 में उन्हें नोबेल मिलने के तुरंत बाद आई किताब गुड इकॉनमिक्स फॉर हार्ड टाइम्स (Good Economics for Hard Times) बहुत चर्चित रही. मैं इस किताब के प्रत्येक चैप्टर का संक्षिप्त अनुवाद पेश करने की कोशिश कर रहा हूं. अभिजीत के लिखे हुए को अनुवाद करने की मेरी इच्छा इस किताब के पहले चैप्टर को पढ़ने के बाद ही हुई. बता दूं कि इसके संक्षिप्त मुझे ब्लिंकिस्ट (Blinkist) नाम की एक ऐप पर मिले. बर्लिन, जर्मनी से संचालित इस ऐप का इसे संक्षिप्त रूप में उपलब्ध कराने के लिए आभार जताता हूं. अंग्रेजी में जिन्हें समस्या न हो वे इस ऐप पर अच्छी किताबों के संक्षिप्त पढ़ सकते हैं और उनका ऑडियो भी सुन सकते हैं. एक छोटी सी टीम के साथ काम करने वाली इस ऐप का इस्तेमाल मैं पिछले 2 सालों से लगातार कर रहा हूं और मुझे इससे बहुत फायदा मिला है. वैश्विक क्वारंटाइन के चलते विशेष ऑफर के तहत 25 अप्रैल तक आप इस पर उपलब्ध किसी भी किताब को पढ़-सुन सकते हैं. जिसके बाद से यह प्रतिदिन एक किताब ही मुफ्त में पढ़ने-सुनने को देगी.

(नोट: कल इस किताब के अगले दो चैप्टर का हिंदी अनुवाद पेश करने की मेरी कोशिश होगी. आप मेरे लगातार लिखने वाले दिनों को ब्लॉग के होमपेज पर [सिर्फ डेस्कटॉप और टैब वर्जन में ] दाहिनी ओर सबसे ऊपर देख सकते हैं.)